कोरबा, नईदुनिया प्रतिनिधि। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सामान्य प्रसव से जन्मीं नवजात ने अभी सांस लेना शुरू ही किया था, कि सांस अटकने वाली एक घटना से उसकी मां की धड़कन बढ़ा दी। जहां पर प्रसव हुआ, उसी जचकी कक्ष में नवजात को गर्म रखने बेबी वार्मर उपकरण रखा था। नर्स ने जैसे ही शिशु को बेबी वार्मर में रखने की सोची, ऊपर छत का प्लास्टर उखड़कर नीचे आग गिरा। सौभाग्य से नवजात सुरक्षित थी, पर इस घटना से एक बार फिर स्वास्थ्य विभाग की बदहाल हो चली व्यवस्था जाहिर हो गई। खास बात यह है कि पीएचसी के लिए हर साल मरम्मत व रखरखाव के लिए डेढ़ लाख भेजे जाते हैं, जिसका इस्तेमाल किस तरह हो रहा, इस घटना से स्पष्ट हो जाता है।

प्रसव कक्ष में छत के प्लास्टर उखड़ने की यह घटना प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चाकाबुड़ा की है। प्रसव पीड़ा शुरू होने पर ग्राम पंचायत चाकाबुड़ा के सलिहापारा निवासी धनसाय पटेल ने अपनी पत्नी शारदा को यहां भर्ती कराया था। रविवार की सुबह करीब 11.30 बजे वह पीएचसी आई और यहां कार्यरत एएनएम हेमलता ध्रुव की देखरेख में शाम को सामान्य प्रसव से एक स्वस्थ बालिका का जन्म हुआ। प्रसव के बाद मां की गोद की तरह गर्माहट बनाए रखने नवजात बच्चों के लिए विशेष उपकरण होता है, जिसे बेबी वार्मर कहते हैं।

पीएचसी के प्रसव कक्ष में ही वह रखा हुआ था, जिसमें उस शिशु को रखने की तैयारी थी। इससे पहले ही एएनएम ऐसा कर पाती, उपकरण के ऊपर छत का प्लास्टर उखड़ गया और मलबा नीचे आ गिरा। दुर्भाग्य से अगर नवजात उसकी चपेट में होता, तो बड़ी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता था। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि पीएचसी चाकाबुड़ा के इस भवन में समुचित मरम्मत की तत्काल जरूरत है, बावजूद इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जीवनदीप समिति की ओर से हर साल पीएचसी के रखरखाव एवं मरम्मत कार्य के लिए डेढ़ लाख की राशि भेजी जाती है। उस राशि का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है, इस घटना से पता चलता है।

कायाकल्प दिखाने दो साल पहले पुताई

शासन की ओर से सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था में निखार लाने कायाकल्प योजना संचालित है, जिसकी दौड़ में इनाम जीतने की उम्मीद लेकर पीएचसी चाकाबुड़ा को भी शामिल किया गया था। कायाकल्प के लिए अस्पताल को चाक-चौबंद दिखाने पुताई कर दी गई। दीवारों की रौनक बढ़ाने यह पुताई भी करीब दो साल पहले किया गया था और उसी दौरान कुछ स्थानों पर उखड़े प्लास्टरों को भी ठीक किया गया। पर जरूरत के अनुरूप समुचित मरम्मत नहीं किए जाने के कारण यह घटना सामने आए, जिसकी चपेट में आकर कोई भी बुरी तरह घायल हो सकता था। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग के उन अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं, जिन पर इनका दायित्व है।

भवन में पूर्ण नवीनीकरण की जरूरत

पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की स्वीकृति पर निर्माण एजेंसी रहे ग्रामीण यांत्रिकी विभाग ने इस अस्पताल का निर्माण 24 फरवरी 2009 में किया था। भवन का लोकार्पण पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने किया था। इस दस साल पुराने भवन में पूर्ण रूप से नवीनिकरण एवं जीर्णोद्धार की तत्काल जरूरत है, जिस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। जीवनदीप समिति की ओर से हर साल पीएचसी को ओवर आल डेढ़ लाख की राशि मुहैया कराई जाती है, जिसमें करीब 50 हजार आया व चौकीदार को मानदेय दिया जाता है। शेष राशि से पुताई, रखरखाव, स्टेशनरी, हॉस्पिटल इक्युपमेंट, कुर्सी-फर्नीचर समेत अन्य खर्चे निपटाए जाते हैं। अन्य खर्च तो हुए पर मरम्मत नजरंदाज किया गया।

डॉक्टर है नहीं और एंपावरमेंट पर जोर

चाकाबुड़ा पीएचसी में औसतन हर माह 11 डिलवरी होती है। पूर्व में यहां सहायक चिकित्सा अधिकारी बैठते थे, तब 40 मरीज की ओपीडी भी थी, जो अब बमुश्किल आठ-दस पर सिमट गई है। कुछ वक्त से इसे छोड़कर स्वास्थ्य विभाग हमर गांव हमर अस्पताल योजना के तहत ढेलवाडीह अस्पताल के निखार पर फोकस कर रहा। इस बार आए डेढ़ लाख में 50 हजार रुपये भी ढेलवाडीह पर खर्च कर दिए गए। डॉक्टर व तकनीशियन की कमी से जूझ रहा स्वास्थ्य विभाग भवन चमकाने जुटा है। सुरक्षित व संतोषजनक इलाज की उम्मीद लेकर आए मरीजों को चिकित्सा जैसी अत्यावश्यक सेवा में लापरवाही से यह अस्पताल मर्ज से राहत की बजाय दर्द का कारण बन रहा।