कोरबा। निजी अस्पतालों को वेस्ट प्रबंधन का पाठ पढ़ाने वाले स्वास्थ्य विभाग की अपनी संस्था में कायदे दरकिनार किए जा रहे। अस्पतालों से निकलने वाले मेडिकल वेस्ट का नियमित उठाव कर शहर से दूर डंपिंग यार्ड में डिस्पोज करने का नियम है। इसके विपरीत जिला अस्पताल में वार्डों, पैथोलैब व अन्य विभागों से निकला मेडिकल वेस्ट खुले में ही फेंक दिया जा रहा। जिला अस्पताल के पीछे परिसर में ही कचरे का अंबार देखा जा सकता है। यह कचरा मवेशियों, अन्य जानवरों व अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों के लिए स्वास्थ्य यह हानिकारक हो सकता है।

अस्पतालों व नर्सिंग होम्स से निकलने वाले मेडिकल वेस्ट का सुरक्षित निपटान नहीं हो रहा है। जिले में हर रोज निकलने वाले मेडिकल व बायोमेडिकल कचरे को एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत ट्रीटमेंट कर नष्ट किया जाना चाहिए। वर्ष 2004 से नगर निगम ने अपने क्षेत्र में संचालित अस्पताल, नर्सिंग होम, पैथोलॉजी प्रयोगशालाओं से निकलने वाले बायो मेडिकल वेस्ट या जैविक कचरे का निपटान शुरू किया गया। उसी दौरान कचरे के निपटान का ठेका एक कंपनी को देते हुए बरबसपुर में जमीन उपलब्ध कराई गई।

वर्ष 2007 से एनवायरोकेयर को इस कार्य के लिए अनुबंधित किया गया, जो वर्तमान में यह कार्य कर रही। व्यवस्था उपलब्ध होने के बाद भी जिला अस्पताल से निकलने वाले मेडिकल कूड़े का उठाव कर बरबसपुर में निपटान होने की बजाय परिसर में ही डंप कर दिया जा रहा। प्रतिदिन अस्पताल के वार्ड, पैथोलैब व अन्य विभागों का मेडिकल कचरा निकाल उसे परिसर में अस्पताल के पीछे स्थित सुलभ शौचालय के पास डंप कर दिया जा रहा है। इस तरह लगातार यह कचरा वहां खुले में फेंक दिए जाने से अस्पताल परिसर में ही गंदगी व कचरे का अंबार देखा जा सकता है, जो किसी भी सजीव की सेहत के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

कर देते हैं आग के हवाले

जिला अस्पताल के पीछे निर्मित सुलभ शौचालय के पास न केवल मेडिकल कचरा यूं ही खुले में फेंक दिया जाता है, उनके उठाव की बजाय मौके पर ही जला देने के निशान भी देखे जा सकते हैं। कायदे से ग्लूकोज के बॉटल, प्लेट व प्लास्टिक व अन्य सामान का वैज्ञानिक ट्रीटमेंट करने के बाद ही अगर उसे पुनः इस्तेमाल करने की स्थिति होने पर बिलासपुर स्थित ट्रीटमेंट प्लांट भेजा जाता है। उसके वहां निर्धारित प्रक्रिया के तहत रसायनों से ट्रीटमेंट करने के बाद ही पुनः इस्तेमाल के लिए आगे बढ़ाया जाता है। इसी तरह जीव चिकित्सा अपशिष्ट (बायो मेडिकल वेस्ट) का कैमिकल ट्रीटमेंट के जरिए बरबसपुर स्थित बायो मेडिकल वेस्ट डंपिंग यार्ड में निपटान किया जाता है।

नहीं हो रहा कलर कोड का पालन

नियमों के अनुसार अस्पतालों, पैथोलैब व नर्सिंग होम्स को अपने संस्थानों में कुल पांच तरह के डिब्बे व प्लास्टिक का उपयोग करना चाहिए। इसमें लाल, पीला, नीला, काला व हरा रंग का प्लास्टिक बैग व डस्टबिन होना चाहिए। लाल डिब्बे व प्लास्टिक में ब्लड बैग, ट्यूब के पाइप, सीरिंज व आइवी सैट रखना होता है। पीले में मानव ऊतक, प्लास्टर, रूई, गंदी पट्टियां, नीले में सुईयां, ब्लेड, खाली दवाओं के वायल व एंपुल, काले डिब्बे में बेकार दवाइयां तथा हरे डिब्बे में कागज, धातु के टुकड़े तथा अन्य कचरा रखा जाता है। इन सभी का अलग-अलग उठाव व निपटान होना चाहिए। नियम का पालन करने की बजाय उन्हें मिक्स कर निपटान प्रक्रिया को असुरक्षित कर दिया जाता है।

225 संस्था, 100 से भी उठाव नहीं

आंकड़ों के अनुसार जिले में अस्पताल, नर्सिंग होम्स, पैथोलॉजी लैब व निजी क्लीनिकों समेत लगभग 225 संस्थाएं संचालित हैं। इनमें से बमुश्किल 70 से 80 चिकित्सकीय संस्थाओं ने वहां से निकलने वाले बायो मेडिकल वेस्ट के उठाव व सुरक्षित निपटान के लिए कंपनी के कर्मचारियों के हवाले करते हैं। शेष अस्पताल अपने जैविक कचरे का निपटारा कहां कर रहे हैं, यह जांच का विषय है। इस पर न तो स्वास्थ्य विभाग ही ध्यान दे रहा है, न ही नगर निगम और न ही पर्यावरण प्रदूषण मंडल को इस बात की कोई फिक्र है। प्रतिदिन मानव स्वास्थ्य के लिए मुश्किलें खड़े करने वाला विषैला कचरा यूं ही बिना ट्रीटमेंट के खुले में फेंका जा रहा, जिसे लेकर प्रशासन से कड़े रुख की उम्मीद है।

पड़े हैं इस तरह के सामान

सीरिंज, ग्लूकोज के बॉटल, ट्यूब के पाइप, आइवी सैट, रूई, गंदी पट्टियां, ब्लेड, खाली दवाओं के वायल व एंपुल, पैथोलैब में टेस्ट के लिए यूरीन या ब्लड सैंपल रखने के डिब्बे, दवाइयों की खाली शीशी, खून लगे कपड़े, शिशुओं के डाइपर के अलावा पॉलीथिन व अन्य कचरा। इस संबंध में निगम के स्वच्छता अधिकारी डॉ. संजय तिवारी ने कहा कि इन कचरों के उठाव के लिए पर्यावरण विभाग ने एक कंपनी को अनुबंधित किया है, निगम ने केवल बरबसपुर में जगह उपलब्ध कराई है। पर्यावरण अधिकारी आरपी शिंदे से जानने का प्रयास किया गया, पर उनसे संपर्क नहीं हो सका। कारण जो भी हो पर खुले में मेडिकल कचरा बीमारियों को आमंत्रित कर सकता है।

इनका कहना है

दो प्रकार का मेडिकल वेस्ट होता है, एक बायो मेडिकल व दूसरा जनरल वेस्ट। वहां डंप किया गया जो भी सामान आपने देखा, वह जनरल वेस्ट है। बॉयोमेडिकल वेस्ट निपटान के लिए छत्तीसगढ़ एनवायरोकेयर नामक संस्था से अनुबंध है। जनरल वेस्ट को नगर निगम डिस्पोज करती है, जो सप्ताह में एक बार उठाव कराकर निपटान करती है। बायोमेडिकल वेस्ट के उठाव के लिए भी नियमित रूप से गाड़ी आती है। कभी नहीं आती तो उसके लिए अलग से कक्ष है, जिसमें संग्रहित कर दिया जाता है- डॉ. अरुण तिवारी, सिविल सर्जन, जिला अस्पताल