हेमंत कश्यप, जगदलपुर। कुम्हड़ा, कद्दू, काशीफल, मखना न जाने कितने नाम हैं इसके और न जाने कितनी भ्रांतियां भी इसके साथ जुड़ी हुई हैं। इन सब के बीच बस्तर में कुम्हड़ा को बेहद सम्मान से देखा जाता है। महिलाएं इसे अपना बड़ा बेटा मान काटने से बचती हैं, वहीं आदिवासी समाज इसे सामाजिक फल मानता है और इसे चुराने वाले को दंडित करता है।

संभवत: तमात विशेषताओं के चलते ही दुनिया में कुम्हड़ा एक मात्र ऐसी सब्जी है जिसके नाम से बाकायदा 29 सितंबर को विश्व कुम्हड़ा दिवस मनाया जाता है। बस्तर ही नहीं सभी जगह कुम्हड़ा को आमतौर पर सब्जी के लिए ही उपजाया जाता है। इसके कई व्यावसायिक उपयोग है।

आयुर्वेद में भी इसे औषधीय फल के रूप में महत्व दिया जाता है। बस्तर के गांवों में कुम्हड़ा लगाना अनिवार्य माना जाता है, इसलिए ग्रामीण इसे अपनी बाड़ी में या घर में मचान बनाकर कुम्हड़ा रोपते हैं।

काटना यानि बड़े बेटे की बलि देने जैसा

हिंदू समाज में कुम्हड़ा और रखिया का पौराणिक महत्व है। विभिन्न् अनुष्ठानों में जहां बतौर बकरा के प्रतिरूप में रखिया की बलि दी जाती है। वहीं कुम्हड़ा को ज्येष्ठ पुत्र की तरह माना जाता है। बस्तर की आदिवासी महिलाएं भी इसे काटने से घबराती है।

लोक मान्यता है कि किसी महिला द्वारा कुम्हड़ा को काटने का आशय अपने बड़े बेटा की बलि देना होता है, इसलिए यहां की महिलाएं पहले किसी पुरुष से पहले कुम्हड़ा के दो टुकड़े करवाती हैं, उसके बाद ही वह इसके छोटे तुकड़े करती हैं।

यह भी परंपरा है कि कुम्हड़ा को कभी भी अकेला नहीं काटा जाता। हमेशा एक साथ दो कुम्हड़ा ही काटा जाता है लेकिन एक कुम्हड़ा ही काटना पड़े तो इसकी जोड़ी बनाने के लिए एक नींबू, मिर्च या आलू का उपयोग कर लिया जाता है।

लोक-लाज से बचती हैं महिलाएं

आदिवासी समाज के वरिष्ठ तथा हल्बा समाज के संभागीय अध्यक्ष अधिवक्ता अर्जुन नाग बताते हैं कि पुरानी सामाजिक मान्यता है कि अगर तोड़ते समय नारियल सड़ा निकले तो लोग इसे अशुभ मानते हैं। कुम्हड़ा के साथ भी कुछ ऐसा ही है। इसे महत्वपूर्ण सामाजिक फल माना जाता है।

कहा भी जाता है कि कुम्हड़ा कटा तो सब में बंटेगा। एक कुम्हड़ा की सब्जी कम से कम 30-40 लोगों के लिए पर्याप्त होती है लेकिन अचानक यह खराब निकल जाए तो भोज कार्यक्रम में रुकावट आती है और दूसरी सब्जी तलाशने में समय और धन दोनों जाया होता है।

उपरोक्त धारणा के चलते ही अगर कोई महिला कुम्हड़ा काटे और वह सड़ा निकल जाए तो समाज महिला पर अशुद्ध होने का आरोप लगा देता है, इसलिए लोक-लाज से बचने भी महिलाएं कुम्हड़ा काटने से बचती हैं।

सामाजिक समरसता का प्रतीक

बस्तर में आदिवासी समाज कुम्हड़ा इस कारण रोपते हैं ताकि अपने परिजन या समाज को भेंट कर सकें, इसलिए यहां कुम्हड़ा को सामाजिक सब्जी माना जाता है। कभी भी एक कुम्हड़ा को दो-चार लोगों के लिए कभी नहीं काटा जाता। आदिवासी समाज में परंपरा है कि जब किसी रिश्तेदार के घर या प्रियजन के घर सुख या दुख का कार्य होता है।

लोग उनके घर आमतौर पर कुम्हड़ा भेंट करते हैं। बताया गया कि एक कुम्हड़ा से कम से कम 40 लोगों के लिए सब्जी तैयार हो जाती है। कुम्हड़ा सुलभ और लंबे समय तक सुरिक्षत रहने वाली सब्जी होता है, इसलिए इसे यहां आमतौर पर बड़े भोज में उपयोग के लिए ही उपजाया जाता है।

चुरा लिया तो पांच सौ रुपये तक दंड

भतरा समाज के संभागीय अध्यक्ष रतनराम कश्यप बताते हैं कि कुम्हड़ा को संरक्षति करने और इसकी विशेषता को बनाए रखने के लिए आदिवासी समाज ने बेहतर सामाजिक व्यवस्था कर रखी है, अगर किसी व्यक्ति ने कुम्हड़ा चुराया और समाज में इसकी शिकायत हो गई तो सामाजिक पदाधिकारी आरोपी को पांच सौ रुपये तक का अर्थदंड करते हैं।

इस व्यवस्था के चलते ही परिपक्व कुम्हड़ा ग्रामीणों के घर के ऊपर या बाड़ी में महीनों सुरिक्षत पड़ा रहता है। कुम्हड़ा की विभिन्न विशेषताओं के कारण ही हर साल पूरी दुनिया में 29 सितंबर को प्रतिवर्ष विश्व कुम्हड़ा दिवस मनाया जाता है। कुम्हड़ा को विश्व स्तर पर मिले इस सम्मान को बस्तर की सार्थक और अनुकरणीय परंपरा और बढ़ाती है।