0.यायावर बन जीवन गुजार रहे एक दर्जन से अधिक जाति के लोग

पᆬोटो क्रमांक- 17जेएसपी 1, 2, 3 भारी हथौड़ा चलाकर काम कर रही महिलाएं

कोतबा। नईदुनिया न्यूज। जीवन यापन के लिए परंपरागत व्यवसायों से बसर करने वाले एक दर्जन से अधिक जाति के लोग स्थाई रोजगार नहीं मिलने से भटक रहे हैं। ये लोग विकास से कोसों दूर है, जो परंपरागत रूप से खानाबदोश तो नहीं हैं। लेकिन हालात ने उनकी जिंदगी एक स्थान से दूसरे स्थान में आजीविका के लिए भ्रमण करने वाले बंजारों की तरह कर दी है। ऐसे परिवारों में न ही जीवन स्तर में अपेक्षित बदलाव आया है और न ही ऐसे परिवारों के विकास के लिए प्रशासन की योजनाएं कारगर साबित हुई हैं।

खानाबदोश जीवन जी रहे ऐसे परिवारों की महिलाओ पर ही पूरे परिवार का अर्थतंत्र निर्भर है जो आज भी दिनभर भारी भरकम हथौड़ा चलाकर परिवार का पेट पाल रही है। कोतबा सहित जिले के विभिन्न स्थानों पर लोहार, अगरिया सहित अन्य जातियों का समूह अस्थाई पलायन के रूप में एक से दो माह तक निवास करता है। जाति और समुदाय के हिसाब से ये समूह बंजारे नहीं है, लेकिन बंजारों के समान ही संस्कृति देखने को मिल रही है। महज एक, दो नहीं बल्कि करीब सात पीढ़ियों से यह परंपरा अपना चुके हैं। लगातार निवास के लिए स्थान परिवर्तित करते रहना इनकी आदत बन गई है। यायावर की तरह एक स्थान से दूसरे स्थान में आजीविका के लिये संघर्ष करना अब इन जातियों की आदत बन चुकी है। महिलाएं बड़ा हथौड़ा जिसे घाना कहा जाता है, प्रयोग में लाती हैं और पूरे दिन लोहे को आकार देने जुटी रहती है। शारीरिक क्षमता तब और देखने को मिलता है,जब यह प्रक्रिया एक माह से अधिक देखने को मिलती है। कुछ मामलों में लोहार, अगरिया सहित यायावर की तरह जीवन बसर कर रहे समुदायों में यह देखने को मिलता है कि ऐसे समुदाय कहीं न कहीं महिला प्रधान परिवार है। इतना भारी भरकम कार्य करने, पूरे दिन हथौड़ा चलाने के बाद भी महिलाओं को पेट भर अनाज जुटाना मुश्किल होता है।

नहीं मिल रहा बाजार

भरी गर्मी में पसीना बहाने और हथौड़ा चलाने के बाद भी इन परिवारों के द्वारा निर्मित औजार व अन्य सामाग्री को बाजार नहीं मिल रहा है। इसके पीछे इनका मानना है कि आधुनिकता में हाथ से तैयार किए जाने वाले कृषि औजारो को अब बाजार नही मिलता और ग्रामीण क्षेत्रो में ही कुछ मात्रा में ये औजार बिकते हैं। सागर (मध्यप्रदेश) के समीप ग्राम देवरी क्षेत्र से कृषि औजार बनाने अस्थाई पलायन के रूप में आए बुंदेल सिंह, जगदीश सिंह लोहार ने बताया कि शिवराज सरकार के द्वारा उन जैसे लोगों को बसाने के लिए कुछ जमीन पूर्व में दी गई थी। लेकिन परंपरागत व्यवसाय से हटकर नए सिरे से जीवन बसर करने में कुछ तो समय लगेगा ही। लोहार जगदीश सिंह ने बताया कि बचपन से हथौड़ा चलाने की आदत हो गई है और ग्रामीण क्षेत्र का बाजार महिलाएं अधिक समझती हैं। जगदीश सिंह के मुताबिक आधुनिकता में निश्चित ही उनका व्यवसाय प्रभावित हुआ है, जिसके कारण उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि पहले पेड़ों को काटने के लिये एक मात्र कुल्हाड़ी ही औजार के रूप में उपयोग किया जाता था। लेकिन आधुनिकता के जमाने में मशीनों के आ जाने से मिनटों में यह कार्य पूरा कर लिया जाता है। इसी तरह कृषि कार्य मे उपयोग में लिए जाने वाले औजार भी आजकल नही बिकते और मशीनों से काम को आसानी से किया जा रहा है। उनका कहना है कि आने वाले दो चार सालों में यह व्यवसाय पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। जिसके लिए पुरखों से करते आ रहे कार्य को लेकर वे अब नए रोजगार के साधनों को लेकर चिंतित हैं।

बच्चें हो रहे शिक्षा से वंचित

जगदीश सिंह ने बताया कि आजीविका के कारण किसी स्थान विशेष पर अधिक समय तक नही रह पाने के कारण उनके बच्चों की शिक्षा पूरी तरह प्रभावित होते जा रही है। उनके बड़े भाई के पांच बच्चें है, जो विधिवत शिक्षा प्राप्त नही कर पा रहे हैं। पहले एहसास नही होता था। लेकिन आज के समय में व आ रही दिक्कतों को देखते हुए शिक्षा से वंचित होने का दुख होता है। उन्होंने बताया कि कई स्थानों पर भ्रष्टाचार है और लोगो की धारणा उन्हें तकलीफ देती है। मेहनत मजदूरी करने के बावजूद उन्हें जिल्लत झेलनी पड़ती है। कभी स्थाईत्व मिला तो जरूर बच्चों को शिक्षा से जोड़ते हुए उनकी जिंदगी बदलने का प्रयास करेंगे। सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि आज सभी को एक रुपये किलो चावल, रहने के लिए मकान सहित शासन की अनेकों महत्वाकांक्षी योजनाएं संचालित हैं। लेकिन उनको किसी भी योजनाओं का लाभ नही मिल रहा है। उनके मुताबिक मध्यप्रदेश, छग में हजारों की संख्या में लोग निवासरत हैं। जिनका मूल व्यवसाय लोहे को आकार देना होता है और ये पलायन को मजबूर होते हैं। इसके बावजूद प्रशासन ने इनकी स्थाईत्व को लेकर अभी तक सुध नही ली है।

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