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    आलेख : वोट बैंक साधकर चलने की मजबूरी - सुरेंद्र किशोर

    Published: Wed, 14 Feb 2018 10:46 PM (IST) | Updated: Thu, 15 Feb 2018 04:00 AM (IST)
    By: Editorial Team
    dalit2 14 02 2018

    भाजपा नेतृत्व आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और टीडीपी के रूठे नेता चंद्रबाबू नायडू को मनाने में लगा है। माना जा रहा कि दोनों के बीच सुलह हो जाएगी। कुछ राजनीतिक सहयोगियों के मामले में यही काम 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा नहीं कर सकी थी। नतीजतन, सत्ता उसके हाथ से निकल गई थी। लगता है इस बार भाजपा छाछ फूंक-फूंककर पी रही है। 1999 व 2004 लोकसभा चुनावों के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं कि यदि भाजपा ने तब रामविलास पासवान को मना लिया होता और द्रमुक उससे दूर नहीं गई होती तो 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद सत्ता राजग के पास ही रहती। दरअसल कोई बड़ा चुनाव जीतने के लिए न सिर्फ अच्छे कामों की जरूरत पड़ती है, बल्कि मजबूत सहयोगी और एक स्थायी वोट बैंक भी चाहिए होता है। अपने देश में कुछ नेता व दल वोट बैंक का इस्तेमाल अलग-अलग उद्देश्यों की पूर्ति हेतु करते हैं। कोई जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंक का इस्तेमाल अपने वंशवाद, व्यापक भ्रष्टाचार, अपराध व व्यक्तिगत धन संग्रह अभियान के काम को आगे बढ़ाने के लिए करता है, तो कोई व्यापक जनहित में करता है।


    यदि अच्छे काम करने वाले सत्ताधारी दल के पास एक स्थायी वोट बैंक की ताकत नहीं होगी तो उसका तंबू छोटी-मोटी प्रतिकूल सियासी-गैरसियासीहवा में ही उखड़ जाएगा। जैसा हाल में राजस्थान के उपचुनावों में हुआ। जाने-अनजाने वोट बैंक इस देश की राजनीति पर 1952 से ही हावी हैं। आजादी के तत्काल बाद सरकार ने अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान किया। आरक्षण दस साल के लिए ही हुआ था, यानी दस साल बाद आरक्षण नियम के नवीनीकरण के लिए इन जातियों को कांग्रे्रेस पर निर्भर रहना ही था। फिर वे किसी दूसरे दल को वोट क्यों देतीं? जिस दल को आजादी दिलाने का सबसे अधिक श्रेय मिला था, उसके प्रति आम लोग प्रारंभिक वर्षों में आकर्षित थे, पर वे वोट बैंक के रूप में कांग्रेस के राजनीतिक दुर्दिन में भी काम आते रहे। याद रहे कि हर दस साल पर आरक्षण का नवीनीकरण होता रहा। 1947 में भारी सांप्रदायिक हिंसा और तनाव के बीच देश का बंटवारा हुआ। जो मुसलमान भारत में ही रह गए, उनकी सुरक्षा की समस्या थी। कांग्रेस सरकार ने उन्हें सुरक्षा का वादा किया और इस तरह वह भी एक वोट बैंक बन गया। जिस जाति का प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री होता है, उस जाति का बिन मांगे समर्थन उस नेता और पार्टी को मिल जाता है। 1988-89 में जब लगा कि वीपी सिंह प्रधानमंत्री बनने ही वाले हैं तो उनकी जाति के अधिकतर लोगों का बिना मांगे उन्हें समर्थन मिल गया था। यह लाभ देश के प्रथम प्रधानमंत्री को भी मिलना स्वाभाविक ही था।


    इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में तो महिलाओं का भी आकर्षण कांग्रेस के प्रति बढ़ा। हालांकि इंदिरा गांधी को सर्वाधिक लाभ 'गरीबी हटाओ के नारे से मिला। गरीबों का एक वोट बैंक भी उनके पक्ष में तैयार हो गया था। ऐसे वोट बैंक के सहारे कांग्रेस बहुत दिनों तक राज करती रही। कुछ अच्छे किंतु अधिकतर विवादास्पद कामों के बावजूद कांग्रेस की सत्ता लंबे समय तक चलती रही, पर समय बीतने के साथ जैसे-जैसे मतदाताओं ने देखा कि कांग्रेस सरकारें वोट बैंक का सदुपयोग नहीं कर रही हैं तो उसे बारी-बारी से केंद्र और अधिकतर राज्यों की सत्ता से हटा दिया।


    इसके मुकाबले राजग और खासकर मोदी के नेतृत्व में भाजपा का भी अपना वोट बैंक तैयार हो रहा है, हालांकि उसकी गति धीमी है। राजग सरकार के पक्ष में ऐसे लोगों का वोट बैंक तैयार हो चुका है जो चाहता है कि राजनीतिक कार्यपालिका भ्रष्टाचार से मुक्त हो। इस मामले में मोदी सरकार सफल रही है। मोदी मंत्रिमंडल के किसी सदस्य पर भ्रष्टाचार का कोई गंभीर आरोप नहीं लगा है। मंत्रियों ने आम तौर पर दामन बचा रखा है। एक-दो अपवादों को छोड़कर अब तक के अधिकतर केंद्रीय मंत्रिमंडलों का कोई न कोई मंत्री गंभीर आरापों के घेरे में रहा है। राजग के पक्ष में दूसरा वोट बैंक ऐसे लोगों का है, जो चाहते हैं कि केंद्र सरकार देश को तोड़ने और हथियारों के बल पर सत्ता पर कब्जा करने की कोशिश में लगे आतंकवादियों-अतिवादियों के प्रति नरमी न दिखाए। मोदी सरकार इस काम में सफल होती दिख रही है। भ्रष्टाचार के मामले में मोदी सरकार की सफलता अधूरी है, पर लोग उसकी मंशा पर शक नहीं कर रहे हैं।


    संकेत हैं कि राजग नेतृत्व दो अन्य प्रमुख मुद्दों पर भी मंथन कर रहा है। एक मुद्दा है पिछड़ों के लिए जारी 27 प्रतिशत आरक्षण को तीन हिस्सों में बांटने का। दूसरा मुद्दा है महिला आरक्षण बिल पास कराने का। अगले लोकसभा चुनाव के लिए मजबूत वोट बैंक तैयार करने की दिशा में ये मुद्दे काफी मददगार साबित हो सकते हैं। देखना है कि इन मुद्दों को आगे बढ़ाने हेतु जैसी राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है, वह राजग नेतृत्व दिखाता है या नहीं?


    ओबीसी आरक्षण के वर्गीकरण को लेकर केंद्र सरकार ने जैसे कदम उठाए हैैं, उसके सकारात्मक संकेत आ रहे हैं। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने 2011 में ही मनमोहन सरकार से यह सिफारिश की थी कि 27 प्रतिशत आरक्षण को तीन हिस्सों में बांट दिया जाना चाहिए। उस सरकार ने इस सिफारिश को राजनीतिक रूप से नुकसानदेह माना। मोदी सरकार ने गत साल गांधी जयंती पर इस संबंध में बड़ा निर्णय किया। उसने पूर्व जस्टिस रोहिणी की अध्यक्षता में एक आयोग बना दिया है। अब तक यह पाया जाता रहा है कि 27 प्रतिशत कोटे के बावजूद औसतन 11 प्रतिशत पिछड़ों को ही कोटे के तहत नौकरियों में जगह मिल पा रही है। यदि वर्गीकरण से कुछ लोगों को अपने हक में यह प्रतिशत बढ़ने की संभावना नजर आएगी तो उनका मजबूत समर्थन राजग को मिल सकता है। महिला आरक्षण विधेयक 2010 में राज्यसभा से पास हो गया था। इस विधेयक के जरिए विधायिकाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। आम सहमति के अभाव में यह संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में लटक गया था। अगस्त 2014 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण विधेयक पास करने की जरूरत बताई थी। उम्मीद है कि अगर मोदी सरकार महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश करती है तो कांग्रेस उसका विरोध नहीं करेगी। मोदी सरकार के लिए यह एक अनुकूल राजनीतिक अवसर है। यदि उक्त विधेयक पास हो गया, तो भी उसका राजनीतिक लाभ उसे मिलेगा और यदि कांग्रेस ने उसे पास नहीं होने दिया तो कांग्रेस पर महिला विरोधी होने का आरोप लगेगा। कुल मिलाकर पहल करने का अवसर केंद्र की राजग सरकार को मिला हुआ है। ऐसा अवसर 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी मिला था। उन्होंने 'गरीबी हटाओ का लोकलुभावन नारा दिया और 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया एवं प्रिवी पर्स समाप्त कर ऐसा माहौल बना दिया कि वह अपने ही बल पर आसानी से लोकसभा चुनाव जीत गईं।


    (लेखक राजनीतिक विश्लेषक तथा वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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