कोरबा। जिला मुख्यालय से 13 किलोमीटर दूर कोरबा—पंतोरा मार्ग के ग्राम कनकी में स्थापित स्वयंभू कनकेश्वर महादेव का एक मंदिर ऐसा है जहां स्थापित शिवलिंग का आकार लगातार बढ़ता जा रहा है। शिवलिंग की पूजा पिछले 17 पीढ़‍ियों से गांव के यदुवंशी परिवार कर रहा है। ऐतिहासिक महत्व के इस शिवमंदिर में शिवलिंग का आकार बढ़ने से पूजन स्थल संकरा पड़ने लगा है।

यह कहना है मंदिर के प्रधान पुजारी पुरूषोत्तम यादव का। जो बचपन से मंदिर में पूजा कर रहे हैं। कनकेश्वर महादेव के नाम से विख्यात मंदिर में प्रतिवर्ष सावन फागुन माह के शिवरात्रि के महीने में मेला लगता है। 4 मार्च को आयोजित पर्व को लेकर ग्रामीणों में अपार उत्साह देखा जा रहा है। मंदिर के प्रधान पुजारी पुरूषोत्तम यादव का कहना है कि वे 17 पीढी से स्वयंभू कनकेश्वर शिव की पूजा करते आ रहे हैं। शिवलिंग के उद्भव के बारे में पुरूषोत्तम का कहना है कि उनके पूर्वज बैजू यादव गांव की गाय चराने का काम करते थे। जिस स्थान पर शिव मंदिर है, वहीं पर झुंड की एक गाय अपना दूध गिराया करती थी।

रोज दूध गिराने से बैजू को गाय मालिक से डांट खानी पड़ती थी। बैजू ने उस गाय पर नजर रखना शुरू कर दिया। उसने फिर देखा कि पत्थर जितनी छोटी सी आकृति पर गाय दूध गिरा रही है। बैजू पत्थर को हटाने उस पर अपनी लाठी दे मारा, जिससे पत्थर का छोटा सा टुकड़ा अलग हो गया। इस घटना के बाद रात को बैजू को स्वप्न आया कि जिसे पत्थर समझकर उसने हटाने की कोशिश की है, वह वास्तव में शिवलिंग है। बैजू दूसरे दिन उस स्थल की मिट्टी हटाकर देखा तो शिवलिंग था। लिंग के स्वयंभू होने से गांव के लोग पूजा करने लगे और बैजू को पुजारी नियुक्त किया गया, तब से उसकी पीढ़ी पूजा करते चली आ रही है।

मंदिर परिसर में प्रवासी पक्षियों का डेरा

कनकी के विभिन्न विशेषताओं में एक विशेषता प्रवासी पक्षियों का मंदिर परिसर के पेड़ों में डेरा बनाना भी है। प्रतिवर्ष जून माह में श्रीलंका से आने वाले पक्षी एशियन बिलस्टॉक पेडों पर घोसला बनाते है। यहां नवजात पक्षियों के प्रजनन के लिए अंडे भी देते हैं। पक्षी उड़ान भरने योग्य हो जाते हैं, तब वे वापस चले आते हैं। पक्षियों का यह झुंड़ केवल मंदिर परिसर के पेडों पर ही देखा जाना आश्चर्य का विषय है।

कनकी चढ़ाने की महिमा

कनकेश्वर शिव नाम पड़ने के बारे में पुजारी पुरूषोत्तम का कहना है कि शिवलिंग का प्राकट्य जब हुआ, उस समय शिवलिंग में कनकी रखा हुआ था। चावल के टुकड़े को छत्तीसगढ में कनकी कहा जाता है। कनकी का चढ़ावा होने से शिवलिंग को कनकेश्वर महादेव के नाम से जाना गया। कनकेश्वर महादेव के कारण यहां के बसाहट गांव का नाम भी कनकी पड़ा। पुजारी का कहना है कि शिवलिंग में चावल चढ़ाने से भगवान शिव दरिद्री दूर करते हैं।

कवच से ढ़ंकने का रहस्य

शिवलिंग में प्रतिदिन सैकड़ों की तादाद में दूरदराज से श्रद्धालु आते हैं। सुबह व शाम के समय होने वाली आरती में ग्रामीण सहित श्रद्धालुओं की उपस्थिति होती है। शिवलिंग के उपरी हिस्सा, जहां पर कटे का निशान है, वहां से पत्थर का क्षरण हो रहा था। लगातार जल चढ़ाने से कटे का निशान भी बढ़ रहा था। जिसे देखते हुए तात्कालिक पुरातत्व अधिकारी व डिप्टी कलेक्टर हरिकृष्ण शर्मा ने चांदी का कवच लगाने की सलाह दी, तब से शिवलिंग में चांदी का कवच लगा है।