जशपुरनगर नईदुनिया प्रतिनिधि। रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र के प्रमुख मुद्दों को लेकर नईदुनिया ने अभियान शुरू किया था। सभी मुद्दों पर खबर प्रकाशित की गई। इन मुद्दों पर शहरी ही नहीं,ग्रामीण क्षेत्र के लोगों से भी संवाद किया गया। अभियान को आगे बढ़ाते हुए चौपाल लाइव का आयोजन नईदुनिया ने किया था। इन आयोजनों में प्रमुख मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। राउंड टेबल कांपᆬ्रेंस (आरटीसी) का आयोजन किया गया,जिसमें प्रबुद्वजन जुटे और सभी मुद्दों पर खुल कर अपनी बात रखी। समस्याओं के निदान का रास्ता भी बताया। इस कांपᆬ्रेंस में हुई चर्चा के आधार पर राष्ट्रीय,राज्य और स्थानीय स्तर पर तीन-तीन प्रमुख मुद्दे तैयार किए गए हैं।

रेल टर्मिनल और कोरबा-लोहरदग्गा रेल लाइन

पᆬोटो 17 जेएसपी 11 :

रायगढ़ में तात्कालीन रेलमंत्री नीतीश कुमार ने रेल टर्मिनल निर्माण के लिए 1998 में भूमिपूजन किया था। 21 साल गुजर जाने के बाद रायगढ़ में रेल्वे का दोहन तो कई गुना बढ़ा लेकिन सुविधा के विस्तार की मांग को लेकर ना तो सरकार ने पहल किया और ना ही जनप्रतिनिधियों से संसद में आवाज उठाई। नतीजा,टर्मिनल निर्माण का शिलालेख शोपीस बना हुआ है। यही हाल कोरबा-लोहरदग्गा रेल लाइन का भी है। 1970 से लेकर अब तय इस प्रस्ताव को सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल कर रखा हुआ है। केन्द्रीय बजट के आसपास एक-दो दिन मांग को लेकर दो-चार आवाज उठने के बाद जनता भी इसे भूल जाती है। नतीजा उद्योग विकास की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा रायगढ़ जिला और उद्योगविहिन जशपुर जिला दोनों ही रेल मंत्रालय के प्राथमिकता में कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। संसदीय क्षेत्र में सड़क की बदतर स्थिति ने रेल्वे पर लोगों की निर्भरता को तेजी से बढ़ाया है। जशपुर से लेकर रायगढ़ तक तकरीबन 210 किलोमीटर और रायगढ़ से लेकर सारंगढ़ तक 52 किलोमीटर सड़क का निर्माण बरसों से चल रहा है। लेकिन ठेकेदारों की मनमानी के सामने अधिकारियों के घुटने टेक देने की वजह से आम जनता गड्ढे,धूल और कीचड़ से हलाकान है।

समाधान

रेल टर्मिनल और कोरबा-लोहरदग्गा रेल लाइन के मुद्दे को जन आंदोलन का रूप देना होगा। केंद्र और प्रदेश सरकार पर इन मांगों को पूरा करने के लिए दबाव बढ़ाने की आवश्यकता है। राउंड टेबल कांपᆬ्रेंस में शामिल अतिथियों ने इन दोनों ही मद्दों को लेकर हुए आंदोलनों में गंभीरता और निरंतरता के अभाव पर चिंता व्यक्त किया था। प्रबुद्वजनों का मानना है कि रेल सुविधा का विस्तार ही आदिवासी बाहुल्य रायगढ़ जिले के विकास को गति देने का एकमात्र साधन है। ऐसे में अगर जनप्रतिनिधि इसे लेकर सक्रिय नहीं होते हैं,तो बड़ा जनआंदोलन ही एकमात्र विकल्प बचता है।

उत्खनन उद्योग की आहट और गहरा होता प्रदूषण

17 जेएसपी 12 : नईदुनिया में प्रकाशित खबर

लोकसभा का एक जिला रायगढ़,उद्योगों के बढ़ते दबाव की वजह से प्रदूषण समस्या के मकड़जाल में पᆬंस गया है। वहीं उद्योगविहिन जशपुर जिले में उद्योग घराने के आने की आहट मात्र से आए दिन बवाल मच रहा है। रायगढ़ क्षेत्र में कोयला उत्खनन,स्पंज आयरन और इनके सहायक उद्योगों की लंबी पᆬेहरिस्त खड़ी हो चुकी है। इन उद्योगों से निकलने वाला धुआं और राख ने समूचे जिले को अपनी चपेट में ले लिया है। सांस और पानी के माध्यम से प्रदूषण का जहर यहां के लोगों में कैंसर,अस्थमा सहित अन्य गंभीर बीमारियों को पनपा रहा है। रायगढ़ की जीवन रेखा कही जाने वाली केलो नदी का अस्तित्व लगातार सिमटता जा रहा है। प्रदूषण ने नदी,तालाब और कुआं जैसे परंपरागत जलस्त्रोत के साथ भू जलस्त्रोतों में भी प्रभाव छोड़ा है। नतीजा रायगढ़ जिले के शासकीय और निजी अस्पतालों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। स्वास्थ्य समस्या इतनी विकराल होती जा रही है कि इसके सामने सरकारी मशीनरी बौना साबित हो रहा है। वहीं जशपुर जिला अब तक प्रदूषण की मार से कापᆬी हद तक बचा हुआ है। लेकिन यहां की धरती में दबे हुए बाक्साइट,सोना और हीरा जैसे बहुमूल्य खनिजों के दोहन का प्रयास पिछले एक दशक से चल रहा है। लेकिन जनाक्रोश को देखते हुए शासन और प्रशासन के हाथ बंधे हुए हैं। पाट क्षेत्र में बाक्साइट के तीन खदानों से उत्खनन की स्वीकृति शासन स्तर से वर्ष 2011 में ही जारी हो चुकी है। लेकिन उत्खनन का लाइसेंस जारी ना होने की वजह से यह अटका हुआ है।

समाधान

नईदुनिया द्वारा आयोजित राउंड टेबल और चौपाल कार्यक्रम में दोनों ही जिले के लोगों ने इस समस्या पर मुखरता के साथ अपनी बात रखी थी। रायगढ़ जिले को प्रदूषण से मुक्ति दिलाने के लिए उद्योगों से निकलने वाले धुआं और राख के निबटान के लिए सरकार,सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी द्वारा निर्धारित मापदंड का कड़ाई से पालन किए जाने के साथ प्रदूषण का स्तर कम करने के लिए लगाए जाने वाले संयंत्रों को स्थापित कर इनके सतत उपयोग की निगरानी की ठोस व्यवस्था और मापदंड का पालन करने में लापरवाही बरतने वाले उद्योगों का लाइसेंस तत्काल निरस्त करने जैसे कठोर उपाय करने पर जोर दिया गया था। वहीं जशपुर जिले को पूर्व में घोषित ऑक्सीजोन की परिकल्पना को बनाए रखने के साथ पर्यटन उद्योग विकसित करने पर जोर दिया गया है। प्रबुद्वजन के मुताबिक अर्थतंत्र के विकास के लिए मानव जीवन की बलि किसी भी कीमत में नहीं दी जा सकती।

हाथियों का बढ़ता उत्पात

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रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र के दोनों जिले हाथियों के उत्पात से साल भर दहलते रहते हैं। इन अतिकायों के पैरों तले कुचलने से असमय काल के गाल में समाती जिंदगी और ध्वस्त होते घर व खेत अब सिपर्ᆬ मीडिया की सुर्खियां बन कर रह गई है। इन उत्पाती हाथियों को काबू में करने के लिए सोलर वायर से लेकर एलीपᆬेंट कॉरिडोर तक सारे प्रयोग केन्द्र व प्रदेश सरकार द्वारा किया जा चुका है। लेकिन अब तक इसमें सपᆬलता नहीं मिल पाई है। पड़ोसी राज्य ओडिसा की ओर से आने वाले गजराजों के दल का आकार साल दर साल बढ़ता जा रहा है। सिपर्ᆬ रायगढ़ जिले में ही 6 साल के दौरान हाथियों ने 97 लोगों की जान ले ली है। सरकार की भूमिका सिपर्ᆬ पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने तक सिमट कर रह गई है। विपᆬल होते सरकारी उपायों ने अब सरकार के नुमाइंदों का अंदाज भी बदल दिया है। हाथियों को वन सीमा में बांध कर रखने का दावा करने वाले अधिकारी व जनप्रतिनिधि अब सुर बदलते हुए हाथी के साथ साथी बन कर रहने की सलाह देने लगे है। इसके लिए केरल राज्य का उदाहरण भी दिया जा रहा है।

समाधान

उत्पाती हाथियों को काबू में करने के लिए कॉरिडोर जैसी खर्चीली परियोजना से पर्यावरण के जानकार इत्तेपᆬाक नहीं रखते। जानकारों का मानना है कि हाथी समस्या का मूल जंगल का तेजी से घटते हुए क्षेत्रपᆬल से जुड़ा हुआ है। उद्योगों का विकास,अवैध कटाई और आगजनी ने वन के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। इससे हाथियों का प्राकृतिक आवास छीन रहा है। हाथियों के सामने आवास के साथ भोजन व पानी की समस्या भी खड़ी हो गई है। बेघर व भूख-प्यास से बेहाल हाथी अपनी जान बचाने के लिए मानव बस्ती की ओर रूख कर रहे हैं। इसलिए आवश्यक है कि हाथियों का साथी बनते हुए उनके प्राकृतिक आवास वन को संरक्षित करते हुए,यहीं चारा और पानी की समुचित व्यवस्था की जाए। इसके लिए उजड़े हुए वनों को सुधारने की दिशा में तेजी से काम करने के साथ उद्योग,खासकर उत्खनन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया जाए।

बेरोजगारी से युवाओं में गहराती निराशा

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आदिवासी बाहुल्य वाले रायगढ़ लोकसभा में वनांचल जिला जशपुर से लेकर उद्योग नगरी रायगढ़ में भी बेरोजगारी की लंबी तादाद सबसे बड़ा मुद्दा है। कोयला, गौण खनिज एवं वन संपदा की प्रचुरता वाले संसदीय क्षेत्र में युवाओं को रोजगार दिलाने के लिए प्रयास तो हुए लेकिन सरकारी आयोजन एवं कार्यशाला की संख्या दिखाने के अलावा आगे काम नहीं हो सका है। रायगढ़ में कोयले की दर्जन भर से अधिक खदानों एवं स्टील आयरन की 80 से अधिक छोटी,मझोली एवं वृहद कंपनी स्थापित है। स्टील एंड पावर सेक्टर में मल्टीनेशनल कंपनी जेएसपीएल के अलावा महारत्न कंपनी एनटीपीसी का भी पावर प्लांट संचालित है लेकिन इन सबके बाद भी स्थानीय बेरोजगारों एवं प्रभावित ग्रामीणों को यहां रोजगार के अवसर नहीं मिल रहे हैं। रायगढ़ में कई दफे इसके लिए विभिन्न संगठनों ने आवाज उठाई लेकिन हुआ कुछ भी नहीं, अब यही कारण है कि आज प्रदेश में सबसे ज्यादा बेरोजगार की संख्या में दुर्ग जिले के बाद रायगढ़ का ही नाम आता है। प्रदेश में शिक्षित बेरोजगारों के सरकारी आंकड़ें को ही पूरी सच्चाई मान लिया जाए तो 23 लाख 23 हजार युवक-युवतियां यहां बेरोजगार हैं। दुर्ग में इसकी संख्या सर्वाधिक 2 लाख 88892 है तो इसके बाद बेरोजगारों में रायगढ़ का ही नाम है। यहां पर 1 लाख 79 हजार बेरोजगार हैं। इसमें 1 लाख 18968 युवक एवं 60775 युवतियां बेरोजगार हैं। जशपुर जिले के 74960 बेरोजगारों को शामिल कर लिया जाए तो रायगढ़ लोकसभा बेरोजगारों को ढोने में प्रदेश में सबसे आगे है।

समाधान

क्षेत्र में स्थापित होने वाले उद्योगों में स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार देने की नीति का सख्ती से पालन करने के साथ बेरोजगारों को कौशल विकास योजना से जोड़ कर उन्हें तकनीकी रूप से शिक्षित करने की आवश्यकता है। रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र में गत 15 साल के दौरान हुए पॉलीटेक्निक,आईटीआई शिक्षण संस्थाओं के विस्तार के बावजूद इन संस्थानों में दिए जाने वाले शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार की बहुत गुंजाइश अब भी है। शिक्षित बेरोजगार युवाओं को रोजगार मार्गदर्शन के लिए कार्यशाला और प्लेसमेंट कैंप जैसे आयोजन की विस्तार की संभावना है।

साल दर साल गहराता जलसंकट

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समूचा लोकसभा क्षेत्र गहरे जल संकट की ओर तेजी से बढ़ रहा है। रायगढ़ क्षेत्र में जलस्त्रोतों को अंधाधुंध दोहन और जशपुर जिले में भू जलस्तर की बदतर स्थिति, भयावह स्थिति की ओर संकेत कर रहे हैं। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड मिनिस्ट्री आपᆬ वाटर रिसोर्स से दो वर्ष पूर्व जारी एक नक्शे में जशपुर जिले को एक एलपीएस वाला क्षेत्र बताया गया है। यहां आधा एचपी या इससे कम के ही बोर चलाए जा सकते हैं। एक एचपी के बोर की क्षमता 15 लीटर प्रति मिनट होती है । कृषि कार्य के लिए 2 एचपी या इससे अधिक क्षमता के पंप की आवश्यकता होती है। रिर्पोट के अनुसार ग्राउंड वाटर से यहां कृषि कार्य तो बिल्कुल ही संभव नहीं है, वहीं ग्राउंड वाटर के भरोसे यहां पेयजल व्यवस्था का संचालन संभव नहीं है। इस जानकारी के बाद बोरों की खुदाई भी रेत से तेल निकालने के समान है। बोर्ड ने ग्राउंड वाटर के स्तर को पांच भागों में विभाजित किया है। नक्शे में इसे क्रमश हरा,आसमानी,पीला,भूरा और बैगनी रंग में दिखाया गया है । बैगनी रंग पांचवा और सबसे खराब स्थिति को चिन्हित करता है। जशपुर जिले के पूरे भाग को बैगनी रंग से दर्शाया गया है। ऐसे क्षेत्रों में आधा एचपी या इससे कम के बोर ही चलाए जा सकते है,जिसमें भी अनिश्चतता बनी रहती है। इन स्थानों पर सतही एंव कम सतही जल स्त्रोतों का संरक्षण कर ही आने वाले जल संकट से बचा जा सकता है। इन स्त्रोतों में नदी,तलाब,कुआं जैसे जलस्त्रोत आते हैं। इसके साथ ही जिले में लगातार जलस्तर भी घटता जा रहा है। पिछले 5 वर्षों में यहां जल स्तर में लगभग 5 मीटर की गिरावट आई है,यह भी चिंता की बात है। पेयजल आपूर्ति को लेकर नगरपालिका क्षेत्र की चर्चा करें तो यहां सामान्य दिनों में प्रति व्यक्ति 65 लीटर प्रतिदिन की आवश्यकता होती है, लेकिन प्रति व्यक्ति 55 लीटर पानी ही प्रति व्यक्ति उपलब्ध है। आपूर्ति की स्थिति पᆬरवरी और मार्च माह से अधिक खराब हो जाती है, जब जल स्त्रोतों में जल का स्तर कम हो जाता है और पानी के लिए मारामारी शुरू हो जाती है।

पहाड़ी कोरवा और बिरहोर जाति का विकास

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पहाड़ी कोरवा और बिरहोर जनजाति मूलतः गहरे वन्य क्षेत्र में निवास करने वाली जातियां हैं। इन्हें विकास की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए मध्यप्रदेश शासन काल में वन्य क्षेत्र से निकाल कर गांव में बसाया गया था। इनके विकास के लिए पहाड़ी कोरवा और बिरहोर जनजाति विकास प्राधिकरण का गठन भी किया गया है।सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार बिरहोर की संख्या,पहाड़ी कोरवाओं से कापᆬी कम है। जिले के बगीचा, कुनकुरी और मनोरा विकासखंड के 94 गांवों में 4110 परिवार निवासरत हैं। इनकी कुल जनसंख्या 14608 है। वहीं बिरहोर जनजाति जिले के कुनकुरी, बगीचा, कांसाबेल, दुलदुला और पत्थलगांव विकासखंड के 12 गांव में मात्र 161 परिवार ही है। इनकी कुल आबादी भी मात्र 515 है। इनमें 249 महिला और 266 पुरूष शामिल हैं। अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे बिरहोर राजनीति के वोट बैंक के गणित में पिᆬट नहीं बैठते हैं। यही कारण है कि पहाड़ी कोरवाओं की तरह इन्हें अब तक ना तो राजनीति में महत्व मिल पाया है और ना सुर्खियां। यही हाल पहाड़ी कोरवा जनजाति की भी है। जशपुर जिले के बगीचा और मनोरा तहसील में इस जनजाति का प्रमुख आवास है। अल्प संख्या में कुनकुरी और पᆬरसाबहार तहसील में भी ये निवास करते हैं। विडंबना ही है कि खुड़िया रियासत से जुड़े कोरवाओं को सरकार ने पहाड़ी और दिहाड़ी कोरवा में विभाजित कर दिया। इस विभाजन ने कोरवाओं की विकास की गति को तो प्रभावित किया ही,साथ ही इनकी पहचान पर भी सवालिया निशान लगा दिया। दिहाड़ी कोरवाओं को ना तो विशेष संरक्षित जनजाति का दर्जा मिल रहा है और ना ही सरकारी योजनाओं का लाभ इन तक अपनी पहुंच बना पा रही है। सरकार ने 1925 में हुए सेटलमेंट के तहत जमीन का मालिक तो इन्हें बना दिया,लेकिन गरीबी की वजह से अधिकांश कोरवा,जमीनों को बड़े किसान और साहूकारों के पास गिरवी रख कर या किराए में देकर अपने ही खेत में मजदूरी करने के लिए विवश है। पहाड़ी कोरवाओं के नाम पर हो रही सियासत ने इस जनजातियों को राजनीतिक रैलियों और आम सभाओं का शो पीस बना कर रख दिया है।

समाधान

करोड़ों रूपए बहाने के बाद भी पहाड़ी कोरवा और बिरहोर जाति के विकास से कोसो दूर रहने का प्रमुख कारण,सरकारी योजनाओं का जमीन से जुड़ाव की कमी रहा है। योजना तैयार करने वाले आला अधिकारी जमीनी हकीकत से अंजान होते हैं। गांव में निवास करने के बावजूद यह दोनों जनजातियां अब तक स्वयं को ग्रामीण परिवेश में समाहित नहीं कर पाई है। स्कूल अब भी पहुंच से दूर है। पहाड़ी कोरवा जनजाति धीरे-धीरे शिक्षा के उजियारे की ओर बढ़ रही है,लेकिन बिरहोर अब भी समाज और शिक्षा से दूर रह कर एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे है। सरकारें अब इस प्राधिकरण के लिए बजट उपलब्ध कराने से भी गुरेज करने लगी है। विगत 10 साल में महज 90 लाख प्राधिकरण को मिलना सरकारी उदासीनता को दर्शाता है। जानकारों का मानना है कि पहाड़ी कोरवा व बिरहोर जनजाति को सबसे पहले आम लोगों के साथ घुलने के लिए मानसिक रूप से तैयार करने की आवश्यकता है। इसके बाद शिक्षा और सामाजिक विकास की ओर ये स्वतः ही बढ़ने लगेगें। इसके लिए सरकारी योजनाओं में जनसहभागिता को बढ़ावा देना आवश्यक है।

बाक्स - मतदाताओं की संख्या -

विधानसभा मतदाता

जशपुर 221785

कुनकुरी 194822

पत्थलगांव 215041

लैलूंगा 194789

रायगढ़ 249437

सारंगढ 245308

खरसिया 205660

धरमजयगढ़ 1727327

बाक्स 2 - जनसमस्याओं का ब्यौरा

संसदीय क्षेत्र में रेल सुविधा के विस्तार की कमी

हाथियों का बढ़ता आतंक

बढ़ता प्रदूषण और उद्योगों के खिलापᆬ गहराता जनाक्रोश

साल दर साल गहराती जल समस्या

उद्योग विस्तार के बावजूद खड़ी होती बेरोजगारों की पᆬौज

कोरवा,बिरहोर,झोरा जैसी जनजातियों के विकास की उपेक्षा

संसदीय क्षेत्र के प्रत्याशी -

प्रत्याशी राजनीतिक दल

श्रीमती गोमती साय भारतीय जनता पार्टी

लालजीत राठिया राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी

विजय लकड़ा शिवसेना

कृपाशंकर भगत भारतीय ट्राइबल पार्टी

प्रकाश उरांव निर्दलिय

तेजराम सिदार निर्दलिय

नवल किशोर राठिया निर्दलिय

वीर कुमार तिग्गा बहुजन मुक्ति मोर्चा

ज्योति भगत किसान मजदूर संघ

अमृत तिर्की निर्दलिय

इनोसेंट कुजूर बहुजन समाज पार्टी

संसदीय क्षेत्र का विहंगम परिदृश्य

कुल मतदाता - 2815361

महिला मतदाता

पुरूष मतदाता

कुल मतदान केन्द्र

कुल विधानसभा क्षेत्र 8