पैनलिस्ट

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शिवानंद मिश्रा

हाथी का मूल निवास जंगल है। जंगल के सिमटने की वजह से ही हाथी समस्या गंभीर होती जा रही है। आग और अवैध कटाई के साथ उद्योगों के विकास ने हाथियों से उनका मूल निवास छिन लिया है,इसी का नतीजा है कि हाथी पेट भरने के लिए मानव बस्ती की ओर रूख कर रहे हैं। उन्होनें कहा कि इस समस्या से निबटने के लिए एलीपᆬेंट कॉरिडोर का प्रयोग स्थायी समाधान नहीं हो सकता है। आवश्यकता है हाथियों के प्राकृतिक आवास को संरक्षित कर उन्हें जंगल में ही चारा और पानी उपलब्ध कराने का।

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रामप्रकाश पांडे

पानी प्रकृति की देन है। साल दर साल बढ़ रहे जल संकट से बचने का एकमात्र उपाय इसको संरक्षित करना ही है। इसके लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग सर्वोत्तम उपाय है। लेकिन इसका कड़ाई से पालन नहीं हो पा रहा है। नतीजा गर्मी के दस्क के साथ ही कुआं,तालाब सहित सभी पारंपरिक जलस्त्रोत सूखने लग जाते है। जल ही जीवन है,यह सब जानते हैं लेकिन इसको बचाने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं हो रहा है।

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भावेश गुप्ता

रायगढ़ शहर और इसके आसपास के क्षेत्र में व्याप्त भयंकर प्रदूषण से यह तथ्य साबित होता है। इस क्षेत्र में अब लोगों को ना सो सांस लेने के लिए शुद्व हवा मिल पा रहा है और ना ही पीने के लिए पानी। जीवन का अधिकार,मौलिक अधिकार में शामिल है। लेकिन औद्योगिकरण के इस दौरान में अर्थ के सामने जीवन गौण साबित हो रहा है। केडीएस उच्च माध्यमिक विद्यालय के प्राचार्य रिजवान मलिक ने कहा कि रायगढ़ क्षेत्र को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए कठोर कदम उठाया जाना चाहिए। विकास देश के लिए आवश्यक है लेकिन इसकी कीमत इंसान की जान नहीं हो सकती। प्रदूषण की वजह से रायगढ़ जिले में कैंसर,श्वास रोग,त्वता रोग महामारी का रूप लेता जा रहा है। इससे निबटने के लिए कड़े उपाए किए जाने चाहिए।

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आनंद जैन

बाक्साइट धरती का रीढ़ है। इसका उत्खनन कर दिए जाने से पर्यावरण के साथ जमीन पर दूरगामी असर देखने को मिलेगा। उन्होनें कहा कि उत्खनन के बाद पर्यावरण संरक्षण के लिए कड़े कानून बने हुए हैं,लेकिन इसका किस तरह से पालन होता है,हम कटनी गुमला राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण कार्य में देख ही रहें है। यहां सड़क चौड़ी करण के लिए पेड़ तो काटे गए लेकिन नियमतः एक पेड़ के बदले 10 पौधे का रोपण नहीं किया जा रहा है।

अमानुला मलिक

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रायगढ़ में 1998 से अधर में लटके हुए रेल्वे टर्मिनल को दुर्भाग्यपूर्ण है। क्षेत्र में रेल्वे विकास में हो रही उपेक्षा के लिए क्षेत्रवासी भी जिम्मेदार है। रेल से जुड़े हुए मुद्दे की याद सिपर्ᆬ बजट के समय ही आती है। दो चार दिन आंदोलन के नाम पर शोर गुल होता है,पिᆬर लोग इस मुद्दे को भूल जाते हैं। उन्होनें कहा कि जब तक हम सब इसके लिए गंभीर और एकजुट नहीं होगें,उपेक्षा बदस्तूर जारी रहेगा।