अनिल मिश्रा, रायपुर। छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियान का प्रतीक रहे जगरगुंडा की तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। सुकमा जिले के जगरगुंडा कस्बे तक तीन रास्ते जाते हैं। एक दंतेवाड़ा की ओर से अरनपुर होकर, दूसरा बीजापुर की ओर से बासागुड़ा होकर और तीसरा सुकमा जिले के दोरनापाल से। इन तीनों रास्तों पर नक्सलियों ने बारुद बिछा रखा है।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जब प्रदेश के राजस्व मंत्री थे तो उन्होंने जगरगुंडा को उप तहसील बनाया था। कभी यह कस्बा वनोपजों का प्रमुख केंद्र था। यहां 1952 से पुलिस थाना है। सीआरपीएफ की दो कंपनियां तैनात हैं। फिर भी जगरगुंडा चारों ओर से कंसर्टीना तारों से घिरा है। इस घेरे से बाहर जाना जान जोखिम का काम है।

चारों ओर घने जंगल हैं और नक्सली कभी भी कहीं से भी फायर कर सकते हैं।

जगरगुंडा को नक्सलियों की राजधानी माना जाता रहा है। यह कस्बा नक्सल विरोधी अभियान सलवा जुड़ूम का बड़ा प्रतीक भी रहा। जुड़ूम कैंप बना तो नक्सलियों ने इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया। सप्लाई लाइन बंद कर दी। बिजली काट दी। 2006 से अब तक सरकार जगरगुंडा में एकमुश्त छह महीने का राशन भेजती रही। रोड ओपनिंग पार्टी, बख्तर बंद गाड़ियां और सुरक्षा के तमाम उपाय करने के बाद चावल, दाल, आलू, प्याज, साबुन आदि जरूरी सामान पहुंचाया जाता था।

नईदुनिया की टीम ने तब जगरगुंडा पर स्टोरी की थी जब सलवा जुड़ूम चल रहा था। रातभर कैंप में जंगल की ओर से फायर आता। कस्बे की हर पक्की बिल्डिंग के ऊपर मोर्चा बनाया गया था। रातभर सर्च लाइट घूमती। कई घटनाएं भी हुईं। पर अब 13 साल के बाद बदलाव दिख रहा है। सुरक्षा घेरे को लांघकर ग्रामीण अपने खेतों में जाने लगे हैं। घेरे के बाहर साप्ताहिक बाजार भी लग रहा है।

बिजली की लाइन खींच दी गई है, हालांकि अभी घरों तक कनेक्शन नहीं पहुंच पाया है। प्राइमरी स्कूल को खोल दिया गया है और हायर सेकेंडरी स्कूल को फिर से खोलने की तैयारी की जा रही है। दोरनापाल और अरनपुर की ओर से कंक्रीट की सड़क बनाई जा रही है।

जगरगुंडा में चुनाव प्रचार के रंग

यह ऐसी जगह है जहां नेता सिर्फ हेलीकॉप्टर पर ही जा पाते हैं। जगरगुंडा कैंप में मिलियमपल्ली, कुंदेड़, तारलागुड़ा पंचायतों के लोग भी रहते हैं। यहां हर चुनाव में लगभग 12-13 सौ वोट पड़ते हैं। सलवा जुड़ूम का प्रभाव रहा और यहां भाजपा के बड़े नेता, सीएम पहुंचते रहे इसलिए वोट भी भाजपा को ही मिलता रहा।

कोंटा के कांग्रेस विधायक और मंत्री कवासी लखमा रविवार को जगरगुंडा पहुंचे थे।

बोले-मैं कम से कम 16 साल बाद आया हूं। मेरे को यहां से 15 वोट भी नहीं मिलता था। अब हम आएंगे तो मिलेगा। लखमा ने जगरगुंडा में आदिवासियों को संबोधित भी किया। कहा-यहां कानून का राज चलेगा। फर्जी मुठभेड़ करने वालों को नहीं छोड़ेंगे। आदिवासियों की जेल से रिहाई के लिए कमेटी बनाई है।

यहां धान खरीदी केंद्र खोलेंगे। स्कूल, अस्पताल ठीक करेंगे। उप तहसील और ब्लॉक बनाएंगे। लखमा ने सरकार की उपलब्धियां गिनाईं पर उनका फोकस आदिवासी और नक्सलवाद ही रहा। कहा कि गोली से नहीं बाली से शांति आएगी। उनके साथ बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी भी थे।

दिन में खेत और रात में कैंप की जिंंदगी

जगरगुंडा में रहने वाले आदिवासी 13 साल तक खेती नहीं कर पाए। अब शांति का माहौल लौट रहा है तो ग्रामीण अपने गांवों और खेतों में काम करने जा रहे हैं। दिन में काम करने जाते हैं और रात में कैंप की सुरक्षा में लौट आते हैं। सरकार ने वहां राशन दुकान खोल दी है। मुफ्त राशन बंद कर दिया है।