जगदलपुर। गुफाओं, जलप्रपातों और अन्य प्राकृतिक सौंदर्य के खजाने से परिपूर्ण बस्तर में तीरथगढ़ जलप्रपात की कीर्ति पूरे देश में है। बस्तर आने वाले देश-विदेश के सैलानी इस जलप्रपात को निहारने लालायित रहते हैं, लेकिन यहां बस्तर में ही आदिवासियों के पचास से अधिक परिवार हैं, जो तीरथगढ़ जाने से कतराते हैं।

किसी मजबूरीवश यदि तीरथगढ़ जाना भी पड़ गया तो वहां का अन्न-जल ग्रहण नहीं करते। बस्तर, मांदलापाल, सिलकझोड़ी, कावड़गांव आदि दो दर्जन गांवों में निवासरत इन परिवारों के बड़े बुजुर्ग कभी दो सौ-ढ़ाई सौ साल पहले तीरथगढ़ के ही मूल निवासी थे।

किन्हीं कारणों से तीरथगढ़ से पलायन कर ये परिवार निकल गए और जाते-जाते इन्होंने कसम खाई थी कि ये तीरथगढ़ का जल ग्रहण नहीं करेंगे। पूर्वजों की उस कसम का आज भी ये परिवार पालन करते हैं और इनकी कोशिश यही रहती है कि इन्हें तीरथगढ़ जाना न पड़े।

तीरथगढ़ से सैकड़ों साल पहले निकले इन परिवारों के लोग मध्य बस्तर के अलग-अलग क्षेत्रों में निवासरत हैं। इन्हें आज भी तीरथगढिय़ां के नाम से ही जाना-पहचाना जाता है। इन्हें मूलत: गोंड जाति का माना जाता है। इनमें कुछ खुद को बूढ़ादेव का उपासक मानते हैं। ऐसा नहीं है कि इनकी इच्छा औरों की तरह तीरथगढ़ जाने की नहीं होती है पर कसम से बंधे होने के कारण ये खुद को वहां जाने से दूर रखते हैं।

पानी मिलाएंगे तभी जा पाएंगे

बस्तर निवासी पूर्व विधायक अंतूराम कश्यप भी तीरथगढिय़ां परिवार से हैं। उनके पुरखे भी सैकड़ों साल पहले तीरथगढ़ से निकल गए थे। अंतूराम कश्यप बताते हैं कि वे और उनके पुरखों के परिवार जिन्होंने तीरथगढ़ छोड़ दिया था, आज भी तीरथगढ़ नहीं जाते हैं और यदि किसी कारणवश जाना भी पड़ गया तो वहां का अन्न्-जल ग्रहण नहीं करते।

अंतूराम कश्यप के अनुसार जिले के विभिन्न् क्षेत्रों में निवासरत तीरथगढिय़ां परिवार आम सहमति से पानी मिलानें की रस्म पूरी करने पर विचार कर रहे हैं। अंतूराम की माने तो पानी मिलाने की रस्म पूरी करने के बाद वे लोग भी तीरथगढ़ आना-जाना कर सकेंगे और वहां का अन्नजल भी ग्रहण कर सकेंगे।