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    देश के बड़े मंदिरों की तरह अब महाकाल में भी हो भीड़ प्रबंधन

    Published: Sun, 11 Feb 2018 01:27 PM (IST) | Updated: Sun, 11 Feb 2018 01:29 PM (IST)
    By: Editorial Team
    aashish vyas mahakal temple 11 02 2018

    ने वाले बुधवार को महाशिवरात्रि है। एक बार फिर उज्जैन में महाकाल का प्रांगण भक्तों की अपार श्रद्धा प्रमाणित करेगा। उम्मीद है इस बार भी एक से डेढ़ लाख शिव भक्त दर्शन-दीर्घा की शोभा बढ़ाएंगे। सिंहस्थ (2016) के दौरान एक महीने में ही सवा सात करोड़ के जनसैलाब को नियंत्रित करने वाली स्थानीय व्यवस्था के लिए यह भीड़-प्रबंधन मुश्किल नहीं है, लेकिन बीते कुछ महीनों में बड़े अवसरों पर सामने आया श्रद्धालुओं का तार्किक असंतोष, अव्यवस्थाओं को नए सिरे से रेखांकित कर रहा है।

    क्योंकि, मध्यप्रदेश के लिए महाकाल सिर्फ मंदिर नहीं, बल्कि देश-दुनिया को धार्मिक पर्यटन के लिए अपने राज्य में बुलाने का गेट-वे भी है! इसलिए, हमें देश के अन्य बड़े धार्मिक स्थलों में भक्तों की सुविधा के लिए किए जा रहे प्रयास के साथ-साथ सुरक्षा की अत्याधुनिक तकनीक पर भी ध्यान देना चाहिए। जैसे, तिरुपति बालाजी।

    आंध्रप्रदेश के इस विश्व प्रसिद्ध मंदिर में इन दिनों 'स्लॉट सिस्टम' लागू करने की कवायद चल रही है। नई व्यवस्था में बैकुंठ एकादशी, विजयादशमी, शनिवार-रविवार या अन्य छुटि्टयों के दिनों में जब एक से डेढ़ लाख भक्त पहुंचते हैं, तब भी भक्तों को दो-ढाई घंटे में दर्शन हो सकेंगे! अभी दर्शन में 4 से लेकर 24 घंटे (भीड़ के हिसाब से) तक लग जाते हैं।

    तिरुपति के चीफ सिक्यूरिटी ऑफिसर रविकृष्णन कहते हैं - इस ऑनलाइन सेवा को मार्चअप्रैल में शुरू करने की योजना है। भक्तों को प्रवेश के साथ ही उनकी सुविधा के अनुसार दर्शन के लिए तय समय बता दिया जाएगा। उदाहरण के लिए जिसने शाम 4 बजे का समय तय किया है, अब उसे सुबह से लाइन में लगने की जरूरत नहीं है। वे निर्धारित समय पर मंदिर प्रांगण में पहुंचकर दर्शन कर सकते हैं। भीड़ प्रबंधन के इस नए तरीके में एक और बड़ा सुधार यह है कि जिसे जो समय मिला है, उसे उसी दौरान (पहाड़ के नीचे से ऊपर तक, दो चेक पोस्ट) प्रवेश दिया जाएगा।

    इसे भीड़ प्रबंधन का टेक्नो फ्रेंडली तरीका भी कहा जा सकता है! आम दिनों में भी यहां नियमित रूप से 60-70 हजार श्रद्धालु पहुंचते हैं। एक घंटे में चार से पांच हजार भक्त मंदिर के गर्भगृह से बाहर आते हैं। परिसर में 280 से ज्यादा ऐसे कैमरे भी लगाए जा रहे हैं जो भक्तों की भीड़ से दर्शन दलाल, लड्डू दलाल या जेबकतरों का चेहरा पहचानकर प्रबंध समिति को अलर्ट मैसेज भेजेंगे! अब शिर्डी। पिछले कुछ सालों से साई दरबार में भक्तों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

    विशेष रूप से बाबा की पुण्यतिथि (विजयादशमी), गुरु पूर्णिमा, रामनवमी और साल के आखिरी दिनों में। संस्थान केजनसंपर्क अधिकारी मोहन यादव बताते हैं - इस वर्ष साई समाधि के 100 साल पूरे हो रहे हैं। भीड़ नियंत्रण के लिए पुराने प्रसादालय को तोड़कर भक्तों के बैठने की व्यवस्था की जा रही है। वहां भी निशुल्क भोजन, पानी, चाय, आदि की व्यवस्था की जाएगी। तर्क है भक्तों की मन:स्थिति समझकर उन्हें आराम से एक जगह बैठा दिया जाए तो भीड़ कभी भी अनियंत्रित नहीं होती! समय ज्यादा लगने पर भी अव्यवस्था नहीं फैलती है। शिर्डी में निशुल्क दर्शन के लिए पास की व्यवस्था पहले से ही जारी है। एक नई उम्मीद और आकार ले रही है।

    भीड़ प्रबंधन के उलझे सवालों का जवाब ढूंढने में लगे हैं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु के प्रोफेसर डॉ. आशीष वर्मा। मूलत: इंदौर के रहने वाले डॉ. वर्मा ने 2016 में सिंहस्थ के दौरान उज्जैन में रहकर आंकड़े जुटाए। उनका दावा है- वैज्ञानिक विश्लेषण के साथ यह देश का पहला शोध होगा! इसमें भीड़ की संख्या और लोगों के सामूहिक-सामाजिक-मानसिक व्यवहार पर तार्किक बात होगी। शोध मुख्य रूप से तीन आधार पर काम करेगा।

    पहला- क्राउड सेफ्टी गाइडलाइन : उज्जैन में सिंहस्थ के आखिरी दिन एक से सवा करोड़ लोग आए। उज्जैन को आधार बनाकर यह समझा जाएगा कि आदर्श स्थिति में कितने क्षेत्रफल में, कितनी भीड़ एकत्रित होना चाहिए? एक व्यक्ति के आसपास कितनी जगह होना चाहिए? भीड़ को एक जगह पर कितनी देर, कैसे वातावरण में, किन परिस्थितियों में और कितनी देर रोका जा सकता है? इससे पता चलेगा कि व्यक्ति के धैर्य की सीमा कितनी है?

    दूसरा- अर्ली वॉर्निंग सिस्टम : यदि गाइडलाइन फेल हो गई तो अर्ली वॉर्निंग सिस्टम काम करेगा। जैसे शिवरात्रि या सिंहस्थ शाही स्नान। तब दर्शनों के लिए निर्धारित समय जैसी कोई व्यवस्था नहीं होती। इसलिए, ऐसी तकनीक कीजरूरत है जो घटना के आधे से एक घंटे पहले ही अलर्ट कर दे। बता दे कि आयोजन स्थल के इस हिस्से में दबाव बढ़ रहा है! ताकि, तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था पर काम किया जा सके!

    तीसरी- शॉक वेव्स को फैलने से रोकना : जब भीड़ बढ़ जाती है तो एक-दूसरे से टकराने के कारण भीड़ को गति मिलती है। इसे शॉक वेव्स कहते हैं। यदि केंद्र को पहचान कर इसकी गति को शून्य कर दिया जाए तो असर छोटे हिस्से में सीमित हो जाएगा! उम्मीद की जाना चाहिए कि महाकाल की नगरी से शुरू हो रहा यह शोध भीड़ प्रबंधन की दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धि अर्जित करेगा।

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