दुर्ग (वि.)। 'जैन धर्म का प्राणभूत सिद्घांत है अहिंसा - भावलिंगी। संत दर्र्शन में चार प्रकार के दानों का कथन प्राप्त होता है, आहारदान औषधिदान, शास्त्रदान एवं अभय दान। चारों दान यद्यपि अपने आप में महत्वपूर्ण है, लेकिन इन चार दानो में जो आधार भूत है वह है अभयदान। आहार दान से क्षुधा का नाश होता है।' यह बातें आचार्य विमर्शसागर महाराज ने कही।

दुर्ग स्थित जैन मंदिर परिसर में धर्म सभा के दौरान आचार्य विमर्शसागर महाराज ने कहा कि औषधि दान से रोग का शमन होता है एवं शास्त्र दान से अज्ञानता का नाश होता है, लेकिन अभय दान इसलिये इन तीनों से श्रेष्ठ है, क्योंकि अभय दान से उपरोक्त तीनों कार्य सध जाते हैं। अभयदान के बिना तीनों दान निष्फल हैं। यदि जीव के प्राणों की रक्षा होगी तो ही अन्य प्रकार के दान संभव हो सकेंगे। आचार्य ने आगे कहा कि अभय का अर्थ होता है भय रहित अर्थात भयभीत जीवों को भय रहित कर देना अभय दान है। धर्मात्मा जीवों के अंदर सहज ही अभय दान की प्रवृत्ति होती है।