नईदुनिया एक्सक्लूसिव, आवेश तिवारी, कनहर से लौटकर। उत्तर प्रदेश सरकार ने छत्तीसगढ़ में सरगुजा की सीमा से सटे सोनभद्र इलाके में भारी सुरक्षा बल लगाकर कनहर बांध का निर्माण शुरू कर दिया गया है। बांध के डूब क्षेत्र में शामिल सुंदरी इलाके में भीषण सर्दी के बावजूद नदी किनारे उत्तर प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़ और झारखंड के सैकड़ों आदिवासी पिछले एक सप्ताह से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं।

कनहर नदी पर बन रहे इस बांध से तीन राज्यों के तक़रीबन 80 गांव डूबेंगे ,जिनमे अकेले छत्तीसगढ़ के 16 गांव है।बांध के डूब क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ का एक बड़ा एलिफेंट कारीडोर भी शामिल है। इस बीच धरनास्थल पर आक्रोशित विस्थापितों और यूपी के प्रशासनिक अधिकारियों के बीच जमकर मारपीट होने की भी खबर है जिसके बाद 17 विस्थापितों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया गया है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के जसपुर जिले में गीधा धोधा नामक स्थान से निकलने वाली कनहर ,सोन नदी के समानांतर बहती है और वर्षा ऋतु में अपने तीव्र बहाव की वजह से देश की खतरनाक नदियों में एक हो जाती है।

कनहर से जुड़े आन्दोलनकारियों का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार विस्थापितों की सही संख्या और डूब क्षेत्र का सही सर्वे नहीं करा रही है ।अजीबोगरीब यह है कि एकतरफ उत्तर प्रदेश में विस्थापितों की पहचान और उन्हें मुआवजे की रकम देने का काम शुरू कर दिया गया है, छत्तीसगढ़ को लेकर किसी भी किस्म की विस्थापन नीति नहीं बनाई गई है, न ही डूब क्षेत्रों का सर्वे किया है। गौरतलब है कि केन्द्रीय जल आयोग ने इस परियोजना के लिए अक्टूबर माह में 2252.29करोड़ रूपए की राशि मंजूर की है ।छत्तीसगढ़ सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता एच आर कुटारे कहते हैं हम पूरे मामले की जानकारी ले रहे हैं ,राज्य के लोगों और यहाँ के वन क्षेत्र का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा ।

कनहर बांध के बनने से लगभग 60 हजार की आबादी के प्रभावित होने की संभावना है ,जिनमे से अकेले छत्तीसगढ़ के लगभग 16हजार लोगों के प्रभावित होंगे, जिनमें से ज्यादातर आबादी आदिवासियों की है।पिछले 38 वर्षों से लम्बित पड़ी इस परियोजना के लिए पर्यावरण अनापत्ति प्रमाणपत्र 1980 में लिया गया,जबकि नियमों के मुताबिक़ उक्त बांध के लिए नए अनापत्ति प्रमाणपत्र लिए जाने जरुरी थे।गौरतलब है कि पिछले 35 वर्षों में उस इलाके में हजारों मेगावाट की बिजली परियोजनाएं अस्तित्व में आई है और समूचे इलाके का पारिस्थितिक तंत्र पूरी तरह से छिन्न भिन्न हो गया है।

इस मामले में पीपुल यूनियन आफ सिविल लिबर्टी और विन्ध्य बचाओं आन्दोलन ने विगत 22 दिसंबर को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में एक वाद दाखिल किया था ,जिसमे सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वतंत्र कुमार की खंडपीठ ने साफ़ तौर पर कहा कि भारतीय वन अधिनियम -1980 और पर्यावरण नियमावली -2006 के तहत अनापत्तियों के बाद ही बांध का निर्माण किया जा सकता है। लेकिन प्रदेश सरकार ने यह कहकर न्यायालय के स्थगन को मानने से इनकार कर दिया कि उक्त आदेश में कनहर का नाम स्पष्ट तौर नहीं लिखा है ।

कनहर परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि बांध की ऊंचाई पूर्व की भांति 39.90 मीटर व चौड़ाई 3.24 किमी है। इससे 0.15 मिलियन एकड़ फिट जल उपयोग कर 121 किमी मुख्य नहर एवं 190 किमी लंबे राजवाहों के माध्यम से कुल 35467 हेक्टेयर भूमि सिंचित करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे उत्तर प्रदेश के 108 गांवों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के रामानुजगंज-बलरामपुर के गांवों को भी लाभ मिलने की बात कही जा रही है।

कनहर के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार बता रहे नेताम

छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता उत्तर प्रदेश में कनहर के निर्माण के लिए कांग्रेस पार्टी को जिम्मेदार ठहराते हैं ।भाजपा के राष्ट्रीय सचिव और छत्तीसगढ़ के पूर्व सिंचाई मंत्री रामविचार नेताम ,कनहर के निर्माण का पूरा ठीकरा अविभाजित मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पूर्व मंत्री रामचंद्र सिंहदेव पर डालते हुए कहते हैं कि एक विधायक के तौर पर मैंने उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार से बाँध निर्माण को लेकर कोई समझौता करने को मना किया था।

मगर उन्होंने यह कहकर कि इससे क्षेत्र की गरीब जनता को लाभ मिलेगा और यूपी सरकार से अनुबंध कर लिया। रामविचार कहते हैं कि हमने यूपी सरकार से ऐसा कोई अनुबंध नहीं किया है जिससे छत्तीसगढ़ सरकार का अहित हो ,हमारे कहने पर यूपी सरकार ने बाँध की उंचाई कम की है,अगर रामचन्द्र सिंहदेव जी का समझौता लागू होता तो कई गांव डूब जाते, अब कुछ एकड़ कृषिभूमि ही जलमग्न होगी। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार इस बाँध के निर्माण के दौरान छत्तीसगढ़ को डूब क्षेत्रों में शामिल खेतों को बचाने के लिए अतिरिक्त धन देगी,उक्त पैसे से छत्तीसगढ़ सरकार संवेदनशील जगहों पर रिटेनिंग वाल का निर्माण करेगी।