चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 11 मार्च को एक नया इतिहास लिखने की शुरुआत की, जिसके लिए उन्हें वैधानिक ताकत देने का कार्य चीन की 3000 डेलीगेट्स वाली नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ने किया। बीजिंग के ग्रेट हॉल में लाल तारांकित गुंबद के नीचे नेशनल पीपुल्स कांग्रेस के प्रतिनिधियों मंे से अधिकांश ने राष्ट्रपति पद पर बने रहने के लिए दो बार की समयसीमा को समाप्त करने के पक्ष में मत दिया, जिससे राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए अनिश्चित काल तक शासन करने का मार्ग प्रशस्त हो गया। शी जिनपिंग कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के महासचिव हैं और चीनी सेना के सर्वोच्च निकाय केंद्रीय सैन्य आयोग के प्रमुख हैं। अब जबकि पीपुल्स कांग्रेस ने 21 संवैधानिक संशोधनों का अनुमोदन कर दिया है, तो इसका संयुक्त प्रभाव यह होगा कि शी जिनपिंग एक प्रकार से पार्टी के भी ऊपर निकल जाएंगे। सीपीसी के संस्थापक माओत्से तुंग के बाद बीते लगभग चार दशक से पार्टी के नेता दो कार्यकाल की अनिवार्यता का पालन करते आ रहे थे, ताकि तानाशाही से बचा जा सके और एकदलीय राजनीतिक व्यवस्था वाले देश में सामूहिक नेतृत्व सुनिश्चित किया जा सके। लेकिन अब यह परंपरा समाप्त हो गई और कह सकते हैं कि इसके साथ ही चीन के तानाशाही युग में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त हो गया। ऐसे में सवाल यह है कि क्या जिनपिंग माओ की तरह सांस्कृतिक क्रांति या ग्रेट लीप फॉरवर्ड जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के नाम पर चीन को फिर से अराजकता की ओर ले जाएंगे? आखिर शी जिनपिंग का भी तो फॉरवर्ड लुकिंग एजेंडा है, जैसे माओ का ग्रेट लीप फॉरवर्ड का था। सवाल यह भी है कि अधिनायकवादी जिनपिंग कहीं भारत के लिए खतरा तो साबित नहीं होंगे?


शी जिनपिंग वर्ष 2049 तक चीन को 'आधुनिक समाजवादी देश बनाना चाहते हैं, जिसका मतलब है चीन को दुनिया की सबसे बड़ी सैनिक, आर्थिक, सांस्कृतिक ताकत में रूपांतरित करना। उनके पिछले 5 वर्षों के शासनकाल को गौर से देखें तो पाएंगे कि उनके नेतृत्व में चीन वैश्विक स्तर पर कई मामलों में मुखर और नेतृत्वकारी शक्ति के रूप में सामने आया है। उन्होंने वैश्विक नेता के रूप में स्वयं को स्थापित करने तथा चीन को वैश्विक शक्ति बनाने के संदर्भ में जो पहल की हैं, उनमें ब्रिक्स बैंक, एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बैंक और वन बेल्ट वन रोड परियोजना आदि प्रमुख हैं। चीन ने एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बैंक में अमेरिका और जापान के विरोध के बावजूद दुनिया के 57 देशों को शामिल कर लिया, जिसमें से कुछ नाटो सदस्य भी हैं। यह दरअसल चीन की सॉफ्ट डिप्लोमेसी का हिस्सा है। 'वन बेल्ट वन रोडपरियोजना के शुभारंभ के अवसर पर चीन ने बीजिंग में सवा सौ से अधिक देशों को बुला लिया। इससे स्पष्ट होता है कि चीन को अब चुनौती देने में कम से कम पश्चिमी दुनिया के देश असमर्थ हो गए हैं, कारण चाहे जो भी हों।


बढ़ती आर्थिक और सामरिक ताकत के साथ चीन ने भारत के प्रति दोहरी कूटनीति अपनाई है। वह आर्थिक मोर्चे पर भारत के साथ पींगे बढ़ाना चाहता है, ब्रिक्स में भारत के साथ आगे बढ़ना चाहता है, ब्रिक्स बैंक में भारत की सक्रियता को स्वीकारना चाहता है, शंघाई सहयोग संगठन में भारत को शामिल करना चाहता है और जलवायु परिवर्तन के मसले पर भारत के साथ खड़ा होना चाहता है, लेकिन साथ ही साथ वह स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स और सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) के जरिए भारत को सामरिक रूप से घेरने की कोशिश भी कर रहा है। वह पाकिस्तान की भारत-विरोधी गतिविधियों से आंख मूंदते हुए उसके द्वारा पोषित आतंकियों के मामले में भारत खिलाफ खड़ा हो जाता है और एनएसजी तथा यूएन सुरक्षा परिषद में भारत के प्रवेश का विरोध करता है। अब तो वह दक्षिण एशिया के देशों, विशेषकर मालदीव, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश और भूटान में भी अपना वर्चस्व बढ़ाने में लगा है, जहां वह बड़े-बड़े कर्ज देकर सरकारी इक्विटी पर कब्जा करने की युक्ति पर काम कर रहा है और सैन्य अड्डे बनाकर भारत को सामरिक-रणनीतिक आधार पर कमजोर करना चाहता है।


कम्युनिस्ट चीन के संस्थापक माओत्से तुंग ने अपने अधिनायकवादी दौर में जो किया, उसे इतिहास के स्वर्णिमअध्याय के रूप में तो कतई नहीं देखा जा सकता। माओ ने जिस आर्थिक मॉडल को चुना और ग्रेट लीप फॉरवर्ड के जरिए जिस सनक को व्यक्त किया था, उस सनक ने चीन में तकरीबन 4.5 करोड़ लोगों की बलि ले ली। इसके 10 वर्ष बाद माओ ने सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर लगभग तीन करोड़ लोगों को जिंदगी कुर्बान करने पर मजबूर कर दिया। शी जिनपिंग के अब तक के क्रियाकलाप देखकर लगता है कि वे माओ से भी आगे जा सकते हैं। चीन अपनी 'चेक डिप्लामेसी (छोटे देशों को कर्ज देते हुए अनुयायी बनाने की कोशिश करना) के तहत दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया व अफ्रीका के देशों को जिस तरह से आर्थिक उपनिवेशों में तब्दील कर रहा है, उसके परिणाम बेहद गंभीर होंगे। हो सकता है कि उसके खिलाफ अंदरूनी विद्रोह या जनविरोध भी आरंभ हो और संभव है कि चीनी पूंजी भी डूबे। इस स्थिति में हो सकता है कि शी भी माओ के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश करें, यानी भारत की सीमा पर युद्ध की स्थितियों का निर्माण। फिर तो शी भारत के लिए विकट चुनौती साबित होंगे।


बहरहाल, यह समय दुनिया में ऐसे नेताओं के उदय का है, जो एकाधिकारवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हुए आजीवन शासन करना चाहते हैं। फिर चाहे वे शी जिनपिंग हों, रूस के व्लादिमीर पुतिन हों या फिर तुर्की के एर्दोगन। लेकिन जब कोई शासक देश से ऊपर हो जाए, तो अंतत: उस देश को ही नहीं, दुनिया को भी इसका नुकसान उठाना पड़ता है। अतीत से लेकर वर्तमान में भी ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं। रही बात भारत की कि वह चीन से कैसे निपेटगा? तो इसका एक रास्ता रूस हो सकता था, जो हमारे खिलाफ नहीं, तो साथ भी नहीं है। दूसरा अमेरिका है। लेकिन अमेरिकी नेता हमेशा से चीनी नेताओं का गुणगान करते रहे हैं, फिर चाहे वे माओ की तारीफ करने वाले निक्सन हों या शी की तारीफ करने वाले डोनाल्ड ट्रंप। यानी भारत अमेरिका के भरोसे भी चीन से मुकाबला नहीं कर सकता। अधिकांश नाटो देश एवं अन्य पश्चिमी देश एआईआईबी और ओबीओआर प्रोजेक्ट पर बीजिंग जाकर हाजिरी दे चुके हैं। इसलिए भारत इन देशों के साथ भी चीन के विरुद्ध कोई संयुक्त मंच निर्मित नहीं कर सकता। फिर तो न्यू इंडिया को न्यू चाइना से मुकाबला करने के लिए खुद को उन्हीं प्रतिमानों पर सर्वश्रेष्ठ साबित करना होगा, जिनके कारण चीन भारत को ही नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम देशों व संस्थाओं को आंखें दिखाता रहता है। क्या भारत ऐसा कर पाएगा? फिलहाल हमें इस तथ्य को लेकर बेहद सजग रहने की जरूरत है कि अधिनायकवादी प्रवृत्ति की ओर बढ़ चले शी जिनपिंग का चीन बेहद महत्वाकांक्षी, आक्रामक, सैन्यवादी और नव-साम्राज्यवादी होगा।


(लेखक विदेश संबंधी मामलों के जानकार हैं)