रायपुर। स्कूली शिक्षा में बच्चों और पालकों के बीच नंबरों की होड़ ने तनाव बढ़ा दिया है। अधिक अंक पाने के बाद भी बच्चों के भीतर हताशा और निराशा है। परिणाम के कारण खुदखुशी करने तक की नौबत आ रही है। रायगढ़ में एक छात्र ने कम अंक पाने के कारण आहत होकर आत्महत्या कर ली। ऐसे में पढ़ाने से अधिक सिखाने के मूल्यांकन को प्राथमिकता देने पर एक बार फिर व्यापक बहस छिड़ गई है।

एक दिन पहले कबीरधाम के कलेक्टर ने अपने 45 प्रतिशत अंकों को सार्वजनिक करके बच्चों को तनाव नहीं लेने की नसीहत दी थी, लेकिन जागरूकता और परीक्षा प्रणाली में आमूलचुल परिवर्तन नहीं होने से पालक नंबरों की होड़ में घिर गये हैं। अब तो नंबरों की हो़ड़ में नर्सरी के बच्चे भी शामिल हो गए हैं।

फिर बनने लगा दबाव

सीबीएसई व अन्य शिक्षा बोर्डों के दसवीं और बारहवीं कक्षा के परिणाम आते ही अगली कक्षाओं के लिए बच्चों और उनके माता-पिता पर अधिक दबाव बनना शुरू हो गया है, जबकि अभी सत्र शुरू नहीं हुआ है। जिन छात्रों के 500 में से 495-496 या 497-498 अंक आए हैं वे सोच रहे होंगे कि काश एक नंबर और आ गया होता।

कम अंक वालों के बीच उनके ही स्कूल, मोहल्ले और रिश्तेदारों में तुलना होने से दबाव का परिवेश बन गया है। आलम यह है कि हमारी परीक्षा प्रणाली सिर्फ पास और फेल नहीं कर रही है, बल्कि एक तरह से स्कूल द्वारा की गई ब्रांडिंग को सामाजिक स्वीकृति में बदल रही है।

बना ले रहे पहले से ही धारणा

विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूल स्तर पर भी बड़ी खामियां हैं। शिक्षक खुद यह धारणा बना लेते हैं कि कौन सा बच्चा तेज है और कौन कमजोर। स्कूल में जिन बच्चों को शिक्षक अधिक पसंद करते हैं उन्हें कक्षा के भीतर और स्कूल की गतिविधियों में भागीदारी के अधिक मौके देते हैं और सफलता की सूची में अपना नाम दर्ज कराने की कोशिश में उन बच्चों पर ही ध्यान देते हैं।

अपवादों को छोड़ दें तो बहुतायत में छात्र अपनी औसत गति और शिक्षक द्वारा गढ़ी गई छवि को स्कूल स्तर तक बनाए रखते हैं। स्कूल से निकलने के बाद अधिकांश छात्र अपने जीवन में और शिक्षा सहित अन्य क्षेत्रों में जगह बना लेते हैं, लेकिन जब कभी उन्हें असफलता का सामना करना पड़ता है तो समाज और परिवार स्कूल द्वारा गढ़ी पुरानी छवि को याद दिला देता है कि यह तो स्कूल में भी ऐसे ही थी या ऐसे ही था।

नंबरों की होड़ ने कम कर दिया पढ़ने का आनंद

सीखने में जो आनंद था वह नंबरों की होड़ के कारण खत्म हो गया है। अच्छी सैलरी से जीवन में आनंद नहीं होता है। सभी तनावभरी जिंदगी में हैप्पीनेस खोज रहे हैं। मुझे लगता है कि शिक्षा पद्धति ऐसी हो जिसमें सीखने के प्रति आनंद हो, बच्चे उनमें लंबे समय तक पढ़ेगे और उनका आउटकम लंबे समय तक होगा। पढ़ाई के प्रोसेस को बच्चे आनंद करें। अधिक नंबर पाने वाले ही कुछ कर सकते हैं, यह गलत है। साइंस रिसर्च में प्रूफ किया है आपकी सफलता के लिए आईक्यू है 25 प्रतिशत और बाकी 50 प्रतिशत इमोशनल इंटेलीजेंस महत्वपूर्ण हैं। खुशी के रास्ते बहुत हैं। नंबरों की होड़ के खिलाफ एक माहौल बनना चाहिए। इसमें जागरूकता होनी चाहिए। - डॉ. अम्बा देवी सेठ, शिक्षाविद एवं मनोवैज्ञानिक