रायपुर। छोट-सी छोटी चोट हो या फिर दुर्घटना, हर मरीज का अल्ट्रासाउंड करना जरूरी है। सामान्यतः डॉक्टर्स चोट लगने पर एक्स-रे करवाने की सलाह देते हैं। उसके बाद हड्डी की स्थिति को देख कर इलाज चालू कर देते हैं, लेकिन उनका ध्यान जरा भी हड्डियों से जुड़ी मांसपेशियों पर नहीं जाता, जो हल्की-सी छोट लगने के बाद कट और दब जाती है। उसका तात्कालिक प्रभाव तो नहीं दिखता, लेकिन कुछ समय बाद घुटने में दर्द, जोड़ों में दर्द की समस्या आ जाती है।

इन सभी चीजों का निजात केवल अल्ट्रासाउंड में है। इससे शरीर की मांसपेशियां और नसों की बारीकी से जांच की जा सकती है। साथ ही समस्या का समय रहते इलाज किया जा सकता है।

पं. जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय के रेडियोडायग्नोसिस विभाग, मस्कुलोस्केलेटल सोसायटी ऑफ इंडिया और इंडियन रेडियोलॉजिकल एंड इमेजिंग एसोसिएशन (आइआरईए) छत्तीसगढ़ चेप्टर के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल के टेलीमेडीसिन हाल में देश भर से आए विशेषज्ञों ने कही।

मस्कुलोस्केलेटल अल्ट्रासाउंड पर आयोजित कार्यशाला में डॉ. महेश प्रकाश (पीजीआइ चंडीगढ़, प्रेसीडेंट मस्कुलोस्केलेटल सोसाइटी ऑफ इंडिया) ने कार्यशाला में मौजूद डॉक्टर्स को लाइव मरीज के घुटने का अल्ट्रासाउंड किया। बताया कि इस 83 प्रतिशत मरीजों को मांस पेशियों, जोड़ों के दर्द और घुटने की शिकायत है। इनके इलाज का बेहतर माध्यम है अल्ट्रासांउट, इससे बीमारी की जड़ तक पहुंचा जा सकता है।

हड्डियों के लिए एक्स-रे ही उपयुक्त तकनीक

डॉ. महेश ने बताया कि हड्डियों की जांच करने के लिए एक्स-रे ही उपयुक्त तकनीक है, लेकिन मांसपेशियों की स्थिति इससे नहीं देखी जा सकती। शरीर में किसी भी प्रकार की चोट लगे तो तत्काल उसका अल्ट्रासाउंड करें, ताकि भविष्य में जोड़ों और घुटने के दर्द का मरीज को सामना न करना पड़े। वहीं जो मरीज इन बीमारियों से ग्रसित हैं, उनका भी इलाज करने के लिए अल्ट्रासाउंड किया जाना जरूरी है।

वहीं डॉ. वाराप्रसाद वेमुरी (विजयवाड़ा), डॉ. रामकृष्ण (हैदराबाद) व डॉ. सोनल सरन (मेरठ) ने लाइव शरी के अन्य हिस्सों की अल्ट्रासाउंड से जांच की। मौके पर जवाहर लाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय के रेडियोडायग्नोसिस विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एसबीएस नेताम और आयोजन समिति के सचिव डॉ. विवेक पात्रे ने बताया कि रेडियोडायग्नोसिस की दुनिया में नई तकनीक के आने से मांसपेशियों, टेंडन और लिगामेंट्स से सम्बन्धित बीमारियों का पता अल्ट्रासाउंड के जरिए लगाया जा सकता है। इस तकनीक में बीमारियों की जांच के साथ-साथ निदान किया जा सकता है।

एक्स-रे और अट्रासाउंड कराएं एक साथ, इसके फायदे

- दुर्घटना के बाद एक्स-रे के साथ अट्रासाउंड से हड्डी के साथ नसों की मिलती है जानकारी

- समय रहते नसों का किया जा सकता है बेहतर उपचार

- सही समय पर उचार से घुटने और जोड़ो में नहीं होता है दर्द

फैक्ट फाइल

- 83 प्रतिशत मरीज की दुर्घटना के बाद मांसपेशियों में आ जाता है खिंचाव

- 75 प्रतिशत मरीज नसों में आ रही दिक्कतों को करते हैं नजरअंदाज

- 60 प्रतिशत जोड़ो ओर घुटने के दर्द का कारण है नसों का दबना