टीम नईदुनिया। भोपाल के बैरागढ़ में कपड़ा मार्केट में 17 दिसंबर को लगी भीषण आग ने फिर ऐसी आपदा से निपटने में प्रशासन की लाचारी उजागर कर दी है। यदि राजधानी में देखते-देखते एक सैकड़ा दुकानें खाक हो गईं तो छोटे शहरों में क्या हालात हो सकते हैं, इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है। 'नईदुनिया" की पड़ताल में पता चला कि मध्यप्रदेश के कुल 51 जिलों में से आठ में कंडम या अनुपयोगी दमकलें (चार जिलों में 2-2) भी हैं तो करीब 25 जिलों में आग से लड़ने के इंतजाम आबादी के लिहाज से पर्याप्त नहीं हैं। यहीं नहीं, आग से बचाव के उपकरणों, भवन में आग बुझाने के इंतजाम, बनावट आदि के आधार पर जारी होने वाले अनापत्ति प्रमाण पत्र (फायर एनओसी) के लिए इस साल केवल 178 आवेदन नगरीय विकास विभाग को मिले।

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प्रदेश में अग्निशमन सुविधाओं और जागरुकता की कमी से छोटी सी चिंगारी कभी भी दावानल बन सकती है। प्रदेश के चार बड़े शहरों में से एक जबलपुर की बानगी देखिए, यहां की आबादी करीब साढ़े 12 लाख है। 50 हजार की आबादी पर एक दमकल के हिसाब से यहां कम से कम 25 दमकल होना चाहिए लेकिन हैं केवल बारह।

इसी तरह नगर निगम की अग्निशमन सेवा में 252 कर्मचारियों के मुकाबले केवल 90 ही हैं। इसी शहर में अब 18 मीटर से अधिक ऊंची इमारतों को भी मंजूरी मिलने लगी है लेकिन निगम के फायर ब्रिगेड के पास आग बुझाने के लिए केवल 45 फीट यानी 13.7 मीटर ऊंची सीढ़ी ही है। इसकी तुलना में ग्वालियर की स्थिति कुछ ठीक है। करीब 13 लाख की आबादी पर 16 दमकल हैं और अन्य कई साधन भी।