हेमंत कश्यप, जगदलपुर। जगह- जगह पड़ी हजारों साल पुरानी प्रतिमाओं के लिए बस्तर चर्चित है और इनकी चोरी की खबरें भी आती रहती हैं। इन सबके बीच एक सुखद खबर यह है कि लोहण्डीगुड़ा के ग्रामीण सैकड़ों साल से माता सरस्वती की पूजा तुमरादई के रूप में करते आ रहे हैं। मां सरस्वती की यह मूर्ति बस्तर संभाग में मिली पुरातन एकमात्र सरस्वती प्रतिमा है, जिसकी सुरक्षा धरमाऊर के ग्रामीण पीढ़ी दर पीढ़ी करते आ रहे हैं। पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार यह मूर्ति लगभग 11वीं शताब्दी की है जिसे ब्लैक ग्रेनाइट में उकेरा गया है।

जिला मुख्यालय से 34 किमी दूर ग्राम धरमाऊर के वार्ड क्रमांक एक में 225 वर्ग फुट जमीन पर बना एक मंदिर है, जिसे लोहण्डीगुड़िन देवी का मंदिर कहते हैं। बताया गया कि मां दुर्गा का एक नाम लोहण्डी है। इनके नाम पर ही इस विकासखंड का नाम लोहण्डीगुड़ा पड़ा है। लोहण्डीगुड़िन मंदिर में गभर्गृह के सामने ही भगवान गणेश, माता सरस्वती और काली की तीन दुर्लभ पाषाण प्रतिमाएं रखी हैं। इनमें मां सरस्वती की मूर्ति करीब 55 सेमी ऊंची और 40 सेमी चौड़ी है।

नागवंशी करते थे पूजा

मंदिर के पुजारी जनकराम ठाकुर बताते हैं कि लोहण्डीगुड़िन मंदिर में मां सरस्वती की प्रतिमा सैकड़ों साल से रखी हुई है। ग्रामीण इसे तमूरादई के नाम से पूजते हैं। यह प्रतिमा लोहण्डीगुडी में कैसे पहुंची? इस संबंध में कोई नहीं जानता, परंतु यहां के बुजुर्ग बताते आए हैं कि चित्रकोट में इन्द्रावती नदी किनारे अंतिम नागवंशी राजा हरिश्चंद्र का राज्य था। वे अपनी बुद्धिमती बेटी चमेली के साथ माता लोहण्डी और मां सरस्वती की आराधना करने यहां आया करते थे।

इकलौती प्रतिमा

छत्तीसगढ़ पुरातत्व विभाग के उप संचालक जेआर भगत बताते हैं कि लोहण्डीगुड़ा के गुड़ी में रखी सरस्वती मूर्ति पूरे बस्तर संभाग की सबसे पुरानी एकमात्र सरस्वती प्रतिमा है। यह मूर्ति छिंदक नागवंशीकालीन लगभग 11 वीं शताब्दी की है। इसे 10 साल पहले जगदलपुर स्थित संग्रहालय लाने का प्रयास किया गया था, लेकिन पूजित मूर्ति होने के कारण इसे संग्रहालय लाने का फैसला रद्द करना पड़ा था।