रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

तकनीकी युग में अब नंबरों की दौड़ को रोकना होगा और मूल्यांकन के अन्य तरीकों को अपनाना होगा। नंबर आधारित नहीं, अब सीखने के पैमाने पर आधारित मूल्यांकन की व्यवस्था होनी चाहिए। बच्चों की प्रतिभाओं को निखारने के लिए उन्हें वोकेशनल की ओर डायवर्ट करना पड़ेगा। उनके भीतर स्किल विकसित करके उनमें आत्मविश्वास भरना होगा, नहीं तो नंबरों की होड़ आगे भी बच्चों को निराशा या फिर आत्महत्या जैसी प्रवृत्ति की ओर उकसाती रहेगी।

यह कहना है विशेषज्ञों का। नईदुनिया के दफ्तर में शुक्रवार को संवाद कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने 'नंबर गेम से परेशान विद्यार्थी-पालक और समाधान' विषय पर अपनी बात रखी। विशेषज्ञों ने मूल्यांकन के अन्य तरीकों को अपनाने पर जोर दिया। कहा कि बढ़ती नंबरों की होड़ से समाज में तुलना और प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है। 90 फीसद से अधिक अंक पाने वाले बच्चों का महिमा मंडन करके इससे कम अंक पाने वालों को निराशा की ओर धकेलने से समाज को खतरा है। छात्रों के सीखने के मूल्यांकन को लेकर बहुत सी संस्थाएं काम कर रही हैं। पढ़ाने से अधिक सिखाने के मूल्यांकन को प्राथमिकता देने पर व्यापक बहस की जरूरत है । विशेषज्ञों ने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर अंक दिलाने के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। बच्चों को सामाजिक गतिविधियों से दूर रखा जा रहा है। किसी के शादी-विवाह तक में जाने पर रोक है। नर्सरी से ही होम वर्क का दबाव है। शिक्षकों पर भी दबाव है कि छात्र बेहतर परिणाम लाएं।

नंबरों की मानसिकता पर कुठाराघात की जरूरत

रिटायर्ट आइएएस, लेखक और शिक्षाविद बीकेएस रे ने कहा कि आज समाज में नंबर आधारित परिणाम को सर्वश्रेष्ठ मानने की मानसिकता बन गई है। प्रतिस्पर्धा इसलिए है कि सभी कुछ चुनिंदा जॉब के लिए प्रयासरत हैं। मैं खुद जब पंडित जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन किया तो दूसरों से कम अंक मिले थे, लेकिन आइएएस की परीक्षा में जो सहपाठी टॉपर्स थे उन्हें कॉल तक नहीं मिला और मेरा चयन हो गया। पालक और बच्चों में जो दिशाहीनता है वह अंकों के आधार पर आकलन के कारण है। स्कूलों में भी इसकी खूब ब्रांडिंग होने लगी। इस प्रतिस्पर्धा को बदलना होगा। बच्चों को वोकेशनल कोर्सेस और स्किल डेवलपमेंट की ओर ले जाकर उसे ही बेहतर बताना होगा। मूल्यांकन पद्धति में भी बदलाव करना पड़ेगा। जिन छात्रों के कम अंक हैं, स्कूल, मोहल्ले या रिश्तेदारों की तुलना में कम आए हैं वे खुद को हीन समझने लगते हैं। पूरा समाज इस तरह के एक विशेष प्रकार का दबाव झेल रहा है। हमारी वर्तमान परीक्षा प्रणाली बच्चों को सिर्फ पास और फेल नहीं करती है, बल्कि यह नंबर गेम एक सामाजिक स्वीकृति और मानसिकता सी बन गई है। इस मानसिकता पर कुठाराघात करना होगा। बच्चों की प्रतिभा निखारनी होगी।

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कॉलेजों में दाखिले के लिए मांगते हैं नंबर, इसलिए प्रतिस्पर्धा

कृष्णा पब्लिक स्कूल डूंडा की प्रिंसिपल प्रियंका त्रिपाठी ने कहा कि मैं इस बात से सहमत हूं कि आज कार्पोरेट के दौर में नंबरों की होड़ है। इसमें बहस छिड़ी तो है, लेकिन इसके कारणों को जानकर उसका समाधान करने की जरूरत है। उच्च शिक्षा के लिए बारहवीं पास करके निकलने वाले बच्चों को बेहतर एक्सपोजर देने के लिए संस्थान बेहद कम हैं। बच्चा जाएं तो जाएं कहां ... ? यह सवाल उसके सामने खड़ा हो जाता है। इंजीनियरिंग में वह आइआइटी जाएगा तो उसके लिए नंबरों की प्रतिस्पर्धा करने की मजबूरी है। सामान्य कॉलेजों में जेएनयू और डीयू में जाएगा तो यहां भी नंबर मांगते हैं। इसी तरह हर बच्चे को बेहतर कॉलेज के लिए विकल्प नहीं है। कम सीट और गुणवत्तायुक्त कॉलेजों की कमी के कारण बच्चों को मानसिक रूप से अधिक अंक के लिए परेशान होना पड़ रहा है। इसके लिए जरूरत है कि अधिक से अधिक एक्सपोजर के लिए आइआइटीज, मेडिकल संस्थान, जेएनयू और डीयू जैसे संस्थानों की संख्या बढ़ाई जाए। मैं आपको उदाहरण देना चाहती हूं कि आइआइटी के लिए 242 रैंक के बच्चे को भी भटकना पड़ रहा है। दाखिले के लिए अंकों का जो आधार है वही प्रतिस्पर्धा को बढ़ा रहा है। इस प्रतिस्पर्धा को कम करने के लिए बच्चों को स्किल करके वोकेशनल की ओर डायवर्ट करने की जरूरत है तभी इस होड़ को रोका जा सकता है।

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सरकार बदल रही मूल्यांकन का तरीका

समग्र शिक्षा अभियान के सहायक संचालक डॉ. एम सुधीश ने बताया कि बच्चों को नंबरों की होड़ से बचाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने मूल्यांकन के तरीके में बदलाव करने की पहल शुरू कर दी है। आरटीई लागू होने के बाद स्कूलों में जो संतोषजनक परिणाम आने थे वह अपेक्षाकृत नहीं आ पाए इसलिए सरकार ने लर्निंग आउटकम निर्धारित किया। बच्चों को किस स्तर पर कितना सीखना चाहिए अब इस पर फोकस होगा। इसके लिए सीखने का पैमाना भी सरकार ने तय कर दिया है। हम चाहते हैं कि बच्चों में नंबरों की होड़ की जगह सीखने की होड़ हो। सीखने के पैमाने में स्कोर बाधक नहीं बन पाएगा। राज्य में पहली बार स्टेट लेवल असेसमेंट हुआ । इस बेसलाइन टेस्ट के जरिये अब हर बच्चे को ट्रेस किया जा सकेगा। हर बच्चे का स्कोर कार्ड ऑनलाइन एंट्री किया जा चुका है। शिक्षकों को भी अपडेट करने के लिए आकलन प्रकोष्ठ गठित हो चुका है जो काम कर रहा है।

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असफलता सिर्फ छात्र की नहीं है

राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों का मूल्यांकन करने वाली संस्था प्रथम एजुेकशन के स्टेट हेड गौरव शर्मा का कहना है कि सीखना एक प्रक्रिया है, जिसमें शिक्षक-छात्र, स्कूल-समाज, पाठ्यक्रम जैसे अनेक कारक भागीदारी करते हैं। अगर यह सिर्फ छात्र की अपनी उपलब्धि नहीं होती है तो फिर उसकी असफलता सिर्फ उसकी कैसे हो सकती है? मेरा मानना है कि यह शिक्षक की भी फेलियर है कि उसे नंबरों की होड़ में परेशान होना पड़ रहा है। आज के तकनीकी युग में जॉब तकनीकी में है। 50 से 60 करोड़ यंग पापुलेशन में सिर्फ 8 से 9 करोड़ ही सैलरी पाते हैं। ऐसे में अंकों की होड़ को तकनीकी की ओर ले जाना चाहिए। बच्चों के एक्सपोजर को वोकेशनल की ओर डायवर्ट करने के लिए प्लानिंग करनी होगी।

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इंफ्रास्ट्रक्चर और विकल्प देकर होड़ को करें खत्म

एसएनएसएस के चेयरमैन वीजी शशिकुमार ने कहा कि जॉब कम हैं, चयनित जॉब को ही बड़ा माना जाता है। विदेशों में छोटे-छोटे जॉब्स में भी ज्यादा सैलरी है। यहां पढ़ाई के साथ-साथ युवाओं को सैलरी पैकेज से भी आंका जाता है, मेरिटोरियस को मौके दिये जाते हैं इसलिए अंकों की होड़ बढ़ गई। सरकार को इसे खत्म करना होगा, बच्चों को तनाव से मुक्त करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर और पढ़ने के विकल्प को बढ़ाना होगा। जॉब्स और पढ़ाई के महत्व को व्यापक क्षेत्रों तक ले जाना होगा तभी यह होड़ खत्म हो पाएगी। बच्चों में तनाव लेने की क्षमता कम होगी होगी तो हताशा-आत्महत्या की प्रवृति बढ़ती जाएगी। नंबरों की यह होड़ अभी रुकती नहीं दिख रही है, लेकिन धीरे-धीरे कुछ लोग प्रताड़ना वाली इस मूल्यांकन पद्धति से बाहर आना चाहते हैं।

'पैकेज' से युवाओं को तौला जाता है इसलिए बड़ी प्रतिस्पर्धा

शिक्षाविद एवं माशिमं के पूर्व सदस्य संजय जोशी ने कहा कि आजादी के बाद से शिक्षा को लेकर कभी किसी भी सरकार ने गंभीरता से सोचा ही नहीं, वरना हमें आज मंथन की आवश्यकता नहीं होती। बहुत सारी शासकीय योजनाएं हैं जो बहुत तामझाम से लांच की जाती हैं, मगर धरातल पर नहीं आ पाती। मुझे नहीं, आप सबकी भी यही सोच होगी की आज नौकरी पहली प्राथमिकता है। इसका भी नया नाम आ गया है 'पैकेज'। इसी से युवाओं को तौला जाता है, इसलिए नंबरों की होड़ बढ़ी। ऐसे युवाओं की जरूरत है जो कि 10 लोगों को नौकरियों पर रखें। बच्चों को एक निश्चित उम्र में विजन मिलना चाहिए। आज सरकारी, गैर सरकारी नौकरियों के अलावा भी कैरियर है। कभी योग की क्लास शुरू में रखी गई तो स्कूल प्रबंधन ने कहा उचित नहीं है, वे दूसरा विषय पढ़ाने लगे। बच्चों पर सभी ओर से दबाव बढ़ रहा है। वे डिप्रेशन में हैं।

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बच्चों का हैप्पी इंडेक्स ठीक नहीं

मनोविशेषज्ञ एवं डिग्री गर्ल्स कॉलेज की प्रोफेसर डॉ. उषा किरण अग्रवाल ने कहा कि नार्वे, हॉलैंड का हैप्पीनेश इंडेक्स बहुत ज्यादा है। वहां स्कूल प्रबंधन छात्रों के साथ परिवार से सीधे इंट्रेक्शन रखता है। हमारे यहां तस्वीर पूरी तरह से उलट है। यहां अंक को हैप्पीनेस इंडेक्श मान लिया गया है। कॉपी टू बिहेवियर ज्यादा हो रहा है। मैंने कई बार पाया है कि बच्चों पर सीधे उस उम्र में बोझ डाल दिया जाता है, जिस उम्र में उनकी ग्रोथ होती है। वे किस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं, हम यह नहीं देखते। सीधे कह देते हैं तुम्हे यह बनना है। बच्चे को भी आत्म मूल्यांकन का अवसर नहीं मिल रहा है।

बच्चों की काबिलियत पहचानने की सख्त आवश्यकता

राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शासकीय प्राइमरी स्कूल पठारीडीह के शिक्षक उत्तम देवांगन ने कहा कि प्राथमिक कक्षा से ही बदलाव की जरूरत है। मेरा मानना है कि कोर्स पूरा करने की दौड़ में सभी शिक्षक लगे हुए हैं। हमें बच्चों की काबिलियत पहचानने की सख्त आवश्यकता है। पालक अपनी इच्छा को बच्चों पर थोपते हैं, क्योंकि उन पर भी समाज का, सोसाइटी का दबाव होता है। यह नहीं होना चाहिए। अंक की बात नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह होना चाहिए कि हम उनकी प्रतिभा को पहचाने और उनकी रुचि के मुताबिक उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें।

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शिक्षकों का दायित्व है कि बच्चों में हुनर पैदा करें

छत्तीसगढ़ जागरूक पालक संघ के अध्यक्ष चंद्रेश शाह ने कहा कि हर चीज के लिए अगर पालक को जिम्मेदार ठहराएं तो यह गलत है। कहीं न कहीं स्कूल प्रबंधन, शिक्षकों को भी बच्चों को जज करने की जरूरत है। वे सिर्फ यह न सोचें कि उनका काम पढ़ाना मात्र है। स्कूल को समाज का एक लघु रूप माना जाता है और उससे यह अपेक्षा रहती है कि वह छात्रों में हौसला-हिम्मत और हुनर पैदा करेगा। अगर छात्र परीक्षा परिणाम के कारण अपना आत्मविश्वास खोते हैं तो स्कूल की जरूरत पर सवाल उठना स्वभाविक है।

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प्रतिभाओं को संवारने की जरूरत है

छत्रपति शिवाजी स्कूल रायपुर के संचालक मुकेश शाह ने कहा- मेरा मानना है कि स्कूल, समाज और अभिभावक ये तीन ही हैं जो बच्चों का भविष्य तय करते हैं। इन तीनों कड़ियों को मजबूती से बच्चों के लिए खड़े होने, सोचने की आवश्यकता है। इनमें से एक भी थोड़ा भी कमजोर पड़ा तो आप यकीन मानिए कि बच्चों का भविष्य डगमगाएगा। मैं अपने स्कूल में हर साल यह प्रयोग करता हूं कि जो बच्चे कमजोर हैं, उनके लिए एक्सट्रा क्लास करवाई जाती है। मगर ऐसा भी होता है कि 10 फीसद अभिभावक विरोध करते हैं, उन्हें लगता है कि उनके बच्चों को कमजोर बताया जा रहा है। कई बच्चे ऐसे भी हैं जो पढ़ाई में कमजोर हैं मगर उन्होंने आज अलग-अलग विधाओं में स्कूल और अपने राज्य का नाम रोशन किया। हमें प्रतिभाओं को पहचानने, उन्हें प्रोत्साहित कर आगे बढ़ाने की जरूरत है।

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