रायपुर। छत्तीसगढ़ में 'घर वापसी" शब्द बेहद चर्चित है। इसकी वजह से अक्सर विवाद भी होता है, क्योंकि यह उस मुहिम का नाम है जिसके जरिए धर्म छोड़कर गए हिंदुओं को वापस हिंदू धर्म में लाया जाता है यानी 'घर वापसी"। चुनावी वर्ष होने के कारण इसका एक और स्वरूप तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

वह स्वरूप है राजनीतिक पार्टियों में 'घर वापसी"का। यहां भी थोड़ा विवाद है, लेकिन यही तो राजनीति है...! राजनीतिक 'घर वापसी" के अभियान में कांग्रेस सबसे तेज है। वर्षों पहले पार्टी छोड़कर गए कई नेता ससम्मान लौट आए हैं। अभी कुछ वापसी के रास्ते में हैं। वहीं, भाजपा में अभी इसकी कवायद चल रही है।

नेताम बने चुनाव संचालन समिति के सदस्य

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ आदिवासी नेता अरविंद नेताम करीब छह वर्ष बाद कांग्रेस में लौटे हैं। नेताम पार्टी के सांसद और केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। आदिवासी बहुल इस राज्य मंे सरकार बनाने में आदिवासियों की बड़ी भूमिका रहती है। यही वजह है कि लौटने पर कांग्रेस ने भी उन्हें पूरा सम्मान दिया। पार्टी आलाकमान ने उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देते हुए चुनाव संचालन समिति का सदस्य बनाया है।

वेटिंग में भाजपा के बागी गणेशराम भगत

जशपुर जिले से आने वाले गणेशराम भगत, प्रदेश की पहली भाजपा सरकार में मंत्री रह चुके हैं। राज्य में घर वापसी (धार्मिक) की मुहिम शुरू करने वाले भाजपा के दिग्गज नेता स्व. दिलीप सिंह जूदेव ही भगत को राजनीति लाए थे। अब भगत भी घर वापसी (धार्मिक) अभियान चला रहे हैं। भगत आदिवासी हैं और दो बार विधायक रह चुके हैं। यही वजह है कि भाजपा उनकी वापसी की कोशिश कर रही है। पार्टी के राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री सौदान सिंह स्वयं उनसे मिलने गए थे। बताया जा रहा है कि जूदेव परिवार उनकी वापसी के विरोध में है। इसी वजह से उनका मामला अटका हुआ है।

पाटन के विजय की भी वापसी के संकेत

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल के निर्वाचन क्षेत्र पाटन के विजय बघेल की भी कांग्रेस में वापसी के संकेत दिख रहे हैं। बघेल फिलहाल भाजपा में हैं। 2008 में भूपेश को हरा चुके हैं, लेकिन 2013 हार गए थे। विजय पुराने कांग्रेसी हैं और रिश्ते में भूपेश के भतीजे हैं। चरोदा नगर पालिक के अध्यक्ष पद को लेकर उनका पार्टी के साथ विवाद शुरू हुआ था। कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर विजय निर्दलीय मैदान में उतरे और जीत भी गए। वहीं, से दोनों के बीच विवाद शुरू हुआ। 2003 में वे एनसीपी में चले गए। विजय के विधायक रहते भूपेश ने उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया था। राजनीतिक हलकांे में चर्चा गर्म है कि दोनों के बीच सुलह हो गई है। भूपेश ने मानहानि का केस वापस ले लिया है।

18 वर्ष में कांग्रेस में दो विभाजन

छत्तीसगढ़ के 18 वर्ष के इतिहास में कांग्रेस में दो बार विभाजन हो चुका है। पहला विभाजन 2002 में हुआ। पार्टी के वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल अलग हुए थे, बड़ी संख्या में कांग्रेसी उनके साथ चले गए। 2004 भाजपा में चले गए, लेकिन फिर कांग्रेस में लौट आए। कांग्रेस में दूसरा विभाजन अजीत जोगी ने किया। जोगी ने अलग क्षेत्रीय पार्टी बनाई तो फिर बड़ी संख्या में कांग्रेसी उनके साथ चले गए।

सुबह के भूले शाम को लौटे

जोगी के साथ गए पार्टी के कई वरिष्ठ नेता जिनमें बिलासपुर की वाणी राव, राज परिवार से तालुक रखने वाले महेंद्र बहादुर सिंह, विनोद तिवारी समेत बड़ी संख्या में अन्य नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस में लौट आए हैं। अभी कुछ और कतार में हैं। इतना ही नहीं कई पूर्व आइएएस और आइपीएस ने कांग्रेस का दामन थामा है।

अधर में राजेन्द्र पाल की वापसी

भाजपा से बगावत करने वाले खुज्जी के पूर्व विधायक राजेन्द्र पाल सिंह भाटिया की वापसी लंबे अरसे से अधर में लटकी हुई है। इसी तरह पार्टी छोड़कर गए कई नेताओं के भी वापसी के आसार हैं, लेकिन रास्ते में कई रोड़े भी हैं।