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    आलेख : विभाजन की त्रासदी पर बेसुरा राग - कुलदीप नैयर

    Published: Tue, 13 Mar 2018 10:59 PM (IST) | Updated: Wed, 14 Mar 2018 04:04 AM (IST)
    By: Editorial Team
    11india-spl1 13 03 2018

    नेशनल कांफ्रेंस के वरिष्ठ नेता एवं जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की यह बात किंचित सत्य हो सकती है कि मोहम्मद अली जिन्न्ा बंटवारे के लिए जिम्मेदार नहीं थे, लेकिन जब वह पंडित जवाहरलाल नेहरू या सरदार वल्लभभाई पटेल को इसका दोषी बताते हैं, तो गलत कह रहे होते हैं। मैं उस काल का गवाह रहा हूं और उस दौर की घटनाओं को कहीं अच्छे से समझता हूं। जिन्न्ा हिंदू और मुसलमानों की एकता के राजदूत थे, जैसा कांगे्रस की शीर्ष नेता सरोजनी नायडू कहती थीं, लेकिन उन्हें बंटवारे की ओर धकेला गया। यह स्पष्ट है कि बीती सदी में 40 के दशक की शुरुआत तक आते-आते हिंदुओं और मुसलमानों के बीच मतभेद इतने बढ़ गए थे कि बंटवारे जैसा कुछ जरूरी हो गया था। बंटवारे पर अफसोस जताने वालों को मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूं कि अंगे्रज इस उपमहाद्वीप को एक रख सकते थे, अगर वे उस समय थोड़े और अधिकार दे देते, जब 1942 में स्टेफर्ड क्रिप्स ने अपनी सीमित जिम्मेदारी के तहत भारत की जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास किया था। कांगे्रस पार्टी भी ऐसा कर सकती थी, अगर उसने 1946 में कैबिनेट मिशन के सीमित अधिकारों वाले केंद्र के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया होता। इसके तहत केंद्र को दिए गए अधिकारों को छोड़कर राज्यों के पास सारे अधिकार होते। जिन्न्ा ने कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार कर लिया था, लेकिन शायद वही होना था जो हुआ। वह एक ऐसा दौर था, जब अच्छा होने की कल्पना तो की जाती थी, लेकिन उस पर आशंकाएं ही भारी पड़ रही थीं।


    क्या बंटवारे ने मुसलमानों का उद्देश्य पूरा किया? इस बारे में मैं नहीं जानता। यह जरूर है कि पाकिस्तान में लोग बंटवारा शब्द का जिक्र करने से कतराते हैं। वे 14 अगस्त को अंगे्रजों के शासन से मुक्ति के दिवस से कहीं अधिक हिंदुओं के शासन के भय से मुक्ति के दिवस रूप में मनाते हैं। मैंने पाकिस्तान की अपनी यात्राओं के दौरान वहां के लोगों को यह कहते पाया है कि उनके लिए कम से कम कोई तो ऐसी जगह है, जहां वे 'हिंदू वर्चस्व और 'हिंदू आक्रामकता से सुरक्षित महसूस कर सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि बंटवारे से मुसलमानों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। वे तीन देशों भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में बंट गए। इसकी कल्पना ही की जा सकती है कि उनकी संख्या और उनके वोट का संयुक्त उपमहाद्वीप में कितना असर होता? आज वे कुल आबादी का एक तिहाई हिस्सा होते। इसका बुरा पक्ष यह है कि विभाजन की रेखा धर्म के आधार पर खींची गई। लगता है कि दोनों तरफ दुश्मनी का भाव और हथियार मौजूद रहने वाले हैं। दोनों देश 1965 और 1971 में दो युद्ध लड़ चुके हैं और हर समय एक-दूसरे के प्रति आक्रामक रुख में रहते हैं। इसके चलते वे लोगों को चैन से रहने नहीं देते। मुझे नहीं लगता कि दोनों देश के एक होने की संभावना है, लेकिन मुझे भरोसा है कि भय और अविश्वास के कारण सीमा पर बन गई दीवारें एक दिन गिर जाएंगी और उपमहाद्वीप के लोग बिना अपनी पहचान खोए, अपने साझा हितों के लिए साथ मिलकर काम करेंगे। मैं यह विश्वास अपने साथ उस समय से लिए हुए हूं, जब 70 साल पहले मैंने अपना शहर सियालकोट छोड़ा था। मैंने इसे नफरत और दुश्मनी के उस समंदर में तिनके की तरह पकड़ रखा है, जिसने उपमहाद्वीप को लंबे समय से निगल रखा है।


    कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्न्ा सियालकोट में मेरे लॉ कालेज में आए थे। तब वहां मैं अंतिम वर्ष का छात्र था। उन्होंने हर बार की तरह अपनी इस पसंदीदा थीम को छुआ कि हिंदू और मुसलमान अलग राष्ट्र हैं और अलग देशों में रहकर दोनों खुशहाल एवं सुरक्षित रहेंगे। एक देश में हिंदू और दूसरे में मुसलमान बहुमत में होंगे। मुझे नहीं मालूम कि उन्हें किस कारण यह लगा कि धर्म के आधार पर बने दो राष्ट्र खुशी से रहेंगे। मैंने उनसे यह सवाल भी किया था कि उन्हें कैसे यह विश्वास है कि जब अंगे्रज चले जाएंगे तो दोनों समुदाय एक-दूसरे से नहीं लड़ेंगे? इसके जवाब में उन्होंने कहा था कि जर्मनी और फ्रांस ने कई लड़ाइयां लड़ीं, लेकिन आज वे दोनों अच्छे दोस्त हैं। उनका कहना था कि यही भारत और पाकिस्तान के साथ होगा, लेकिन वह गलत साबित हुए। दो समुदायों के बीच अविश्वास के कारण हुए जबरिया विस्थापन ने लोगों को घर-बार और चूल्हा-चक्की छोड़ने को मजबूर किया, लेकिन उन्होंने इस संकल्प के साथ अपना घर-बार छोड़ा था कि बंटवारे के बाद के नतीजों के स्थिर होने के बाद वे वापस आएंगे। दुर्भाग्य से ऐसी स्थिति कभी नहीं आ सकी।


    हिंदुओं और सिखों ने पश्चिमी पंजाब छोड़ा और मुसलमानों ने पूर्वी पंजाब। इस प्रक्रिया में दस लाख लोगों ने अपनी जानें गंवाई। मैंने एक बार लंदन में लॅार्ड रेडक्लिफ से इस बारे में जानने की कोशिश की थी। ज्ञात हो कि यह रेडक्लिफ ही थे, जिन्होंने विभाजन की रेखा खींची थी। वह विभाजन के बारे में बात ही नहीं करना चाहते थे। मुझे बताया गया कि उन्होंने इस काम के लिए तयशुदा फीस यानी 40 हजार रुपया लेने से मना कर दिया था, क्योंकि उन्हें यह लगा कि विभाजन के दौर में जो कुछ हुआ, वह उनकी आत्मा पर बोझ है। विभाजन के वक्त बड़े पैमाने पर हुए कत्लेआम के लिए वह खुद को माफ नहीं कर सके। आज भी इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं कि सदियों से साथ रहने के बावजूद लोगों ने एक-दूसरे को क्यों मारा?


    इससे निरर्थक कुछ हो नहीं सकता कि 70 साल बाद यह निश्चित किया जाए कि भारत के बंटवारे के लिए कौन जिम्मेदार है? सात दशक पहले हुए घटनाक्रम को लेकर ऐसा करना महज एक कठिन अकादमिक कार्य होगा। पाकिस्तान के संस्थापक लगातार यह दोहराते रहे कि हिंदू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र हैं। और यही दोनों को दूर करता गया। महात्मा गांधी ने इसका जवाब यह कहकर जरूर दिया कि वह इस्लाम को अपना लेते हैं तो क्या उनका अलग राष्ट्र हो जाएगा? और यदि वह हिंदू धर्म में वापस आ जाएं, तो फिर क्या होगा? सबसे खराब बात यह हुई कि पाकिस्तान को मुस्लिम देश के रूप में जाना जाने लगा। भारत ने सेक्युलरिज्म अपना तो लिया, लेकिन हिंदुत्व को काबू में नहीं किया गया। दुर्भाग्य से हिंदुओं में यह भावना बढ़ रही है (खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से) कि वे बहुमत में हैं, इसलिए देश में ऐसी व्यवस्था हो, जिसमें हिंदुत्व की झलक हो। लोग आजादी के आंदोलन के सेक्युलर चरित्र व आजादी के बाद पांच दशकों के शासन को याद कर सकते हैं, किंतु आज संघप्रमुख मोहन भागवत चीजें तय करते हैं। यह सेक्युलर संविधान और उसके तहत बने कानूनों के बाद भी हो रहा है। फारूक अब्दुल्ला को नेहरू और पटेल को दोष नहीं देना चाहिए, जिन्होंने देश चलाने का काम नई पीढ़ी को सौंप दिया जो वे और हम, मुसलमान और हिंदू के माहौल में बड़े हो रहे हैं।

    (लेखक ख्यात पत्रकार तथा वरिष्ठ स्तंभकार हैं )

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