दंतेवाड़ा। बस्तर में नासूर बन चुके नक्सल हिंसा के दर्द के बीच कुछ खबरें ऐसी भी आती हैं, जो बताती हैं कि दुनिया इंसानियत से ही चल रही है। दंतेवाड़ा के गुमरगुंडा आश्रम में सत्तर से अधिक नक्सल पीड़ित बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जा रही है। मकसद केवल इतना कि इनकी जिंदगी संवर जाए।

जीवन की जटिल राह में भटकने से बच जाएं। यहां के ज्यादातर बच्चों ने नक्सलियों के खिलाफ चलाए गए सलवा जुडूम अभियान के दौरान अपने परिजनों को खोया है। आश्रम ने इन बच्चों को गोद लिया है। इन्हें किताबी ज्ञान के साथ योग, आध्यात्म, कृषि आदि विषय पढ़ाए जाते हैं।

जिले के गीदम ब्लॉक के गुमरगुंडा दिव्य ज्योति संघ शिवानंद आश्रम में रहकर ये बच्चे शिक्षा ले रहे हैं। आश्रम के संचालक स्वामी विश्वाद्धानंद सरस्वती महाराज बताते हैं कि यहां पढ़ रहे सभी बच्चे गरीब परिवार के हैं। ज्यादातर बच्चों के परिजनों को नक्सलियों ने मार डाला है।

यहां उन्हें इस तरह तैयार किया जा रहा है जिससे जीवन के सभी झंझावातों से निपट सकें। जीवन में आजीविका की दिक्कत न हो। किताबी ज्ञान के साथ उन्हें सुबह-शाम योग व आध्यात्म की शिक्षा दी जाती है। मिट्टी से जोड़े रखने के लिए कृषि का भी ज्ञान कराया जाता है। आश्रम की जमीन पर बच्चे साग-भाजी लगाते हैं, जिसका उपयोग आश्रम में किया जाता है।

1979 में पड़ी थी नींव

आश्रम के उपाध्यक्ष चैतराम अटामी ने बताया कि वर्ष 1979 में इस गुरुकुल की स्थापना की गई थी। यहां दंतेवाड़ा जिले के साथ ही बीजापुर, बस्तर और सुकमा जिले के बच्चे भी रहते हैं। प्रायमरी की पढ़ाई आश्रम में होती है। मिडिल और हाईस्कूल की शिक्षा के लिए बच्चों को गीदम भेजा जाता है।

उनके भोजन, कपड़ा आदि की व्यवस्था आश्रम करता है। कुछ वर्षों से सरकार से भी कुछ सुविधाएं मिल रही हैं। यहां से पढ़कर निकले कई बच्चे सरकारी नौकरियों में हैं। कुछ बच्चे फोर्स में तो कुछ पैतृक संपत्ति संभाल रहे हैं। लक्ष्मीनाथ बारछा शिक्षा पूरी करने के बाद आश्रम में ही शिक्षक हैं।