अपनी मशहूर पुस्तक 'पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन में बाबासाहब भीमराव आंबेडकर एक जगह लिखते हैं कि 'मैन लव प्रॉपर्टी मोर दैन लिबर्टी। इस कथन का सरल अर्थ तो यह है कि मनुष्य मुक्ति से अधिक धन से प्रेम करता है, लेकिन इसका गूढ़ अर्थ यह है कि मुक्ति के मुकाबले लोगों में आर्थिक सुरक्षा की चाहत कहीं से भी कमतर नहीं है। आधुनिक काल में यह आर्थिक सुरक्षा और भी अधिक अहम हो जाती है, क्योंकि आर्थिक पराधीनता हर पराधीनता की जननी है।

डॉ. आंबेडकर के दर्शन के आलोक में मोदी सरकार द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में दस प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान का औचित्य सिद्ध होता है। हालांकि आर्थिक आरक्षण की इस पहल को लेकर देश में विवाद छिड़ गया है। कुछ इसे आरक्षण-जुमला कह रहे हैं तो कुछ संविधान-विरोधी बताते हुए इसके सर्वोच्च न्यायालय से खारिज हो जाने का अंदेशा जता रहे हैैं। कुछ अन्य आरक्षण के आर्थिक आधार पर ही प्रश्न उठा रहे हैं तो कुछ इसे दलित-पिछड़ा विरोधी बताने में लगे हुए हैं। कई राजनीतिक पार्टियां इसे चुनावी स्टंट मान रही हैं। हालांकि लोकसभा और राज्यसभा में अधिकांश राजनीतिक दलों ने आर्थिक आरक्षण संबंधी विधेयक का समर्थन ही किया।

सर्वप्रथम यह देखते हैं कि क्या संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान है? इसका उत्तर जानने के पहले यह जानना उपयुक्त होगा कि संविधान में आरक्षण का आधार क्या है? वर्तमान आरक्षण का आधार संविधान के अनुच्छेद 15(4) और अनुच्छेद 16(4) हैं। अनुच्छेद 16(4) के अनुसार राज्य नागरिकों के किसी पिछड़े वर्ग के लिए नियुक्तियों-पदों में आरक्षण के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है। यहां पर दो बातें उल्लेखनीय हैैं। पहली बात तो यह कि अनुच्छेद 16(4) मूल संविधान में ही आरंभ से है। दूसरी, आरक्षण का यह प्रावधान पिछड़े वर्ग के लिए है। पिछड़ेपन का यह आधार सामाजिक हो सकता है, शैक्षणिक हो सकता है और आर्थिक भी हो सकता है।

विरोधियों द्वारा तर्क दिया जा रहा है कि संविधान के अनुच्छेद 15(4) में तो सिर्फ सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े तबकों के लिए ही आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन यहां भी दो तथ्य जानने की जरूरत है। पहला, अनुच्छेद 15(4) मूल संविधान में आरंभ से नहीं है। इसे बाद में प्रथम संविधान संशोधन के रूप में वर्ष 1951 में जोड़ा गया था, जब पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री और डॉ. आंबेडकर कानून मंत्री थे। दूसरा, चंपकम बनाम मद्रास राज्य केस (1951) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उलटने के लिए यह संविधान-संशोधन किया गया था।

उपरोक्त विश्लेषण से भी कई निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, आरक्षण किसी भी पिछड़े वर्ग के लिए हो सकता है, चाहे वह सामाजिक-शैक्षणिक दृष्टि से हो या आर्थिक रूप से। दूसरा, जिस तरह मूल संविधान में संशोधन कर अनुच्छेद 15(4) जोड़ते हुए सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े तबकों के लिए विशेष प्रावधान किया गया, उसी तरह एक और संशोधन कर आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए भी विशेष प्रावधान किया जा सकता है। तीसरा, केंद्र सरकार चाहे तो सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को संविधान संशोधन के माध्यम से पलट सकती है। इस आलोक में आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए आरक्षण देने का निर्णय कहीं से भी असंवैधानिक नहीं है।

यह आरोप भी गलत है कि 'आर्थिक आरक्षण दलित-पिछड़े तबकों के हितों पर कुठाराघात है। जबकि सरकार ने स्पष्ट उल्लेख किया है कि प्रस्तावित दस प्रतिशत आरक्षण दलित-पिछड़ों के मौजूदा 49.5 प्रतिशत आरक्षण के अतिरिक्त होगा। अर्थात इन तबकों के आरक्षण कोटा पर कोई आंच नहीं आएगी। कुछ लोगों के लिए प्रस्तावित आरक्षण एक जुमलेबाजी और 2019 का चुनावी लॉलीपॉप भर है। इनके अनुसार पहले भी आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया गया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। ये लोग पीवी नरसिंह राव सरकार द्वारा दिए गए दस प्रतिशत 'आर्थिक आरक्षण के आदेश के खारिज होने का हवाला दे रहे हैं, लेकिन हमेशा अर्द्धसत्य बोलने वाले ये बुद्धिजीवी यह नहीं बताते कि पीवी नरसिंह राव सरकार द्वारा उक्त आरक्षण एक 'कार्यालयी ज्ञापन के माध्यम से लाया गया था, किसी संविधान संशोधन द्वारा नहीं। तब सुप्रीम कोर्ट ने संविधान में आर्थिक आधार के न होने पर इसे अमान्य कर दिया था, लेकिन मोदी सरकार संविधान में संशोधन करके आर्थिक आधार का प्रावधान करते हुए यह आरक्षण ला रही है, ताकि कोर्ट में भी यह न्यायिक समीक्षा का सामना कर सके। यहां यह ध्यान रहे कि वर्ष 2008 में केरल की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा जब उच्च शिक्षा संस्थानों में दस प्रतिशत का 'आर्थिक आरक्षण दिया गया तो उसे चुनौती दी गई, लेकिन केरल उच्च न्यायालय ने इस आरक्षण को सही ठहराया। अब सुप्रीम कोर्ट में इस पर अपील लंबित है। स्पष्ट है कि यह कहना ठीक नहीं कि वर्तमान कवायद महज हवाबाजी या जुमलेबाजी भर है।

आर्थिक आरक्षण पर एक अन्य हवाला यह दिया जा रहा है कि इंदिरा साहनी केस (1992) में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत की गई है। यह पूरी तरह सही नहीं है। सरकार के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने यह सीमा-रेखा एससी, एसटी और अन्य पिछड़ा वर्गों के कुल आरक्षण के लिए खींची थी। इस फैसले में कोर्ट ने यह भी कहा था कि इस विविधता भरे देश में विशिष्ट परिस्थितियों में 50 प्रतिशत की इस सीलिंग से छूट ली जा सकती है। अर्थात सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को मुख्यधारा में लाने में 50 प्रतिशत की हदबंदी लागू नहीं होती है।

कई नेताओं और बुद्धिजीवियों की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि आर्थिक आरक्षण आगामी आम चुनाव के पहले की गई एक राजनीतिक 'सर्जिकल स्ट्राइक है। उनका कहना है कि भाजपा की यह कवायद 2109 के आम चुनाव को ध्यान में रखकर की गई है, लेकिन यहां यह समझने की जरूरत है कि हरेक राजनीतिक दल अपनी नीतियां बनाने या फैसले लेते वक्त यह जरूर विचार करता है कि इससे उसे क्या राजनीतिक अथवा चुनावी नफा-नुकसान हो सकता है। यह बात कांग्रेस, सपा, बसपा, कम्युनिस्ट और अन्य सभी पार्टियों पर लागू होती है और भाजपा भी अपवाद नहीं है। संविधान-कानून के दायरे में लिए गए किसी निर्णय से मोदी सरकार चुनावों में लाभ उठाना चाहती है तो यह कोई नाजायज बात नहीं है। आर्थिक आरक्षण के संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि यह सभी मजहब के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को उपलब्ध होगा, वे चाहे कथित उच्च जाति के हिंदू हों अथवा मुसलमान या ईसाई या अन्य समुदायों के लोग। इससे एक ओर इन समुदायों के कमजोर तबकों को मुख्यधारा में लाने में मदद मिलेगी तो दूसरी ओर सभी पंथों के बीच सामाजिक समरसता का भाव पैदा होगा। इसका एक फायदा यह भी होगा कि सामान्य या अनारक्षित वर्ग के अनेक लोगों में अब तक आरक्षण पा रहे तबकों के प्रति जो असंतोष, ईर्ष्या और आक्रोश का भाव है, वह कम होगा।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक एवं स्तंभकार हैं)