-घरों के सामने स्वागत में बनाई रंगोली

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कैप्शन : उत्साह से जैन आचार्यों का स्वागत किया।

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कैप्शन : शोभायात्रा में जैन समाज के लोग शामिल हुए।

धमतरी। नईदुनिया प्रतिनिधि

खत्तरगच्छ जैन समाज के आचार्य जिन पीयूष सागर का 17 मई को पहली बार धमतरी आगमन हुआ। उनके स्वागत में जैन समाज के लोगों ने शोभायात्रा निकाली। सदर बाजार में घरों के सामने रंगोली बनाकर उनका अभिनंदन किया गया। आचार्य के साथ उनके शिष्य सम्यक रत्न सागर, सम्यर्ति रत्न सागर और संकल्प रत्न सागर भी थे।

धमतरी प्रवेश करते ही जैन समाज के लोग स्वागत के लिए उमड़ पड़े। अर्जुनी मोड़ से वे आमापारा स्थित मंगल भवन तक उन्हें शोभायात्रा निकालकर लाया गया। रास्तेभर जैन आचार्यों का समाजजनों ने स्वागत किया। मंगल भवन से इतवारी बाजार जैन मंदिर पहुंचे। यहां सभी आचार्य शनिवार 18 मई तक वे रहेंगे। शनिवार शाम सभी नवापारा राजिम होकर रायपुर के लिए प्रस्थान करेंगे। स्वागत करते हुए शोभायात्रा में विजय लाल बरडिय़ा, गजराज लुंकड़, भंवर लाल छाजेड़, पारस गोलछा, संतोष पारख, अशोक राखेचा, विजय गोलछा, निर्मल बरडिय़ा, संजय बरडिय़ा, संजय संकलेचा, महेश सेठिया, धरमचंद पारख, रमन लोढ़ा, लक्ष्मी लाल लुनिया, नीलेश पारख, मूलचंद लुनिया, विमल पारख, रामलाल डागा, नेमीचंद छाजेड़, कुशल चोपड़ा, सुनील बरड़िया, दीपक पारख, विजय दुग्गड़, शिशिर सेठिया, हितेश चोपड़ा, अजय पारख, प्रकाश गोलछा, भूषण सेठिया, शांतिलाल बैद, आशीष बंगानी, जीवन बंगानी, आशीष मिन्नी, अनिल बैद, रानू जैन समेत जैन समाज के महिला, बच्चे, बुजुर्ग और युवा बड़ी संख्या में शामिल हुए।

इच्छा का विरोध करना सबसे बड़ा तप है

सम्यक रत्न ने चर्चा में बताया कि तप के साथ आज की भौतिकता हावी है। तपस्वियों के तप तक पहुंचने के लिये प्रारंभ से ही तप शुरू करना होता है। सबसे बड़ा तप इच्छा का विरोध करना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि यदि आपकी इच्छा गर्मी के दिनों में एसी में बैठने की है, लेकिन आप उस इच्छा का विरोध कर एसी चालू नहीं करते, तो यह भी एक प्रकार का तप है। ऐसे ही रोजाना की जिंदगी में मनुष्य के अंदर कई इच्छाएं जागृत होती हैं, जिनका दमन कर देना तप होता है। इसी तप से आगे बढ़ते हुए उसकी योग्यतानुसार कोई भी व्यक्ति तपस्वी बनता है। उन्होंने आज की नई पीढ़ी को व्यसन मुक्ति का संदेश देते हुए कहा कि वातावरण से व्यक्ति के अंदर विचार आता है और विचार से ही आचरण का निर्माण होता है। यदि भौतिकता के युग में कोई दूषित वातावरण में रहता है, तो उसका मन दूषित होगा। हम पूरे वातवरण को तो नहीं बदल सकते, इच्छा हो कि हम उसम वातावरण से ही दूर हो जायें।

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