0.वट वृक्ष का पूजन कर दिया प्रकृति व पर्यावरण संरक्षण का संदेश

पᆬोटो क्रमांक- 15जेएसपी 1, जेएसपी 2 जशपुर में पूजा करती महिलाएं । जेएसपी 3 कोतबा में पूजा करती महिलाएं।

जशपुर /कोतबा। नईदुनिया प्रतिनिधि। अखंड सौभाग्यवती बनने, पति के लंबी आयु सहित समृद्वि की कामना लिए महिलाओं ने मंगलवार को वट सावित्री का पूजा किया। साथ ही जिले भर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर चल रहे माहौल से भी इस पर्व और पूजा को जोड़कर महिलाओं ने अनुष्ठान किए और पर्यावरण संरक्षण की भी कामना की। कई स्थानों पर पति की लंबी आयु के लिए प्रार्थना के साथ ही पर्यावरण संरक्षण और पौधरोपण का भी व्रति महिलाओं ने संकल्प लिया।

वट सावित्री व्रत अखंड सौभाग्य की कामना लिए महिलाएं रखती हैं और यह दिन उनके लिए खास होता है। बरगद के पेड़ के लिए नीचे व्रत रखकर पूजा अर्चना करते महिलाएं देखी गईं। वट वृक्ष के पास एकत्रित होकर पूजा अर्चना के बाद बरगद के पेड़ पर परिक्रमा करते हुए व्रति महिलाओं ने पति के दीर्घायु होने की कामना की। इस दौरान पारंपरिक कथा भी सुनते महिलाओं को समूह में देखा गया। वट सावित्री व्रत सुहागिनों के लिए अन्य किसी व्रत की अपेक्षा अत्यधिक महत्व का होता है। जिला मुख्यालय में सन्ना रोड महाराजा चौक के पास स्थित वट वृद्घ में सबसे अधिक भीड़ देखने को मिली। जहां बड़ी संख्या में बारी-बारी से समूह में महिलाओं ने पूजा, अर्चना करते हुए परिक्रमा किया। इसके साथ ही पुलिस लाइन, बालाजी मंदिर, भागलपुर, बांकीटोली, गम्हरिया, दरबारीटोली में बड़े रूप में समूह में महिलाओं को पूजा अर्चना करते देखा गया। कोतबा के वार्ड क्रमांक 9 में मुख्य मार्ग में स्थित वट वृक्ष की पूजा सैकड़ो व्रती महिलाओं के द्वारा की गई। व्रतियों ने सुबह से ही यहां आना शुरू कर दिया था। सभी नए वस्त्र पहनकर, सोलह श्रृंगार कर पूजन की सारी सामग्री को एक टोकरी, डलिया, दोना में सजाकर लाइं और पूजा में शामिल हुईं। इसके बाद सबसे पहले सत्यवान और सावित्री की मूर्ति को वहां स्थापित किया गया। इस दिन के पूजा में सामग्रियों का भी विशेष महत्व होता है। पूजा में धूप, दीप, रोली, भिगोए चने, सिंदूर ,बांस का पंखा, लाल या पीला धागा, धूपबत्ती, फूल, कोई भी पांच फल, जल से भरा पात्र, सिंदूर, लाल कपड़ा आदि से वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ का पूजन किया गया। इस व्रत को वरदगाई भी कहा जाता है। वट सावित्री व्रत में मुख्यरूप से सत्यवान और सावित्री की कथा कही गई। पं आदित्य पाठक ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार इस दिन सावित्री अपने पति सत्यभामा के प्राण यमराज से वापस ले आई थी। इसीलिए उन्हें सती सावित्री कहा जाता है। यह व्रत विवाहित स्त्रियों के लिए खास महत्व का होता है। ऐसा माना जाता है कि आज व्रत को रखने से वैवाहिक जीवन में आने वाले सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और हमेशा सुख शांति बनी रहती है।

नवेली दुल्हनों का उत्साह

पᆬोटो क्रमांक- जेएसपी 4, जेएसपी 5 नवविवाहिता घर में वट सावित्री की पूजा करते हुए।

वट सावित्री पूजा में नवविवाहिता महिलाओं में कापᆬी उत्साह देखने को मिला। रिम्मी पाठक, कंचन पाठक, पूनम साहू, मोना व्रत को वैज्ञानिकता के साथ जोड़ते हुए इस दिन को महत्वपूर्ण बताती हैं। रिम्मी पाठक ने कहा कि बताया कि धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग में भगवान श्रीराम एवं द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण द्वारा पेड़ों की पूजा करने के उदाहरण मिलते है। वनस्पति विज्ञान की रिपोर्ट के अनुसार यदि बरगद के वृक्ष न हों तो ग्रीष्म ऋतु में जीवन में काफी कठिनाई होगी। वनस्पति विज्ञान की एक रिसर्च के अनुसार सूर्य की उष्मा का 27 प्रतिशत हिस्सा बरगद का वृक्ष अवशेषित कर उसमें अपनी नमी मिलाकर उसे पुनः आकाश में लौटा देता है। जिससे बादल बनता है और वर्षा होती है। रिम्मी पाठक ने बताया कि वट वृक्ष प्राणवायु आक्सीजन प्रदान करने के प्रमुख और महत्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए प्रतिकात्मक रूप से ही सही इस पौधे को घर में एक नियत समय तक गमला में भी रखा जा सकता है और पौधा बड़ा होने पर किसी खाली स्थान में इसे स्थापित करते हुए संरक्षण करना चाहिए। श्रीमती कंचन ने बताया कि आज का दिन उनके लिए विशेष महत्वपूर्ण इसलिए भी रहा क्योंकि आज उनका वैवाहिक वर्षगांठ है, वे खुद को सौभाग्यशाली मानकर इस दिन को श्रद्घा और विश्वास के साथ मना रही हैं। कंचन कहती हैं कि इस व्रत से जहां संबंध में प्रगाढ़ता देखने को मिलती है वहीं पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी छुपा है। नवविवाहिता पूनम साहू भी इस दिन को अपने लिए खास बताते हुए गमले में लगाए पौधे की पूजा की।

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