योगेन्द्र ठाकुर, दंतेवाड़ा। शिक्षक को समाज का सच्चा पथ प्रदर्शक कहा जाता है। धुर नक्सल प्रभावित ग्राम बिंजाम के बघेल गुरुजी इस पर खरा उतरते हैं। शराब आदिवासियों की संस्कृति से जुड़ा हुआ है। उनके जीवन का अहम हिस्सा है। लेकिन इससे उनका कितना सामाजिक व शारीरिक नुकसान हो रहा है, इस ओर बघेल गुरुजी ने गंभीरता से सोचा। आज उन्हें रिटायर हुए 11 साल बीत चुके हैं। नौकरी के समय और उसके बाद भी वे गांव-गांव घूमकर नशे से दूर रहने के लिए ग्रामीणों को जागरूक कर रहे हैं। उनसे प्रेरित होकर अब तक हजारों आदिवासी शराब समेत अन्य नशा त्याग चुके हैं।

इतना ही नहीं, उनके प्रयासों से स्थानीय हाट-बाजारों में शराब की बिक्री भी कम हो गई है। एक सामान्य व सरल-सी जिंदगी जीने वाले दशरूराम बघेल के प्रयासों से बिंजाम आज आदर्श गांव के रूप में पहचाना जाता है। यहां के सारे ग्रामीण नशा त्याग चुके हैं। आदिवासी बहुल इस गांव में शराब-सिगरेट तो दूर, गुड़ाखू (नशायुक्त दंत मंजन) तक का उपयोग नहीं होता। इसका प्रभाव आसपास के गांवों पर भी है। दर्जनों गांवों में नशामुक्ति की यह बयार बह रही है। बघेल गुरुजी कहते हैं कि चार दशक की मेहनत का जो फल मिल रहा है, उसे वे शब्दों में बयां नहीं कर सकते।

इस तरह बदली जीवन की दिशा

मूलत: बिंजाम निवासी बघेल गुरुजी बताते हैं कि कभी वे भी शराब व मांस का सेवन करते थे। एक बार उनके मित्र व स्कूल के सीनियर शिक्षक एआर तेलामी ने धार्मिक कार्यक्रम में घर बुलाया। गायत्री की किताबें पढ़ने को दीं। उससे वे काफी प्रभावित हुए। फिर गायत्री मंत्र के साथ दीक्षा ले ली। इसके बाद से जीवन की दिशा ही बदल गई।

बलि प्रथा बंद कराने लड़ गए थे माईजी के पुजारी से

बघेल गुरुजी बताते हैं कि देवी-देवताओं के नाम पर मूक पशुओं की बलि रोकने के लिए वे एक बार दंतेश्वरी मंदिर के पुजारियों से भिड़ गए थे। आज मंदिर में बलि प्रथा पर रोक लग गई है। गांव में भी धार्मिक आयोजनों में बलि नहीं दी जाती।

हाट-बाजारों में घटी शराब बिक्री

वे बताते हैं कि दंतेवाड़ा जिला बनने के बाद उन्होंने नशामुक्ति के लिए विशेष अभियान छेड़ा था। इसमें जिला प्रशासन का सहयोग भी मिला। इसके बाद जिले के हाट-बाजारों में खुलेआम शराब की बिक्री में कमी आई है।

आसान नहीं था ग्रामीणों को तैयार करना

वे बताते हैं कि आदिवासियों को शराब से दूर रहने की बात समझाना आसान नहीं था। वे परंपराओं का हवाला देने लगते थे। पीठ पीछे बुराई भी होती थी। लेकिन वे डटे रहे और अंतत: अच्छाई की जीत हुई। आज वही लोग उनकी बड़ाई करते हैं। सम्मान करते हैं। उनके सहयोगी रूपाराम कुंजामी व धुरवाराम भी उन्हें इस नेक काम में मदद करते हैं।