कोरबा (निप्र)। वन अधिकार का उल्लंघन करने वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों के जवाबदार अफसरों पर अब अनुसूचित जाति, जनजाति अधिनियम (एट्रोसिटी एक्ट) का मामला दर्ज किया जाएगा। मिनिस्ट्री ऑफ लॉ एंड जस्टिस ने इस एक्ट में संशोधन किया है। पूर्व में केवल इस वर्ग के लोगों को जाति सूचक अपमान करने या उत्पीड़न के मामलों में ही एट्रोसिटी एक्ट के तहत कार्रवाई की जाती थी।

वन अधिकार अधिनियम के कायदों का पालन औद्योगिक क्षेत्र में कड़ाई से हो सके, इसके लिए लगातार अधिग्रहण व पुनर्वास की नीतियों में संशोधन कर बेहतर करने की कोशिश पिछले कई वर्षों से केंद्र सरकार कर रही है। इस कड़ी में वन अधिकार के मामले को भी एट्रोसिटी एक्ट में शामिल किए जाने का एक बड़ा निर्णय लिया गया है।

4 मार्च 2014 को मिनिस्ट्री ऑफ लॉ एंड जस्टिस ने एट्रोसिटी एक्ट में संशोधन करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग से संबंधित वन अधिकार अधिनियम का मामला हो या आदिवासी जिला में वन अधिकार के उल्लंघन का, दोषी लोगों के खिलाफ इस अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी।

इसके पहले तक यह देखा गया है कि जातिगत गाली-गलौज व अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के लोगों के साथ अत्याचार किए जाने के मामले में ही पुलिस इस एक्ट का उपयोग करती थी। यह संशोधन कोरबा के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कोरबा आदिवासी जिला है। साथ ही औद्योगिक प्रतिष्ठान होने की वजह से भूमि अधिग्रहण के मामलों की संख्या बेतहाशा है। एसईसीएल की कोयला खदान व पावर प्लांट के लिए वन क्षेत्र की भूमि का अधिग्रहण भी किया जाता है। पूर्व में वन अधिकार कानून को दरकिनार कर ग्राम सभा के बिना ही वन भूमि का अधिग्रहण किए जाने के कई मामले सामने आ चुके हैं। इस संशोधन से औद्योगिक प्रतिष्ठान के अपᆬसरों पर कितना नकेल कसा जा सकेगा, यह तो आने वाला वक्त बताएगा।

क्या है वन अधिकार अधिनियम

किसी भी वन क्षेत्र की भूमि के अधिग्रहण से पूर्व उस क्षेत्र के आसपास में रहने वाले ग्रामीणों की सहमति आवश्यक होती है। इसके लिए ग्राम सभा का आयोजन किए जाने का प्रावधान है। ग्राम सभा में यदि यह बात सामने आती है कि जमीन के अधिग्रहण के बाद उद्योग लगाए जाने या कोयला खदान खोले जाने से अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग के लोगों की परंपरा व जीवनशैली में परिवर्तन आएगा और वे नहीं चाहते कि वन भूमि पर गैरवानिकी कार्य किया जाए। ऐसे में ग्राम सभा में लिए गए निर्णय को मान्य करना होगा।

औद्योगिक प्रतिष्ठान लगातार कर रहे उल्लंघन

वन भूमि के अधिग्रहण से पहले ग्राम सभा में क्षेत्र के प्रभावित हितग्राहियों को कितना मुआवजा दिया जाएगा। रोजगार के किस तरह के साधन उपलब्ध कराए जाएंगे। पुनर्वास की क्या व्यवस्था होगी, तमाम बिंदुओं पर उद्योग लागने वाली कंपनी को अपनी योजना बतानी होगी। जब तक किए गए वादे पूरे नहीं हो जाते, तब तक काबिज जमीन को ग्रामीण नहीं छोड़ेंगे। देखा यह जाता है कि इस कायदे का उल्लंघन पिछले कई सालों से औद्योगिक प्रतिष्ठान के अपᆬसर कर रहे हैं। अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के हितग्राही अब इस तरह के मामलों में सीधे अजाक थाना में रिपोर्ट दर्ज करा सकेंगे।

इनका कहना है

वन अधिकार अधिनियम के उल्लंघन को भी एट्रोसिटी एक्ट में शामिल किया गया है। इससे संबंधित परिपत्र हमें प्राप्त हो चुका है। जातिगत गाली-गलौज व उत्पीड़न के मामलों से यह मामला पृथक रहेगा। इसके लिए कुछ अन्य गाइड लाइन भी दिए गए हैं।

- शमशेर खान, अजाक थाना प्रभारी