जगदलपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

जिला मुख्यालय से करीब 35 किमी दूर इन्द्रावती नदी के किनारे शिवमंदिर परिसर में बिखरी पड़ी 10 वीं शताब्दी की मूर्तियों को छ्रिदगांव के ग्रामीण छूने से डरते हैं, चूंकि उनके राजा ने 76 साल पहले उन्हें ऐसा करने से मना किया था। राजाज्ञा की वह तख्ती आज भी इस मंदिर परिसर में टंगी है।

बस्तरवासी अपने राजाओं का आदर करते आ रहे हैं और आज भी उनके आदेशों का सम्मान करते हैं, चूंकि वे बस्तर राजा को ही अपनी आराध्या मां दंतेश्वरी का माटी पुजारी मानते हैं। देश की आजादी के साथ ही 71 साल पहले ही रियासत कालीन व्यवस्था समाप्त हो गई है, लेकिन लोहण्डीगुड़ा विकासखंड के ग्राम छिंदगांव के ग्रामीण आज भी 1942 में जारी राजाज्ञा का पालन कर रहे हैं। दरअसल इंद्रावती किनारे स्थित छ्रिंदगांव के गोरेश्वर महादेव मंदिर में पुराने शिवलिंग के अलावा भगवान नरसिंह, नटराज और माता कंकालिन की पुरानी मूर्तियां हैं। मंदिर के केयरटेकर त्रिनाथ कश्यप, छिंदगांव के गजमन राम कश्यप, अगाधू जोशी बताते हैं कि बस्तर के राजा शिव उपासना के लिए वर्षों से छिंदगांव शिवालय आते रहे और परिसर में पड़ी मूर्तियों को संरक्षित करने का प्रयास करते रहे हैं। उन्ही के आदेश पर सागौन लकड़ी पर खोद कर लिखा गया आदेश मंदिर में है। जिसमें अंग्रेजी और हिन्दी में लिखा है कि इस मूर्ति को हटाना, बिगाड़ना या तोड़ना मना है। वहुक्म बस्तर स्टेट दरबार। सूचना फलक को वर्ष 1942 में बस्तर स्टेट के तत्कालीन कर्मचारियों ने मंदिर परिसर में लगाया था। तब से यहां के ग्रामीण इन मूर्तियों के साथ छेड़छाड़ तो दूर इन्हें दूसरी जगह स्थापित करने का भी कभी प्रयास नहीं किए। बताया गया कि यह मंदिर 1982 से छग पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है। शिवालय में पड़ी पुरानी मूर्तियों को संग्रहालय में लाने का प्रयास किया गया परन्तु ग्रामीणों ने राजाज्ञा के प्रति सम्मान और आस्था के चलते मूर्तियों को संग्रहालय लाने नहीं दिया।

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