इसमें कोई संदेह नहीं कि इंदौर डीपीएस बस हादसे ने जिम्मेदारों को लंबी नींद से जगाया है! इसमें भी कोई संशय नहीं कि सोकर जागती, रुक-रुककर भागती व्यवस्था, अपनी उपस्थिति का आभास करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है! मतलब साफ है - प्रशासन पड़ताल में जुटा है, पुलिस कार्रवाई कर रही है, परिवहन विभाग बगैर परेशानी बताए आम आदमी की पीड़ा समझ रहा है! लेकिन, जो कीमत चुकाकर अब हम अपने होने का असर बता रहे हैं, वह तब और अमूल्य होता जब हादसे के पहले ही व्यवस्था के बेदर्द चेहरे हमदर्द बन जाते! निजी स्कूल मुनाफे के जो नित-नए मुहावरे बना रहे हैं, वे भी इस बहाने ही सही, अब सामने आने चाहिए! उदाहरण के लिए, स्कूलों में दोपहर का भोजन।

मध्यप्रदेश के लगभग 30-40 फीसदी सीबीएसई स्कूलों ने भोजन अनिवार्य कर रखा है। इसके लिए 900 से 1500 रुपए प्रतिमाह शुल्क लिया जा रहा है। यह राशि पहली से बारहवीं तक के सभी बच्चों के लिए समान है। जबकि, विशेषज्ञों का मानना है कि पांचवीं तक के बच्चों के लिए सामान्य पौष्टिक भोजन का खर्च 400-500 रुपए प्रतिमाह से ज्यादा नहीं होता! यहीं से शुरू होता है नीति-नीयत का अंतर! दरअसल, भोजन को लेकर सीबीएसई ने जो गाइडलाइन जारी की है उसके अनुसार, स्कूल प्रबंधन बच्चों का खाना जांचते रहें ताकि इनमें जंक फूड न हो। इसी के साथ, यह भी ध्यान रखें कि स्कूल परिसर के 200 मीटर के अंदर भी जंक फूड नहीं मिलें।

भोजन हाई फैट शुगर सॉल्ट (एचएफएसएस) वाला न हो। मतलब, समोसा, आलू चिप्स, बेक्ड समोसा प्रतिबंधित। स्कूल में बनने वाले भोजन की गुणवत्ता जांचने के लिए कैंटीन मैनेजमेंट कमेटी बनाई जाए। 7 से 10 सदस्य वाली इस कमेटी में स्कूल प्रबंधन, शिक्षक, अभिभावक, कैंटीन प्रबंधन सहित ऐसे लोग शामिल किए जाएं जो लगातार भोजन की गुणवत्ता पर नजर रख सकें। क्या मध्यप्रदेश के स्कूलों में इस प्रकार के नियमों का पालन किया जा रहा है? यदि हां-तो क्या कोई प्रामाणिक विश्वसनीय दस्तावेज हैं? यदि नहीं-तो क्या हम खराब खाने के कारण घटी किसी बड़ी घटना की प्रतीक्षा कर रहे हैं!

ताकि, उसके बाद भी दावा कर सकें- 'देखिए हमने चार दिन में ही जमीन-आसमान का अंतर खड़ा करके दिखा दिया!' अनुमान लगाइए, जिस स्कूल में 2000 बच्चे नियमित रूप से खाना खाते हैं वहां गेहूं की गुणवत्ता कैसी है? सब्जी कहां से आ रही है? खाना कौन और कैसे बना रहा है? एक बच्चा यदि दो चपाती भी खा रहा है तो तय समय में 4000 गर्म चपातियों की व्यवस्था कैसे की जा रही है? कांचीपुरम (तमिलनाडु) में एक निजी स्कूल है हीरानंदानी अपस्केल स्कूल। इसके खिलाफ भारती राजेंद्रन ने 2016 में मद्रास हाई कोर्ट में याचिका लगाई। मांग थी-'प्रबंधन बच्चों के लिए स्कूल का भोजन-नाश्ता अनिवार्य नहीं कर सकता। कोर्ट ने अस्थायी राहत देते हुए कहा-'अतिरिक्त शुल्क लेकर, स्कूल से ही भोजन लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता! यह सच है कि बच्चों को पौष्टिक भोजन दिलाने-खिलाने के लिए अभिभावक पहले से ज्यादा जागरूक हो गए हैं।

यदि व्यवस्था और समय उनका साथ नहीं दे रहे हैं तो स्कूलों के भरोसे रहने की बजाय वे नए विकल्प पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं। जैसे-पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद में प्रचलित म्माज टिफिन बॉक्स, छोटा भीम डिब्बा, आई-टिफिन। पुणे में पिछले साल ही इसी तरह का स्टार्टअप शुरू करने वाले कौस्तुभ मंत्री कहते हैं-'मार्केट रिसर्च में हमने पाया कि कामकाजी महिलाएं और बी-ग्रेड स्कूल के बच्चे पौष्टिक भोजन को लेकर परेशान हैं। समय की कमी से मां ताजा भोजन नहीं बना पाती और स्कूलों में गुणवत्ता निर्धारण की कोई व्यवस्था नहीं है! इसलिए, हमने पिछले साल एक प्रयोग शुरू किया।

सुबह 6 बजे बच्चों की उम्र और जरूरत के हिसाब से हम टिफिन घरों में ही पहुंचा देते हैं। जो बच्चे स्कूल में बने खाने से दूरी रखना चाहते हैं, उन्हें टिफिन स्कूल में उपलब्ध करवाया जाता है। बहरहाल, डीपीएस हादसे के बाद आई सक्रियता, व्यवस्था की अनिवार्य आवश्यकता बन जाए, तभी हम दावे से कह सकेंगे कि यह सतर्कता अब नया संकट नहीं लाएगी! केवल दो छोटी जरूरत हैं - स्कूल फायदे के गैर-जरूरी कायदे नहीं बनाए और सरकार साफ नीयत और ईमानदार इच्छाशक्ति से अपने ही बनाए नियम लागू करवाए!