रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार नक्सल हिंसा से प्रभावित इलाकों में शांति और सुरक्षा का वातावरण तैयार करने के लिए कई उपाय कर रही है। इसी क्रम में अब सलवा जुड़ूम के दौरान उजड़ गए गांवों में मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता के लिए योजना बनाई जा रही है।

अति नक्सल प्रभावित सीट कोंटा के विधायक और राज्य सरकार के मंत्री कवासी लखमा नक्सल इलाकों में बंद पड़े स्कूलों को खोलने का निर्देश पहले ही दे चुके हैं। सलवा जुड़ूम के दौरान उजड़ चुके गांवों को फिर से संवारने की मांग नक्सल प्रभावित इलाकों के विधायक कर रहे हैं।

बीजापुर के विधायक विक्रम मंडावी ने नईदुनिया से कहा कि कांग्रेस की सरकार बनने के बाद अंदरूनी इलाकों में विकास में तेजी आई है। ग्रामीण खुद आगे आकर मूलभूत सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। आदिवासियों की मांग सरकार तक पहुंचाई जाएगी।

ज्ञात हो कि बस्तर में सलवा जुड़ूम आंदोलन के दौरान हुई हिंसा से सात सौ से ज्यादा गांव खाली हो गए थे। 2005-06 में इन गांवों के लोगों को 42 सलवा जुड़ूम कैंपों में बसाया गया था। बाद में अधिकांश ग्रामीण धीरे-धीरे गांवों में लौट गए लेकिन उन गांवों तक सरकारी सुविधाएं नहीं पहुंचाई जा सकी।

प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद नक्सल इलाकों में आदिवासियों के हित में कई काम शुरू किए गए हैं। दूसरे राज्यों में पलायन कर गए आदिवासियों की वापसी, जेलों में बंद आदिवासियों की रिहाई के लिए कमेटी, बंद हो चुके स्कूलों का जीर्णोद्धार जैसे काम किए जा रहे हैं। जुड़ूम के दौरान उजड़ चुके गांवों में मूलभूत सुविधाओं की योजना बनाई जा रही है।


यह था सलवा जुड़ूम

दक्षिण बस्तर के तीन जिलों दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर में 2005-06 के दौरान नक्सल विरोधी अभियान सलवा जुड़ूम शुरू किया गया था। इस अभियान के तहत आदिवासी युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी बनाकर हथियार सौंपे गए जिसका विरोध हुआ। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुड़ूम पर बैन लगा दिया।


अधिकांश ग्रामीण लौटे

जुड़ूम के दौरान गांव से विस्थापित होकर पुलिस सुरक्षा में कैंपों में लाए गए अधिकांश आदिवासी अब वापस अपने गांवों में लौट चुके हैं। कैंपों में अब वही बचे हैं जो पुलिस में शामिल हो चुके हैं या जिनकी नक्सलियों से सीधी दुश्मनी है। बीजापुर जिले में सबसे ज्यादा कैंप थे। भैरमगढ़ और बीजापुर ब्लॉक के ग्रामीण गांवों में लौट गए हैं जबकि उसूर ब्लॉक के ग्रामीण तेलंगाना चले गए हैं।