योगेंद्र ठाकुर, दंतेवाड़ा। होली का पर्व पूरे देश के साथ बस्तर में भी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। लेकिन यहां की अनूठी परंपराओं के चलते देखने लोग पहुंचते हैं। भाईचारे के इस पर्व को आस्था नगरी दंतेवाड़ा की देवी दंतेश्वरी और आमंत्रित देवी-देवता भी पूरे उल्लास के साथ मनाते हैं।

देवी-देवताओं के प्रतीक चिन्हों के साथ ग्रामीण दोपहर तक झूमते-नाचते रहते हैं। इस रस्म को यहां रंग-भंग के नाम से जाना और मनाया जाता है। दंतेवाड़ा में होली का उल्लास 9 दिन पहले मंडई के रूप में शुरू हो जाता है। देवी मां के नाम पर मेंडका डोबरा में 9 दिन ज्योति कलश स्थापित होती है और प्रतिदिन शाम को डोली को नगर भ्रमण पर निकाला जाता है।

यहां होली में होलिका दहन के दूसरे दिन पादुका पूजन व रंग-भंग नामक अनोखी और निराली रस्म होती है। मान्यता है कि होलिका दहन स्थल की राख से मंडई में मां दंतेश्वरी आमंत्रित देवीदेवताओं तथा पुजारी व सेवादारों के साथ होली खेलती हैं।

इस मौके पर फागुन मंडई के अंतिम रस्म के रूप में विभिन्न् ग्रामों से मेले में पहुंचे देवी-देवताओं को विधिवत विदाई दी जाती है। पिछले कुछ सालों में पर्व को लेकर ग्रामीणों के साथ स्थानीय लोगों में भी उत्साह बढ़ा है।

लट्ठ नहीं, आंवरामार होली

होलिका दहन में सती सीता शिला के समक्ष ताड़पत्तों को जलाया जाता है। करीब सात सौ साल पुरानी सती सीता शिला के समक्ष होलिका दहन के पहले आंवरामार रस्म होती है। यह रस्म उत्तर भारत की लट्ठ मार होली की ही तरह है। लेकिन यहां स्त्री- पुरूष नहीं, मौजूद सभी लोग एक- दूसरे पर आंवरा की बौछार करते हैं।

उल्लास में भरी यह वार शरीर को चोटिल करने नहीं बल्कि परंपराओं के निर्वहन में मनोरंजक होती है। इसके बाद होलिका दहन की जाती है। यहां जनसमूह की उपस्थिति में बाजा मोहरी की गूंज के बीच प्रधान पुजारी जिया बाबा ताड़पत्तों को जलाकर होलिका दहन की रस्म पूरी करते हैं। होलिका दहन के बाद गंवरमार रस्म में गंवर (वनभैंसा) का शिकार नाटिका खेली जाती है।

- दंतेवाड़ा में फागुन मंडई के दौरान ताड्पत्तों की होलिका दहन और देवी-देवताओं के होली खेलने की परंपरा चली आ रही है। आंवरामार रस्म भी 700 साल से चल रहा है। ग्रामीण श्रद्धालु एकदूसरे पर आंवला फेंककर खुशियां मनाते है। समुदाय की भागीदारी के साथ पर्व की खुशी भी नजर आती है। - हरेंद्रनाथ जिया, प्रधान पुजारी, दंतेश्वरी मंदिर