कोण्डागांव। चैत्र माह में बस्तर संभाग के कांकेर क्षेत्र के कुछेक गांवों को छोड़ लगभग सभी गांव में माटी तिहार मनाया जाता है। माटी तिहार का मतलब मिट्टी की पूजा कर अच्छी फसल के लिए धन्यवाद अदा करना है। यह पर्व चैत्र माह में मनाया जाने वाला एक दिवसीय पर्व है। परन्तु अलग-अलग गांवों में अपने मर्जी से अलग-अलग दिन में मनाया जाता है जिसे गांव के गायता, पुजारी एवं समुदाय के सभी लोग मिल कर तय करते हैं।

मूलत: आदिवासियों का त्योहार होने के बावजूद सभी स्थानीय जातियां इस रिवाज जुडे़ हैं। इस पर्व मे गांव के

लोग इस दिन माटी से संबंधित किसी प्रकार से कोई भी कार्य नही किए जाते जैसे मिट्टी खोदना, खेतों मे हल चलाना, यदि कोई इस तरह से कार्य करते पाया गया तो समुदाय द्वारा उस व्यक्ति को दण्डित किया जाता है। इसत्योहार में गांव के प्रत्येक घरों से चंदा लिया जाता है जो कि समुदाय जमा होता है।

किसी पर किसी प्रकार की कोई दबाव नहीं होता कुछ पूजा स्थल में ही चंदा लेकर आते हैं। लोग रुपये पैसे के अलावा चावल, दाल, सब्जी, फल, कांदा, पशु, पक्षी की भेंट देते हैं। आज कल लोग सड़कों पर भी आने जाने वाले राहगीरों के रास्ते पर आड़ा लगा कर रास्ता रोक कर चंदा मांगा करते हैं। यह पूजा देव कोट पर किया जाता है।

नईदुनिया टीम जब कोण्डागांव जिला के मर्दापाल थाने से लगे पांच किमी दूर ग्राम पंचायत कुरुसनार में सुबह पहुंची और गांव के गायता, पुजारी, पटेल, कोटवार से त्योहार की जानकारी ली। ग्रामीण त्योहार मनाने देवकोट में आस्था के अनुसार दाल, चावल व पूजा सामग्री, सल्फी, लंदा दाडगो ( अल्कोहल पेय ) साथ लिए थे। सुबह से ही मोहरी नगाड़ा व तुड़बुड़ी की आवाज दूर तक आसानी से सुनी जा सकती थी। तकरीबन ग्यारह बजे तक युवा भी अपने ढ़ोल के साथ पहुंच गए। ढ़ोल बजते हुए त्योहार मनाने ग्रामीण एक-एक कर देवकोट में आतेचले गए।

एक-दूसरे को लगाते हैं मिट्टी का लेप

अब गायता पुजारी द्वारा अपने माटी देवकोट मे बुढ़ादेव को फूल, नारियल सुपारी चढ़ा कर माटी की स्तुति की गई ताकि पूरे गांव में साल भर सुख शांति बना रहे, किसी प्रकार कोई विपत्ति मुसीबत का सामना करना न पड़े।लोग एक दूसरे पर मिट्टी का लेप लगाते हैं।

शाम को सभी भोजन कर ढ़ोल, मांदर रेला गाकर खुशी मनाते है। कुरुसनार के सिरहा फूलसिंह, घासीराम, मंगुराम, रत्तुराम ने बताया कि माटी देव या बुढ़ादेव को ग्राम का प्रमुख देवता माना जाता है तथा इसके पुजारी को भी प्रमुख पुजारी की मान्यता मिली हुई है। आदिवासी प्रकृति के उपासक हैं।

उनका कफन-दफन भी मिट्टी में होता है। माटी त्योहार से साल भर के त्योहार की शुरूआत होती है और मेला-मड़ई के साथ समाप्ति होती है। माटी देव की पूजा के साथ हीं अंचल में खेती किसानी का काम शुरू हो जाता है। मिट्टी आदिवासियों को प्राणाें से भी प्रिय है इस पर उनकी आस्था ही है जो लोगों के सच या झूठ की पहचान होती है और मान्यता है कि मिट्टी की कसम (माटी किरीया) खाकर आदिवासी झूठ नहीं बोलते हैं।