बिलासपुर, नईदुनिया । भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने और बेगुनाहों को न्याय दिलाने के लिए अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश(एडीजे) अनिल गायकवाड़ ने नौकरी छोड़ दी है। जज्बा और जुनून ऐसा कि बीते चार वर्षों से वे वनवासी अंचल के अलावा गांव में रहने वाले ग्रामीणों को मुफ्त में कानूनी सलाह दे रहे हैं और केस भी लड़ रहे हैं। अपने सेवाकाल में उन्होंने राज्य शासन के दो बड़े भ्रष्टाचार को भी उजागर किया। भोपाल में यूनियन कार्बाइड गैस कांड के दौरान उन्होंने गैस त्रासदी में पीड़ित लोगों को राहत दिलाने में अपनी अहम भूमिका निभाई। दो साल के भीतर 500 गैस पीड़ितों को उन्होंने मुआवजा भी दिलाया।

जज गायकवाड़ का जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। पिता नारायण राव गायकवाड़ डाकघर में तार बाबू के पद पर काम कर रहे थे। मामूली नौकरी करते हुए उन्होंने बेटे को बीएससी एलएलबी तक की पढ़ाई कराई। घर की माली हालत से अच्छी तरह वाकिफ बेटे ने तब पिता की बात का विरोध नहीं किया और शिक्षक पद के लिए जिला शिक्षाधिकारी के कार्यालय में आवेदन दे दिया। पढ़े-लिखे होने के कारण उच्च श्रेणी शिक्षक के पद पर उनकी नियुक्ति हो गई। वर्ष 1979 में सरगुजा के वाड्रफनगर हायर सेकेंडरी स्कूल में पहली पोस्टिंग हुई। एक साल के भीतर उनका तबादला सीतापुर स्कूल में हो गया।

वार्षिक परीक्षा के दौरान विधायक के बेटे को गणित के पर्चे में नकल करते पकड़ लिया और मामला बना दिया। इससे नाराज होकर विधायक ने पहुंचविहीन गांव व घनघोर जंगल ओड़गीखोर के हायर सेकेंडरी स्कूल में तबादला करा दिया। शिक्षक के पद पर नौकरी करते-करते वे इतना तो समझ गए थे कि भोले ग्रामीणों और उनकी समस्याओं को करीब से देखा। उनके लिए कुछ करने की ठानी। इसके लिए उस जगह पर पहुंचना था जहां से नियम-कानून का डंडा लहराया जा सके। गरीबों की पीड़ा ने एक शिक्षक को कानून की दिशा में मोड़ दिया। एलएलबी की डिग्री तो उनके पास थी ही। उन्होंने सिविल जज बनने की ठानी। तीसरे प्रयास में वे सफल हो गए।

वर्ष 1988 में सिविल जज की कुर्सी पर काबिज हो गए। कुर्सी संभालते ही उन्होंने मन ही मन लिए संकल्प को पूरा करने की दिशा में काम करना शुरू किया। प्रभावशाली लोगों ने अड़चनें भी पैदा की। वर्ष 2012 में बिलासपुर में स्थाई लोक अदालत के चेयरमैन के पद पर उनकी नियुक्ति की गई। यहीं से उनका मन बदला और अनिवार्य सेवानिवृति के लिए विधि विधायी विभाग में अर्जी लगा दी। विभाग ने 31 जुलाई 2013 को उनके आवेदन को स्वीकार करते हुए वीआरएस दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपने संकल्प को मिशन के रूप में तब्दील कर दिया। अब उनके जीवन का एकमात्र ध्येय बेगुनाहों को न्याय दिलाना ही रह गया है। इसके लिए वे मुफ्त में कानूनी लड़ाई तो लड़ ही रहे हैं। साथ ही कानूनी सलाह भी दे रहे हैं।

दलिया खरीदी मामले में दिया सुनाया महत्वपूर्ण फैसला -

छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद राज्य सरकार ने नौनिहालों के लिए बगैर टेंडर निकाले दलिया की खरीदी की। वहीं दूसरे वर्ष निविदा जारी की गई। इसमें शर्त रख दी कि निविदा में वही कंपनी भाग लेगी, जिसने बीते वर्ष 40 लाख रुपए की दलिया आपूर्ति की होगी। शासन के इस शर्त से पिछले दरवाजे से जिस कंपनी से खरीदी की गई थी, उसी ने निविदा भरा और शासन ने 100 करोड़ की खरीदी का आदेश जारी कर दिया। वर्ष 2004 में भाजपा सरकार ने भी इसी नियम को बनाए रखा।

शासन के इस निर्णय के लिए समाजसेवी संगठनों ने मामला दायर किया। यह मामला श्री गायकवाड़ के कोर्ट में सुनवाई के लिए पेश हुआ। सुनवाई के बाद उन्होंने अपने फैसले में लिखा कि गेहूं की कीमत प्रति किलोग्राम 8 रुपए है और राज्य सरकार 40 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से दलिया की खरीदी कर रही है। इस मामले की सीबीआई जांच की अनुशंसा करते हुए उन्होंने निविदा को रद्द कर दिया। उनके इस फैसले का असर यह हुआ कि राज्य शासन ने दलिया की खरीदी ही बंद कर दी है।