कुरुद। नईदुनिया न्यूज

रमजान का महीना शुरू हो गया और रोजेदारों का 42 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक तापमान में भी उत्साह कम नहीं हो रहा है। बुजुर्गों के साथ जवान और बच्चे भी रोजे रखते हैं। वहीं रमजान के महीने में मस्जिदों की रौनक बढ़ गई है।

रोजा इफ्तार के लिए शाम के समय मुस्लिम धर्मावलंबी बड़ी संख्या में मस्जिदों का रुख करते हैं। भीषण गर्मी में जहां लोगों को पल-पल पर प्यास लग रही है और लोग डिहाइड्रेशन का शिकार हो रहे हैं। ऐसे में रोजेदार अल्लाह को राजी करने के लिए प्यासे रहकर इबादत में लगे हुए हैं। मुस्लिम समाज का बरकतों का महीना रमजान में गर्मी के मौसम का भी रोजेदारों पर कोई असर नहीं हो रहा है। लोग अल्लाह की इबादत में ज्यादा से ज्यादा समय बिता रहे हैं।

रोजा सब्र और हौसला का पयाम है

मुस्लिम समाज के इमरान बेग ने बताया कि माहे रमजान वह मुबारक माह है, जिसमें एक मुसलमान पूरे तीस दिन भूखा-प्यास रहकर अल्लाह की इबादत में मशगूल रहता है। मगर सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम रोजा नहीं है। आंखें, जबान अपने सारे इंद्रियों से यहां तक अपने ख्यालातों से ऐसा कोई काम ना करना जो परवरदिगार को नापसंद हो, उसका नाम रोजा है। अगर हम गीबत चुगली करते हैं, बुराई करते हैं, गलत कामों में मशगूल रहते हैं, तो खुदा को ऐसे भूख-प्यासे रहने वालों से कोई सरोकार नहीं है। जमाल रिजवी के मुताबिक मंजिल तक पहुंचना तब आसान हो जाता है, जब राह सीधी हो जाती है। मजहब इस्लाम में रोजा रहमत और राहत का रहबर है। रहमत से मुराद अल्लाह की मेहरबानी से है और राहत का मतलब दिल के सुकुन से है। दिल के सुकून का मतलब नेकी और नेक अमल सतकर्म से है। इसलिए जरूरी है कि आदमी नेकी के रास्ते पर चले। शरीफ खान ने बताया कि रोजा बेड़ियों पर लगाम लगाता है और सीधा राह चलाता है। मगफिरत और मोज की मंजिल पर पहुंचने के लिए सीधा राह रोजा है। रोजा रखने जब कोई शख्स अपने गुस्से, लालच, जुबान, जेहन, नफ्स, इंद्रियों के पास रखता है तो वह सीधा राह पर ही चलता है। रोजा भूख-प्यास पर तो नियंत्रण रखता ही है।

अय्युब खान के मुताबिक वैसे तो रोजा सब्र और हौसला का प्याम है, लेकिन रोजा सीधी राह का भी हितमाम है। नेक नियत से रखे गए रोजा नूर का निशान है। अच्छे और सच्चे मुस्लिमों की पहचान है।

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हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए रोजा इफ्तार

फोटोः अजय चंद्राकर

क्षेत्रीय विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री अजय चंद्राकर इस मौके पर प्रतिवर्ष हिंदू-मुस्लिम एकता व सामाजिक सद्भाव के लिए हर साल रोजा इफ्तार आयोजित करते हैं, जिसमे सर्वसमाज के लोग शामिल होते हैं। चंद्राकर का मानना है कि ऐसे कार्यक्रमों से काफी खुशी मिलती है। इस तरह के आयोजन वास्तव में एकता और भाइचारे का प्रतीक है।