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    आंखों में रोशनी नहीं, फिर भी अशिक्षा का अंधकार दूर कर रहीं 'ज्योति"

    Published: Sun, 03 Dec 2017 02:04 PM (IST) | Updated: Sun, 03 Dec 2017 02:06 PM (IST)
    By: Editorial Team
    jyoti story 03 12 2017

    महासमुंद, आनंदराम साहू। पांच बहनों में सबसे छोटी हैं ज्योति। ईश्वर ने आंखों में रोशनी नहीं दी तो माता-पिता पलभर भी नहीं हुए निराश। पूरे मन से स्वीकारा और नाम दे दिया ज्योति। पूरा परिवार अपनी आंखों से उसे दुनिया दिखाना शुरू किया। पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया। आज 31 साल की हो गईं ज्योति कंप्यूटर, टायपिंग में दक्ष हैं। एमए, डीएड के बाद बागबाहरा ब्लॉक के ग्राम घुंचापाली प्राथमिक शाला में 12 वर्षों से बच्‍चों को शिक्षित कर रही हैं। बहनें ससुराल चली गईं और ज्योति संभाल रही हैं पूरा घर। घर के बड़ों को। बागबाहरा ब्लॉक के ग्राम घुंचापाली (बागबाहरा) निवासी प्रेम चंद्राकर व चित्रलेखा की पांचवीं संतान हैं ज्योति। चित्रलेखा बताती हैं कि ज्योति की आंखों की ज्योति लाने हमने काफी इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

    हालांकि इस दौरान कोई टूटा नहीं, न ही निराशा जैसी चीज को हावी होने दिया। सभी हमेशा उसके साथ आंखें बनकर रहे। उन्होंने बताया कि बेटे की चाहत में परिवार बढ़ता गया। ज्योति के बाद एक बेटा है। वह कारोबार के सिलसिले में बाहर ही रहता है। ज्योति ही बेटा बनकर हमारा देखरेख करती है। शादी के सवाल पर चित्रलेखा कहती हैं कि वह खुद इससे इंकार करती है। कहती है कि जिनसे यह जिंदगी मिली, उनके लिए ही पूरी जिंदगी लगा दूंगी।

    अलसुबह 4 बजे से शुरू हो जाती है दिनचर्या : ज्योति की दिनचर्या अलसुबह 4 बजे शुरू हो जाती है। आंगन में मॉर्निंग वॉक, रामायण और गीता का पाठ, मम्मी-पापा के लिए चाय बनाना, बिस्तर समेटना, खाना बनाना, बर्तन जमाना और खाना बनाने के बाद सुबह 9.50 बजे स्कूल पहुंच जाना। घर से स्कूल की दूरी करीब एक किलोमीटर है। ज्योति बिना किसी मदद के रोजाना स्कूल पहुंच जाती हैं।

    अपने को करती रहती हैं अपडेट: आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल सीखने ज्योति दृष्टिबाधित पुनर्वास केंद्र रायपुर जाती रहती हैं। देश दुनिया की खबरों के लिए नियमित रूप से रेडियो सुनने के अलावा और किसी सहयोगी से समाचार पत्रों को पढ़ाकर सुनती हैं। दिल्ली, तिरुपति बालाजी, वैष्णोदेवी, रामेश्वरम, जगन्‍नाथ पुरी आदि दर्शनीय स्थलों का भ्रमण भी कर चुकी हैं।

    मन की आंखें तो हैं : ज्योति कहती हैं कि जीवन में उसने कभी निराशा व हताशा को अपने पास नहीं फेटकने दिया। सामान्य लोगों की तरह ही आगे बढ़ती रही। यह सबकुछ परिवार की हिम्मत व हौसले से ही संभव हो पाया। उन्होंने कहा कि प्रकृति ने उसकी आंखों में रोशनी नहीं दी तो क्या, मन की आंखें तो हैं।

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