रायपुर। डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल के रेडियोडाग्नोसिस विभाग के डॉक्टर्स ने एक ऐसी बीमारी से मासूम को बचा लिया, जो 50 लाख में एक बच्चे को होती है। इस बीमारी को 'वेन ऑफ गेलन एंजुरियम मालफंक्शन' कहा जाता है। इसमें दिमाग की नसें फूल जाती हैं। एंडोवेस्कुलर (नसों के भीतर) पद्धति से दवा, बैलून, कैथेटर और क्वाइल के जरिए फूली नसों को भरा जाता है। इस बीमारी का इलाज डीएसए मशीन से संभव है, जो बगैर चीरफांड के संभव है।

रायपुर का रहने वाला 5साल का रोशन (बदला हुआ नाम), बचपन से ही दिमाग की नसों की बनावट खराब होने से जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा था। माता-पिता एक अस्पताल से दूसरे, दूसरे से तीसरे भटकते रहे। किसी ने अंबेडकर अस्पताल में जांच करवाने की सलाह दी। रोशन के ठीक होने की उम्मीद खो चुके परिजन उसे लेकर अंबेडकर अस्पताल पहुंचे। जहां शिशुरोग विभाग के डॉ. ओंकार खंडवाल ने ओपीडी में उसकी प्राथमिक जांच की।

जांच के बाद डॉ. खंडवाल ने उसे इंटरवेशनल न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सीडी साहू के पास रेफर कर दिया, जहां रोशन का एमआरआई, सीटी स्कैन करवाया गया। डायग्नोस में दुर्लभ बीमारी 'वेन ऑफ गेलन एंजुरियम मालफंक्शन' का पता चला, जिसे भ्रूणों, शिशु में होने वाली धमनी विकृति भी कहा जाता है। जिसके बाद इंटरवेशनल न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सीडी के नेतृत्व में टीम ने सर्जिकल प्रोसेस प्लान की। करीब 4 घंटे डीएसएस ऑपरेशन थिएटर में प्रक्रिया चली, अब रोशन पीडियाट्रिक आईसीयू में भर्ती है और तेजी से रिकवर हो रहा है।

इलाज न मिलने से ये हो रही थीं दिक्कतें

रोशन को इलाज न मिलने के चलते हाथ-पांव चलना बंद हो गए थे। अन्य शारीरिक अंगों पर प्रभाव दिख रहा था। उसका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा था। उसका खुद पर नियंत्रण तेजी से घटता चला जा रहा था। बता दें कि इस इलाज में अंबेडकर अस्पताल में 65 हजार रुपए का खर्च आया है, जबकि निजी अस्पताल में 4-5 लाख रुपए खर्च है।

बिना ऑपरेशन का इलाज

डीएसए के जरिए बिना ऑपरेशन के एन्यूरिज्म का पता लगाया जाता है। इस आधुनिक तकनीक में पैर की खून की धमनी के माध्यम से नलियों व तारों में कॉइल्स डालकर एन्यूरिज्म का इलाज होता है। धमनियों के फूले भाग को क्वाइल से माइक्रोकैथेटर के माध्यम से खाली जगह को भर जाता है। इसमें कम जोखिम होता है, खून की आवश्यकता भी बहुत कम पड़ती है।