पूनमदास मानिकपुरी, कोंडागांव। बस्तर अंचल के हाट बाजार का नाम आते ही सैलानियों का मन जिज्ञासा से भर जाता है। पॉलिथीन के तंबू व खपरैल की गुमटियों के नीचे सजी दुकान में ग्रामीणों की जरूरत का सामान मुहैया कराते व्यापारी व वनोपज का क्रय विक्रय करते लोग, लड़ाकू मुर्गे के साथ ग्रामीण संस्कृति को दर्शाते लोग। सप्ताह के दिन विशेष पर विभिन्न गांव में भरने वाले बाजार का एक हिस्सा ऐसा भी होता है, जहां महुएं और गुड़ की देसी शराब, सल्फी, पेंडूम आदि नशीले पदार्थों का खुलेआम कारोबार होता है।

इसे बेचने वालों के लिए यह एक रोजगार है। वहीं इस बाजार में नशे के तलबगार भी दूरदराज से पहुंचते हैं। जिनके पास पैसा नहीं होता, बाजार आकर उनकी भी तलब पूरी हो जाती है क्योंकि इसके कारोबारी पहले थोड़ी सी मात्रा चखने के लिए देते हैं। 2-4 विक्रेताओं का शराब चखने पर नशे के तलबगारों का बगैर पैसे भी काम हो जाता है।

बच्चे और महिलाएं भी ग्राहक

बाजार स्थल से चंद मीटर दूर पेड़ की छांव या पॉलिथीन के नीचे दुकानें सजती हैं। कोई शराब बेचता है, कोई सल्फी तो कोई चखना सामग्रियों की दुकान लगाते हैं। जिला मुख्यालय कोंडागांव से 50 किलोमीटर दूर ओडिसा की सरहद पर ग्राम गमरी स्थित है। यहां प्रति रविवार बाजार के दिन नशीले पदार्थों का अलग से बाजार भरता है।

बाजार में देर शाम तक नशा करने वालों का हुजूम लगा रहता है। बच्चों से लेकर बूढ़े तक इस बाजार का आनंद लेते हैं। महिलाएं भी इसमें पीछे नहीं हैं। बाजार में लांदा या पेंडुम बेचती महिला गंगा ने बताया की 10 रुपये प्रति गिलास की दर से पेंडुम बेचती हैं। क्षेत्र में तेज धूप होने के चलते पेंडुम की मांग बढ़ी है।

नहीं होती कार्यवाही

शराब सेवन के पश्चात उपजे विवाद के चलते कई परिवार बेघर हो चुके हैं। बंदिश ना होने के चलते सल्फी व पेंडुम की आढ़ में शराब का कारोबार बेखौफ जारी है। आदिवासियों को 3 से 5 लीटर तक शराब बनाने की छूट मिली हुई है।

इसके बावजूद पुलिस और आबकारी अमला अपने टारगेट को पूरा करने के लिए शराब परिवहन करते आदिवासियों को गिरफ्तार कर उसमें पानी मिलाकर छूट से अधिक बताकर जेल भेजते हैं। लेकिन बाजारों में चल रहे नशे के खुले कारोबार पर रोक लगाने की पहल न तो प्रशासन की ओर हो रही है और न ही समाज के द्वारा।