नईदुनिया विशेष

कोरबा । नईदुनिया प्रतिनिधि

आकस्मिक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल लोगों व गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को इमरजेंसी में अस्पताल पहुंचाने वाली संजीवनी 108 और महतारी 102 के वाहनों को खुद के इलाज के लाले पड़ गए हैं। मेंटेनेंस नहीं होने की वजह से 11 संजीवनी में तीन कंडम व दो खराब हो चुके हैं। कमोवेश यही दशा महतारी एक्सप्रेस की भी है। आपातकालीन स्थिति के लिए न तो ऑक्सीजन सिलेंडर है और न ही आवश्यक दवाएं। आठ में से एक महतारी एक्सप्रेस बंद हो चुकी है। ऐसे में त्वरित सुविधा उपलब्ध कराने वाले संसाधन अब मौत से जूझते लोगों को चिकत्सा सुविधा दिलाने में नाकाम साबित हो रहे हैं।

संजीवनी 108 और महतारी 102 अपने वास्तविक सेवा कार्य से अब दूर होते जा रही हैं। 108 सेवा के तीन एंबुलेंस आउट ऑफ सर्विस हो चुके हैं। जो चल रहे हैं उनमें भी अधिकांश की स्थिति बेहद खराब है। साथ ही मरीजों की जान बचाने के लिए इन एंबुलेंस में तय 103 प्रकार के सामान में आधे से ज्यादा की सुविधा नहीं है। ऐसे में भला जीवन बचाने वाले 108 एंबुलेंस में किस तरह की इमरजेंसी सेवा मिल रही होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। संजीवनी एक्सप्रेस की ज्यादातर आवश्यकता सड़क दुर्घटना के दौरान होती है। गंभीर रूप से घायलों को सही समय पर इलाज नहीं मिलने से ऑन स्पॉट 30 पᆬीसद लोगों की मौत हो जाती है। वहीं 70 पᆬीसद लोगों की जान सही समय पर सही इलाज से बचाया जा सकता है। मौत से संघर्ष के इस जरूरी पल को ही डॉक्टर गोल्डन ऑवर्स मानते हैं। 108 एंबुलेंस की सेवा शुरू करते समय शासन का उद्देश्य भी यही था। एंबुलेंस में पॉयलट के साथ ही इमरजेंसी मैनेजमेंट टेक्नीशियन की अनिवार्यता के साथ ही एंबुलेंस में जीवन रक्षा के लिए जरूरी उपकरण व दवाइयों की व्यवस्था की गई, लेकिन यहां ज्यादातर एंबुलेंस में यह सुविधाएं होती ही नहीं है। एंबुलेंस का ऐसा हाल है कि किसी में पोर्टेबल ऑक्सीजन की सुविधा नहीं है। किसी में जहर निकालने के लिए पोर्टेबल सेक्शन नहीं, वहीं हार्ट अटैक की स्थिति में मरीजों की जान बचाने के लिए झटका देने वाली मशीन भी नहीं है। मिर्गी के मरीज को बांधने के लिए एक्यूपमेंट भी नहीं है। स्टेट हेल्थ रिसोर्स सेंटर को हर तीन महीने के अंतराल में एंबुलेंस की जांच करनी होती है, लेकिन ऐसा नहीं किया जाता है। ऐसे में मरीजों की जान भगवान भरोसे ही रहती है।

हालत ऐसी की रास्ते में ही हो जाए डिलीवरी

एक ओर जहा संजीवनी 108 के वाहन कंडम हो चुके हैं, वहीं दूसरी ओर जच्चा-बच्चा की सुरक्षा के लिए शुरू की गई 102 महतारी एक्सप्रेस की हालत भी कुछ ऐसी ही हो गई है। अधिकांश एंबुलेंस में अंदर की ओर खिड़की दरवाजे उखड़ गए हैं। दवाइयां तो दूर ऑक्सीजन सिलेंडर के अलावा रास्ते में प्रसव होने पर जच्चा-बच्चा को उपलब्ध कराने कंबल-टॉवेल का इंतजाम नहीं है। एंबुलेंस में स्ट्रेचर की तरह तैयार किया गया सीट भी ऐसी कि थोड़ी दूर के सफर में पीठ का दर्द उठने लगे।

बदलने की आ चुकी है नौबत

जिले में 108 संजीवनी एक्सप्रेस की सुविधा 11 एंबुलेंस के साथ शुरू हुई थी। इसमें से पाली लोकेशन की एंबुलेंस में आग लगने के बाद उसकी जगह एक साल पहले नई एंबुलेंस भेजा गया। नौ साल से लगातार रोजाना सौ किलोमीटर से अधिक चलने के कारण पुराने सभी एंबुलेंस की हालत खराब हो गई है। आउट ऑफ सर्विस हो चुकी तीन एंबुलेंस सीएमएचओ कार्यालय परिसर में खड़ी है। वाहनों को बदलने की नौबत आ चुकी है, किंतु काम चलाऊ के तौर पर उपयोगिता जारी रखा गया है।

जांच में मिली थी कई खामी

एक साल पहले 108 एंबुलेंस का दरवाजा नहीं खुलने से रायपुर के मेकाहारा अस्पताल में एक मासूम की मौत के बाद डायरेक्टर हेल्थ के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग की विशेष टीम ने प्रदेश के दुर्ग, बालोद, राजनांदगांव, कबीरधाम समेत कोरबा में चल रही 108 एंबुलेंस की जांच की थी। इसमें कोरबा में चल रही अधिकांश एंबुलेंस में तय सुविधाओं में आधे से ज्यादा कम मिले थे। इस संबंध में विशेष टीम की रिपोर्ट पर संबंधित कंपनी को एंबुलेंस में सुविधाओं का सुधार करने कहा गया था, लेकिन अब तक अमल में नहीं लाया गया।