रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरकारी विभागों में ऑन लाइन और ऑफ लाइन टेंडर के चक्कर में बड़ा खेल हुआ है।4601 करोड़ की ई-टेंडरिंग में बड़ी गड़बड़ी सामने आई है। अलग- अलग विभागों में टेंडर जमा करने के लिए विभागीय कर्मियों और कई ठेकेदारों ने एक ही कम्प्यूटर का उपयोग किया। टेंडर में शामिल ठेकेदार और फर्म के नाम अलग-अलग हैं, लेकिन ई-मेल से लेकर अन्य पोस्टल एड्रेस और डॉयरेक्टर एक ही है। इसकी वजह से सरकार को करोड़ों स्र्पये का चूना लगा है।

यह खुलासा नियंत्रक महालेखापरीक्षक (कैग) यानी सीएजी ने किया है। सबसे ज्यादा गड़बड़ियां तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के अधीन रहे विभागों में उजागर हुई हैं। अकेले खनिज विभाग में 26 सौ करोड़ स्र्पये से अधिक की अनियमितता पकड़ी गई है।

विधानसभा में गुस्र्वार को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कैग की रिपोर्ट सदन के पटल पर रखी। इसके बाद प्रधान महालेखाकार (लेखापरीक्षा) बिजय कुमार मोहंती ने कैग मुख्यालय में प्रेसवार्ता लेकर रिपोर्ट की जानकारी दी।

महालेखाकार राजीव कुमार और उप महालेखाकार (आर्थिक व राजस्व क्षेत्र) प्रियाति काड़ो की मौजूदगी में मोहंती ने बताया कि इस बार की रिपोर्ट में सरकारी सिस्टम में कमियों पर फोकस किया गया है। उन्होंने कैग के प्रतिवेदन के आधार पर की गई बड़ी कार्रवाइयों का भी जानकारी दी।

आधी-अधूरी तैयारी के साथ ऑन लाइन का दावा

कैग की रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ इंफोटेक और बायोटेक प्रमोशन सोसायटी (चिप्स) ने 2016 में राज्य के 35 विभागों को गो- लाइव घोषित कर ऑन लाइन टेंडर शुरू कर दिया गया, जबकि सिस्टम तैयार ही नहीं हुआ था। इसकी वजह से आधा काम ऑन लाइन और आधा ऑफ लाइन किया गया।

स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की सलाह

टेंडर की ऑन लाइन प्रक्रिया में गड़बड़ी को लेकर मोहंती ने कहा कि यह मामला बेहद गंभीर है। सरकार को इसी किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच करानी चाहिए।

सरकार नहीं दे रही जवाब

कैग ने सरकारी विभागों से जवाब नहीं मिलने पर अफसोस जाहिर किया। बताया कि 2014 से 2017 के दौरान कुल 471 निरीक्षण प्रतिवेदन जारी किए, इनमें 320 के प्रथम उत्तर कार्यालय प्रमुख से अभी तक प्राप्त नहीं हुए हैं, जबकि चार सप्ताह के भीतर जवाब देना होता है।

20 पर एफआईआर

कैग की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने जांजगीर-जांचा जिले में आदिवासी बच्चों की छात्रवृत्ति में गड़बड़ी करने वाले 20 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। करीब 1.40 करोड़ स्र्पये की गड़बड़ी के इस मामले में फर्जी स्कूलों के नाम से बच्चों को छात्रवृत्ति बांट दी गई थी।