रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

रणभूमि में जान गंवाने वाले प्रदेश के सपूत हमेशा शहरवासियों के दिल में जिंदा रहेंगे। रणभूमि में प्राण न्योछावर करने वाले इन सपूतों को प्रेरणा मानकर आज प्रदेश के कई युवाओं ने भारत माता की रक्षा करने का बीड़ा उठाया है। वहीं इनका संदेश और इनकी शहादत को याद कर प्रदेश के युवाओं में वीर रस का संचार होता है। इसमें शहीद मेजर और राजीव की स्मृतियां लोगों के दिल में देश-प्रेम की भावना बलवती करती हैं। इसी तरह शहर में सेना के वीर योद्धा भी चारों दिशाओं में प्रतीकात्मक रूप से तैनात हैं, जिन्हें देखने मात्र से शहर की तरफ नजर उठाकर किसी की देखने की हिम्मत नहीं होती। ये फौजी इस बात के प्रतीक हैं कि हमारे जांबाज फौजी कितने हिम्मती हैं। हम बात कर रहे हैं नगर निगम, राजकुमार कॉलेज, अनुपम गार्डन और एनआइटी में मौजूद प्रतीकात्मक तोपों की। जो हमारे देश और प्रदेश की शान हैं। जिनकी बदौलत हम सीमा पर दुश्मनों को धूल चटाने में कामयाब होते हैं। आज थल सेना दिवस है। इस मौके पर इन्हें खास याद करना हमारा फर्ज है।

भारत-पाक युद्घ में लोहा लेते हुए शहीद हुए मेजर गोरे

सितंबर, 1965 के भारत-पाक युद्घ में अपनी जान न्योछावर करने वाले महान सपूतों में मेजर गोरे का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है। इनका जन्म 17 सितंबर, सन्‌ 1932 को भंडारा (महाराष्ट्र) में हुआ था। इनकी माता का नाम शांता बाई और पिता का नाम गोविन्द राव गोरे था। गोरे बचपन से ही उत्सुक प्रवृत्ति के थे तथा देश एवं समाज के विकास में अपना विशेष योगदान देना चाहते थे। वहीं इनकी बचपन की शिक्षा-दीक्षा राजधानी में हुई। इनका बचपन शहर के तात्यापारा की गलियों में बीता। कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सन्‌ 1958 में भारतीय थल सेना ज्वाइन कर ली। दिसम्बर 1960 में विवाह सूत्र में बंध गए थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम शकुंतला गोरे हैं तथा उनके दो बच्चे भी हैं। छह सितंबर, 1965 को उनकी नियुक्ति '26 इन्फेन्ट्री डिवीजन' जम्मू-कश्मीर में हुई थी, जहां दुश्मनों से लोहा लेते हुए वे शहादत को प्राप्त हुए। उनके नाम से शहर में चौक भी बनाया गया है, जिसे लोग तात्यापारा चौक कहते हैं।

ऑपरेशन मेघदूत में शहीद हुए राजीव

देश के लिए जान कुर्बान करने वाले सेकंड लेफ्टिनेंट राजीव पांडेय को प्रदेश नमन करता है। वर्ष 1987 को सियाचिन में पाकिस्तान के कैंप तक का रास्ता खोजने के दौरान उन्हें पाकिस्तानी सैनिकों की गोली लगी थी। वे सियाचिन में ऑपरेशन मेघदूत में शहीद हुए थे। शहीद राजीव के पिता ने भी देश की सेवा की है। वे आर्मी में डॉक्टर थे। उन्होंने भी अपनी जिंदगी के दिन देश सेवा में लगाए हैं।

शहर की चारों दिशाओं की रखवाली करती हैं तोपें

शहीदों की शहादत को जब हम याद करते हैं तो उन तोपों को कैसे भूल सकते हैं, जिनकी बदौलत दुश्मनों को धूल चटाने में हमारे सैनिक कामयाब होते हैं? जी हां, तोपें शहर की चारों दिशाओं की ओर तैनात हैं। इसमें नगर निगम रायपुर दफ्तर में तैनात आर्टिलरी गन को देखने मात्र से दुश्मन का पसीना छूट जाएगा। राजकुमार कॉलेज की तोप भी वीर रस का संचार करती है। अनुपम गार्डन के पास मौजूद विजयंत टैंक भारत का पहला स्वदेशी टैंक है। भारत में इस तरह के दो हजार टैंक बनाए गए। फिर इन्हें टी-72 टैंक से बदला गया। सन 1965 से 2008 तक यह टैंक भारतीय फौज का हिस्सा रहा है। 1971 की लड़ाई इस टैंक का अभूतपूर्व योगदान रहा है। 39 टन बजनी यह टैंक 530 किलोमीटर तक जा सकता है। वहीं इसकी अधिकतम स्पीड 50 किलोमीटर है। यह टैंक फरवरी, 2014 से शहर की शोभा बढ़ा रहा है। इसके अलावा एनआइटी में मौजूद तोप भी शहर की शान बनी हुई है।

इसलिए मनाया जाता है थल सेना दिवस

भारत में हर वर्ष 15 जनवरी को लेफ्टिनेंट जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) केएम करियप्पा के भारतीय थल सेना के शीर्ष कमांडर का पदभार ग्रहण करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। उन्होंने 15 जनवरी, 1949 को ब्रिटिश राज के समय के भारतीय सेना के अंतिम अंग्रेज शीर्ष कमांडर जनरल रॉय फ्रांसिस बुचर से यह पदभार ग्रहण किया था।