धमतरी। धमतरी विधानसभा क्षेत्र में कभी भी जातिगत समीकरण नहीं चला। हर बार यहां उम्मीदवार का चेहरा और राजनीतिक दल के एजेंडे हावी रहे। 30 प्रतिशत से अधिक वोटर वाले साहू उम्मीदवार तीन बार चुनाव हारे। सिर्फ एक बार ही जीत पाए। वहीं, पांच प्रतिशत से भी कम वोटर संख्या वाले उम्मीदवारों ने भारी मतों के अंतर से चुनाव जीतने का रिकार्ड बनाया है।

फेल हो जाता है समीकरण

विधानसभा क्षेत्र में कुल 209182 मतदाता हैं, जिसमें 102538 पुरूष, 10638 महिला और छह थर्ड जेंडर हैं। इस बार भाजपा ने जातिगत समीकरण और महिला को ध्यान में रखते हुए रंजना साहू को मैदान में उतारा है।

वर्ष 1985 में भाजपा ने पहली बार जातिगत समीकरण का फार्मूला अपनाते हुए कृपाराम साहू को मैदान में उतारा था। कृपाराम को 24464 वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार जयाबेन को 31374 वोट लेकर 6910 के अंतर से जीत दर्ज की। 1990 के चुनाव में फिर से भाजपा ने कृपाराम पर दांव लगाया। कृपाराम ने 42660 मत प्राप्त कर केसरीमल लुंकड़ (40043 वोट ) को 2617 वोट के मामूली अंतर से हराया।

वर्ष 1998 में 16 हजार से ज्यादा वोट से हारे

वर्ष 1998 के चुनाव में भाजपा ने जातिगत समीकरण का फार्मूला अपनाते हुए पूर्व मंत्री कृपाराम को टिकट दी। लेकिन भाजपा का फार्मूला फेल साबित हुआ। कांग्रेस के हर्षद मेहता ने 16322 वोटों के भारी अंतर से कृपाराम साहू को चुनाव हराया। हरषद मेहता को 56520 और कृपाराम साहू को 40198 वोट मिले।

रिकार्ड वोट से हारे विपिन

वर्ष 2008 के चुनाव में भाजपा ने फिर साहू कार्ड खेलते हुए विपिन साहू को चुनाव मैदान में उतारा। उम्मीद थी कि साहू समाज के वोटर विपिन के पीछे लामबंद होकर वोट देंगे, लेकिन इसके उलट हुआ। कांग्रेस के गुरूमुख सिंह होरा ने 27007 मतों के रिकार्ड अंतर से जीत गए।

पांच प्रतिशत से कम आबादी वाले उम्मीदवार हावी

पांच प्रतिशत से कम मतदाता संख्या वाले गुजराती समाज से चार बार विधायक चुने गए। वर्ष 1957 में पुरूषोत्तम भाई पटेल, 1980 और 1985 में दो बार जयाबेन तथा 1998 में हर्षद मेहता शामिल हैं। सिख समाज के मतदाता भी पांच प्रतिशत से कम है। इसके बावजूद गुरूमुख सिंह होरा ने लगातार दो बार 2008 और 2013 में चुनाव जीता। इससे साबित होता है कि लोग जाति देखकर नहीं बल्कि चेहरा और मुद्दे देखकर वोट डालते हैं।