हेमंत कश्यप, जगदलपुर। आजकल छत्तीसगढ़ के बस्तर सहित पूरे वनांचल में फूलों से लदे बांस को सहज ही देखा जा सकता है। एक ओर जहां ग्रामीणों में फूल और बीज को लेकर उत्सुकता है तो दूसरी ओर कुछ अनहोनी का डर भी सता रहा है क्योंकि अंधविश्वास है कि जिस वर्ष बांस में फूल आते हैं, उस साल अकाल पड़ता है। वनांचल में ग्रामीण बांस के फूल से गिरने वाले बीज को एकत्र कर रहे हैं। वे खाद्य पदार्थ के रूप में इसका उपयोग करते हैं। इसके बीज को पिसवाकर रोटी बनाई जाती है जिसे बेहद पौष्टिक बताया जाता है। बांस के पौधों में लगभग 40-45 साल बाद फूल आते हैं। बीज मिलने की उत्सुकता के बीच ग्रामीण अकाल पडने की चिंता में भी डूब गए हैं। हालांकि वैज्ञानिक इसे महज अंधविश्वास बताते हैं।

बताया गया कि एक ही प्रजाति के जितने भी बांस होते हैं, उनमें प्राकृतिक रूप से एक साथ फूल आते हैं। यह परिवर्तन 40 से 50 साल बाद होता है। फूल आने के बाद बांस सूख जाता है। इधर सूखे बांस के फूलों से बीज झरते हैं। वनांचल के लोग भी इस बीज को संग्रहित कर रखते हैं और समयानुसार इसे खाद्य के रूप उपयोग करते हैं। बस्तर जिले के ग्राम चिलकुटी के रामधन बघेल और अन्य ग्रामीण बताते हैं कि आमतौर पर बांस में फूल आने को ग्रामीण अशुभ मानते हैं।

ऐसी मान्यता है कि जिस साल बांस में फूल आते हैं, उस साल सूखा पड़ता है। इधर बस्तर वन परिक्षेत्राधिकारी देवेंद्र वर्मा इसे मिथ्या बताते हुए कहते हैं कि हर पेड़-पौधे में फल-फूल आने का निर्धारित समय होता है। बांस में 40-50 साल बाद फूल आते हैं और इसके साथ ही उक्त बांस का जीवन चक्र समाप्त हो जाता है इसलिए इसे किसी भ्रांति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। ग्राम गुमलवाड़ा, कोलावाड़ा, कालागुड़ा के ग्रामीण बताते हैं कि बांस के दाने झरने से उसे खाने के लिए जंगली चूहों की संख्या बढ़ गई है। पारद करने जाने वाले ग्रामीण इन दिनों इन चूहों का जमकर शिकार कर रहे हैं।

फूल के लिए नहीं होता निश्चित समय

महासमुंद के वन मंडालाधिकारी आलोक तिवारी बताते हैं कि बांस में फूल आने का कोई निश्चित समय नहीं होता। देश में कई प्रजाति के बांस पाए जाते हैं। लेकिन एक ही प्रजाति के बांस में एक ही समय फूल आते हैं। वहीं पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिकों के शोध में जो तथ्य सामने आए हैं, उसमें बांस की विभिन्न प्रजातियों मे विभिन्न अंतराल पर फूल आते हैं। यह अंतराल 40 से 45 वर्ष तक या इससे भी अधिक का हो सकता है।

1979 में फूल आए थे तब पड़ा था अकाल

बांस में आए फूल के बारे में कई लोगों ने बताया कि जिंदगी में उन्होंने पहली या दूसरी बार बांस में फूल देखा है। महासमुंद जिले के 66 वर्षीय हृदयलाल साखरे, शंकरलाल बताते हैं कि बांस में फूल का खिलना उस पौधे के नष्ट होने की निशानी है। यह बात उन्होंने अपने पूर्वजों से सुनी थी। अब वे देख रहे हैं। उन्होंने बताया कि 1979 में बांस में फूल आए थे। उसके बाद इस साल देखने को मिल रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि इसे संयोग ही कहा जाएगा कि 1979 में प्रदेश में अकाल पड़ा था। महासमुंद जिले के सरायपाली क्षेत्र के निवासी 80 वर्षीय पुरुषोत्तम साखरे ने बताया कि वे तीसरी बार फूल देख रहे हैं। करीब सात-आठ साल की उम्र में उनके दादाजी ने पहली बार दिखाया था। वे बांस में फूल आने को अशुभ नहीं मानते। उन्होंने इसे प्रकृति की रचना बताते हुए कहा कि इसका विपत्ति या अनहोनी से कोई सरोकार नहीं है।

बढ़ जाती हैं चूहों की संख्या

महासमुंद डीएफओ तिवारी बताते हैं कि जिस क्षेत्र में बांस में फूल लगते हैं, तो वहां आसपास काफी संख्या में चूहे आ जाते हैं। बांस का बीज खाने के साथ उनकी प्रजनन क्षमता बढ़ने से इनकी संख्या में वृद्घि हो जाती है। फिर यही चूहे आसपास के खेत और घरों में फसल व अनाज को नुकसान पहुंचाते हैं। चूहों की संख्या बढ़ने से जहां संक्रामक बीमारियां फैलती वहीं फसल और अनाज को चट कर जाने से इलाकों में नुकसान उठाना पड़ता है। लोक इसे ही विपत्ति और अकाल की दृष्टि से देखते हैं।