राष्ट्रहित से जुड़े विभिन्न् क्षेत्रों में अतुलनीय योगदान देने के बावजूद आजादी के बाद कई दशकों तक डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर लगभग भुला दिए गए थे, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपटल पर उन्हें वह स्थान दिलाना शुरू किया है जिसके वह असल में हकदार हैं। डॉ. आंबेडकर बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे एक विद्वान, अर्थशास्त्री, सामाजिक-धार्मिक सुधारक, राजनीति विज्ञानी और संविधानवेत्ता थे। वे आधुनिक और लोकतांत्रिक भारत के महान रचयिताओं में से एक हैं। सामाजिक छुआछूत को मिटाने और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए उनके अथक संघर्ष को भुलाया नहीं जा सकता। दरअसल उनके व्यक्तित्व के अनेक आयाम हैं, लेकिन यहां मैं डॉ. आंबेडकर संस्कृत के बारे में क्या सोचते थे, इस पर चर्चा करना चाहूंगा।

जब मैं वाजपेयी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री था तब विभिन्न् स्तरों पर संस्कृत और वैदिक गणित आदि मुद्दे उठाए जाते रहे। इस संदर्भ में डॉ. एलएम सिंघवी ने मुझे भारत सरकार द्वारा 1956-57 में गठित संस्कृत आयोग की रिपोर्ट दिखाई थी। उस रिपोर्ट की कुछ मुख्य बातें इस प्रकार थीं - हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए लाए जाने वाले बिल को संविधान सभा में आसानी से मंजूरी नहीं मिली। इस मुद्दे पर चर्चा करने वाले अधिकांश लोगों की सोच तंग थी।

हालांकि कुछ लोगों ने संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव दिया और डॉ. आंबेडकर ने भी उसका समर्थन किया था। रिपोर्ट आगे कहती है कि नजीरुद्दीन अहमद ने संस्कृत का समर्थन करते हुए इस प्रस्ताव को सदन के पटल पर रखा। उन्होंने कहा कि एक ऐसे देश में जहां ढेरों भाषाएं बोली जाती हैं, वहां यदि एक भाषा को पूरे देश की भाषा बनाना चाहते हैं तो जरूरी है कि वह निष्पक्ष हो। वह किसी भी क्षेत्र की मातृभाषा न हो और सभी के लिए एक जैसी हो। तभी उसे स्वीकारने से किसी एक क्षेत्र को लाभ नहीं होगा और दूसरा क्षेत्र स्वयं को पंगु नहीं समझेगा। संस्कृत में ऐसी क्षमता है। लक्ष्मीकांत मिश्रा, जिन्होंने संस्कृत को हिंदी के स्थान पर आधिकारिक भाषा बनाने के लिए संशोधन प्रस्ताव पेश किया, ने सभा में कहा कि यदि संस्कृत को स्वीकार किया गया तो भाषा को लेकर जिस तरह की मनोवैज्ञानिक जटिलताएं पैदा की गई हैं, वे सभी मिट जाएंगी।

एनसीईआरटी द्वारा मई 2001 में प्रकाशित 'सम्स्कृत" पत्रिका में एक अखबार में प्रकाशित खबर का उल्लेख करते हुए 'आंबेडकर ऑन द ऑफिशियल लैंग्वेज ऑफ इंडिया" शीर्षक से एक रिपोर्ट आई थी। इसमें लिखा गया है कि भारत के कानून मंत्री डॉ. आंबेडकर उन लोगों में शामिल हैं जो संस्कृत को भारतीय संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा देने के हक में हैं। इस पर सवाल उठाने वाले पीटीआई के संवाददाता से डॉ. आंबेडकर ने पूछा कि संस्कृत में गलत क्या है? संस्कृत को भारत की आधिकारिक भाषा का दर्जा देने के संबंध में संशोधन बिल पर संविधान सभा तब विचार करेगी जब सदन में आधिकारिक भाषा का प्रश्न आएगा। संशोधन बिल कहता है कि संघ की आधिकारिक भाषा संस्कृत होनी चाहिए।

ये जानना दिलचस्प होगा कि डॉ. आंबेडकर भी चाहते थे कि संस्कृत को भारत की आधिकारिक भाषा बनाने के समर्थन में ऑल इंडिया अनुसूचित जाति फेडरेशन की कार्यकारी कमेटी 10 सितंबर, 1949 के दिन एक प्रस्ताव पास करे, लेकिन कार्यकारी कमेटी के युवा सदस्यों द्वारा विरोध की धमकी देने के कारण उसने उस प्रस्ताव को वापस ले लिया। बहरहाल एलके मिश्रा द्वारा पेश संशोधन बिल सभा में तीखी बहस के बाद दुर्भाग्यवश गिर गया और इस प्रकार भारत को भाषाई रूप से एकता के सूत्र में पिरोने का बाबासाहेब का सपना अधूरा ही रह गया।

मेरे विचार में बाबासाहेब संस्कृत को आधिकारिक भाषा बनाने को लेकर काफी गंभीर थे, क्योंकि वे जान गए थे कि इसे यदि एक बार स्वीकृति मिल गई तो संविधान सभा में आधिकारिक भाषा पर चर्चा के दौरान उपजी कड़वाहट खत्म हो जाएगी। बाबासाहेब भारत को भाषाई लड़ाइयों से मुक्त कर देना चाहते थे। साथ ही वह इस प्राचीन भाषा में मौजूद ज्ञान के भंडार से आम भारतीयों को जोड़े रखना चाहते थे। डॉ. आंबेडकर का संस्कृत से लगाव दिखावा नहीं था। आर्य और अनार्य, ऊंची और निम्न जातियों के संबंध में यूरोप के सिद्धांतों की सच्चाई को जानने की उत्कंठा ने उनमें संस्कृत में रुचि पैदा की थी। इसके लिए उन्होंने वेद सहित कई मौलिक स्रोतों का स्वयं और खुले मन से अध्ययन किया। उन्होंने स्वयं को वैदिक साहित्य तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जेद-अवेस्ता (पारसियों का धर्मग्रंथ) का भी अध्ययन किया। डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि जेद-अवेस्ता से मिले साक्ष्य बताते हैं कि शब्द वर्ण का संबंध एक खास प्रथा को मानने वाले लोगों के वर्ग से था। इसका रंग-रूप से कोई लेना-देना नहीं था। पश्चिमी सिद्धांत की मुख्य बातों का सार कुछ इस प्रकार है - वेद आर्य जैसी किसी नस्ल के बारे में नहीं जानते। वेद में ऐसे कोई साक्ष्य नहीं हैं कि आर्यों ने भारत पर आक्रमण किया और यहां के मूल निवासी माने जाने वाले लोगों को जीता था। आर्यों व मूल निवासी माने जाने वाले लोगों के बीच नस्ली भेद के संबंध में कोई साक्ष्य नहीं है। वेद इस बात से सहमत नहीं हैं कि आर्य रंग-रूप में अन्य लोगों से भिन्न् हैं।

अंबेडकर आगे कहते हैं, 'एंथ्रोपोमेट्री अगर वह विज्ञान है जो एक व्यक्ति के नस्ल को बताता है तो हिंदू समाज के विभिन्न् तबकों का एंथ्रोपोमेट्री के जरिए अध्ययन करने पर यह बात गलत साबित हुई है कि कथित अस्पृश्य लोग आर्यों व द्रविड़ों से अलग हैं। यह बताता है कि ब्राह्मण और कथित अस्पृश्य एक ही नस्ल से संबंधित हैं। यदि एंथ्रोपोमेट्री के अनुसार ब्राह्मण आर्य थे तो अस्पृश्य भी आर्य हैं। यदि ब्राह्मण द्रविड़ हैं तो वे भी द्रविड़ हैं। यदि ब्राह्मण नागा हैं तो कथित अस्पृश्य भी नागा हैं।" डॉ. आंबेडकर के अनुसार छुआछूत का नस्ली सिद्धांत न सिर्फ एंथोपोमेट्री के परिणामों को नकारता है, बल्कि उसे भारत की संस्कृति, लोगों की नस्ल आदि के बारे में जो तथ्य प्रचलित हैं उनसे भी बहुत समर्थन नहीं मिलता। डॉ. आंबेडकर के निष्कर्ष अकाट्य हैं, किंतु दुर्भाग्य से इनकी सबसे ज्यादा अनदेखी उन्हीं लोगों ने की जो उनके विचारों पर चलने का सबसे जोर-शोर से दावा करते हैं।

बाबासाहेब द्वारा हिंदू समाज के सुधार के प्रयासों को हम नकारें नहीं। उन्होंने संस्कृत को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिए जाने का समर्थन किया था। सड़ी-गली जाति व्यवस्था के विरोध का साहस दिखाया था। साथ ही हिंदू समाज में अन्य गलत प्रथाओं का विरोध किया था। उनके विचार में ये प्रथाएं भारत के सच्चे अर्थों में मजबूत लोकतंत्र बनने की राह में बाधक हैं। इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा डॉ. आंबेडकर के विचारों को संपूर्णता में युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास सराहनीय है। मेरी राय में उच्च शिक्षण संस्थाओं को भी इसके लिए आगे आना चाहिए।

(लेखक पूर्व भाजपाध्यक्ष व पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)