बिलासपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। जिले में करोड़ों रुपये के विकास कार्य चल रहे हैं। इनके लिए इन दिनों फंड की बेहद कमी है। आदर्श आचार संहिता का प्रतिबंध समाप्त होने के बाद जिले से थोक में शासन को डिमांड जाने वाली है। इधर पहले ही सरकार आर्थिक संकट से जूझ रहा है। ऐसे में प्राथमिकता उन्हें मिलेगी जहां से प्रदेश में सत्ताधारी पार्टी की जीत होगी। इस तरह लोकसभा का चुनाव परिणाम जिले के विकास कार्यों पर गहरा असर डालने वाला है।

राज्य शासन इन दिनों फंड की कमी से जूझ रहा है। किसी योजना पर सीधे एलॉटमेंट के बजाय अब प्राथमिकता के आधार पर फंड दिए जाने हैं। चर्चा है कि प्राथमिकता उन्हीं जिलों को मिलेगी जहां से प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी को जीत मिलेगी। जिले में कई बड़े प्रोजेक्ट इस समय चल रहे हैं,जिसमें केंद्र के अलावा राज्यांश का भी प्रावधान है। अब राज्य के हिस्से का फंड लाने के लिए सरकारी विभागों ने अपनी-अपनी फाइल तैयार करना शुरू कर दिया है। जैसे ही आदर्श आचार संहिता हटेगी वैसे ही थोक में डिमांड वित्त विभाग में चली जाएगी। वर्तमान में नगर निगम को सबसे पहले पैसों की जरूरत है। डोर टू डोर स्वीपिंग और नाइट स्वीपिंग का भुगतान करने के लिए नगर निगम के पास पैसे नहीं है। इनके लिए प्रतिमाह डेढ़ करोड़ रुपये चाहिए। दोनों ही ठेकेदारों को दो माह से भुगतान नहीं हुआ है। इनका ज्यादातर काम मजदूरों के जरिए होता है। जिन्हें हर माह वेतन देना है।

ऐसे में ठेकेदारों ने निगम अधिकारियों को अल्टीमेटम दे दिया है। अब तक उन्हें आदर्श आचार संहिता के बहाने से मनाते आए हैं। अगर चुनावी प्रतिबंध हटने के बाद भी भुगतान नहीं हुआ तो सफाई की यह सुविधा शहर से छीन सकती है। इसी तरह सीवरेज का बजट बढ़ गया है। प्रोजेक्ट को जल्द पूरा कराने के लिए अधिकारियों ने फिर शासन से फंड की मांग की है। इनका मामला फिलहाल शासन स्तर पर विचाराधीन है। अमृत मिशन योजना में खूंटाघाट बांध से पानी लाकर शहर को पेयजल उपलब्ध कराना है।

फिलहाल काम अधूरा है। इसे तेजी से कराने के लिए ठेकेदार को उसी हिसाब से भुगतान करने के लिए कहा गया है। इस प्रोजेक्ट को जल्द पूरा करने के लिए निगम को राज्यांश की जरूरत है। आचार संहिता हटते ही इस प्रोजेक्ट की डिमांड भी शासन को चली जाएगी। इसी तरह अरपा-भैंसाझार प्रोजेक्ट, साइंस कॉलेज मैदान का सभा स्थल सहित दर्जन भर से अधिक बड़े काम के लिए जिले के सरकारी विभागों को बजट की जरूरत होगी। लोकसभा का चुनाव परिणाम इनका भविष्य तय करेगा।

निगम में वेतन का होगा संकट

अप्रैल के बाद से निगम में कर्मचारियों को वेतन देने लायक भी फंड नहीं है। टैक्स की वसूली एकाएक ठप हो जाने से वेतन भुगतान का संकट खड़ा हो गया है। निगम ने शासन को वेतन भुगतान के लिए फंड जारी करने का अनुरोध किया है जो अब तक नहीं मिला है। अगर आचार संहिता हटने के बाद शासन से आर्थिक मदद नहीं मिली तो निगम अपने कर्मचारियों को तनख्वाह भी नहीं दे पाएगा।

स्थानीय प्रतिनिधियों की होगी परख

प्रदेश में फंड की कमी है। ऐसे में योजना के लिए फंड लाने में जनप्रतिनिधियों की असली परख होगी। जिस भी जिले के नेताओं का राजधानी में अच्छी दखल होगी उन्हें ही प्राथमिकता से फंड मिलेगा। नई योजनाएं के लिए शासन से एक साल स्वीकृति मिलने की फिलहाल जिले के अधिकारियों को उम्मीद नहीं है। असली दिक्कत उन प्रोजेक्ट के लिए है जो अभी जिले में चल रहे हैं। उनके लिए फिलहाल पहले फंड की जरूरत है।