रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

हिन्दू धर्म ग्रंथों में वर्णित विविध अवतारों की कथाओं का सार है श्रीमद्भागवत कथा। यदि आप सभी ग्रंथों को नहीं पढ़ सकते तो भागवत कथा पढ़ लें। यदि पढ़ नहीं सकते तो जहां कहीं भी कथा चल रही हो, वहां जाकर कथा सुन लें। जो भक्त सच्चे मन से भागवत कथा सुनता है, उसके जीवन में बदलाव आता है। हृदय निर्मल हो जाता है। क्रोध, बैर, निंदा की भावना खत्म होती है और जीवों के प्रति प्रेम, सेवा, सहयोग की भावना जागृत होती है। ये विचार गायत्री नगर स्थित शिव, सांईं, हनुमान मंदिर में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा में आचार्य शिवानंद महाराज ने व्यक्त किए।

पोथी-कलश यात्रा निकाली गई

कथा से पूर्व गायत्री नगर स्थित जगन्नाथ मंदिर से पोथी, कलश यात्रा निकाली गई। राधे-राधे के जयकारे लगाती महिलाएं सिर पर कलश धारण कर भक्तिभाव से निकली। यात्रा शिव, सांईं, हनुमान मंदिर पहुंची जहां व्यासपीठ की स्थापना की गई।

शुकदेव मुनि ने 88 हजार ऋषियों को कथा सुनाई

कथावाचक शिवानंद महाराज ने भागवत महात्म्य की कथा में परमात्मा के तीन स्वरूप सतख् चित और आनंद का वर्णन किया। साथ ही कर्म मार्ग, ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग की व्याख्या की। कथा में बताया कि बद्रीका आश्रम में शुकदेव मुनि 88000 ऋषियों को भागवत कथा सुनाई थी।

कथा सुनकर धुंधकारी को मिली प्रेत योनि से मुक्ति

कथा प्रसंग में माता धुंधली एवं उनके दो पुत्रों धुंधकारी और गोकर्ण की कथा में बताया कि गोकर्ण की संगत अच्छी थी और धुंधकारी बुरी संगत में पड़कर प्रेत योनि में गया। भागवत कथा सुनने से उसे प्रेत योनि से मुक्ति मिली। कथा की महत्ता बताते हुए कहा कि कथा सुनने से बड़े से बड़ा पापी भी मुक्त हो जाता है।