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    धान कटाई के बाद मनाते हैं चरू जात्रा, महिलाओं व बच्चों पर है ऐसी पांबदी

    Published: Fri, 08 Dec 2017 01:02 PM (IST) | Updated: Fri, 08 Dec 2017 01:07 PM (IST)
    By: Editorial Team
    charu jatra 08 12 2017

    रितेश पांडेय जगदलपुर। बस्तर का आदिवासी समुदाय प्रकृति उपासक व उत्सव प्रेमी रहा है। फसल बुवाई से लेकर धान खलिहान तक पहुंचने के दौरान प्रकृति एवं ईश्वर को धन्यवाद देने के प्रतिरूप में विभिन्न उत्सव मनाए जाते हैं।

    बीज पंडुम से लेकर नवाखानी तक यह क्रम चलता रहता है। इसी क्रम में बस्तर में इन दिनों धान की कटाई उपरांत चरू जात्रा मनाया जा रहा है। जात्रा में ग्राम्य देवी को बलि अर्पित कर पूजा अर्चना की जाती है। इस पूजा विधान के पश्चात वितरित होने वाला प्रसाद महिलाओं एवं बच्चों के लिए वर्जित है।

    इसके पीछे पुरानी मान्यता एवं महिलाओं एवं बच्चों की संवेदनशीलता मानी जाती है। आदिवासी समुदाय द्वारा धान की फसल काटने के बाद चरू जात्रा का आयोजन जगह-जगह किया जा रहा है। ग्राम पोड़ागुड़ा के ग्रामीण जयराम ने बताया कि चरू जात्रा का आशय फसल को लक्ष्मी स्वरूप मानकर आराधना करते हैं।

    ग्रामीणों के अनुसार धान की पुसल खेत में काटकर खलिहान पहुंचने के बाद सभी ग्रामीण सारी(चंदा) एकत्र करते हैं। इसके बाद ग्राम्य देवी की गुड़ी (मंदिर) अथवा खेत में चरू जात्रा का आयोजन तय किया जाता है।

    ग्राम्य देवी के नाम से धूप-दीप, नारियल, फल-फूल अर्पित किया जाता है। इसके बाद ग्रामीण अपनी श्रद्धा से बकरा, मुर्गा, बतख, मछली आदि की बलि अर्पित करते हैं। इस परम्परा की खूबी यह है कि इसमें विभिन्न् जातियों के ग्रामीण एक साथ भागीदारी करते हैं।

    हांलाकि कुछ जाति विशेष के ग्रामीणों की पंगत अलग बैठाई जाती है। वे अपने हिस्से का प्रसाद भी स्वयं तैयार करते हैं। एक ही समुदाय के आदिवासी एक साथ मांस पकाते हैं।

    इसके बाद साल वृक्ष के पत्तों से बने दोने में सभी प्रसाद ग्रहण करते हैं। मान्यता अनुसार यह प्रसाद जात्रा स्थल में ही पुरूष सदस्य ग्रहण करते हैं। पांच वर्ष से नीचे के बच्चों तथा महिलाओं को चरू जात्रा का प्रसाद नहीं दिया जाता है।

    इसके पीछे ऐसी मान्यता है कि बच्चे एवं महिलाएं अधिक संवेदनशील होते हैं। अत: उनके सामने बलि नहीं दी जाती है और प्रसाद भी उन्हें नहीं दिया जाता है ताकि उनका मन विचलित नहीं हो।

    हालांकि ग्रामीण इसके पीछे स्पष्ट कारण नहीं बताते हैं। अंचल के बस्तर, कोंडागांव, नारायणपुर जिलों में चरू जात्रा मनाए जाने की परम्परा है। वहीं दक्षिण बस्तर में कोया समाज इसे नयाखानी के दूसरे स्वरूप में मनाता है।

    चरू जात्रा के बाद कोठार सरानी

    धान की फसल काटकर खेत से कोठार(खलिहान) पहुंचाने के बाद जमीन गोबर से लीपकर धान का कूपा रचा जाता है। इसके बाद खेत में धान कटाई से लेकर अन्य सारे कार्यों में मदद करने वाले मजदूर व पड़ोसी मिलकर कोठार सरानी करते हैं। कोठार सरानी हर्ष व उल्लास का प्रतीक है।

    खेत में काम करने वाले मजदूर-किसान तथा पड़ोसी एक साथ चाऊर भाजा(बस्तरिया बिरयानी) बनाते हैं। साथ ही महुआ शराब,सल्फी व लंदा का सेवन भी किया जाता है।

    कोठार सरानी में महिलाएं व बच्चे भी शरीक होते हैं। आमतौर पर दिसम्बर माह के बाद जब धान कटाई खत्म हो जाती है तो फिर नुवाखानी का क्रम शुरू होता है। यह अलग-अलग क्षेत्रों में लगातार चलता है।

    - बस्तर के ग्रामीण फसल को अन्न्पूर्णा लक्ष्मी स्वरूप मानते हैं। उनकी पूरी अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित होती है। चरू जात्रा एक प्रकार से देवी अन्न्पूर्णा को सामूहिक धन्यवाद ज्ञापन का रस्म है। वर्ष भर का फसल देने के लिए आभार मानकर बलि अर्पित की जाती है। - रूद्र नारायण पाणिग्राही, बस्तर संस्कृति के जानकार

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