प्राचीन दौर अलग था जब दुंदुभि बजाते हुए युद्ध की मुनादी की जाती थी या दुश्मन सेनाओं को चेताया जाता था। आज के तकनीक-प्रधान युग में तो सोशल मीडिया पर एक ट्वीट से प्रतिद्वंद्वी को ललकारा जा सकता है। ट्रंप ट्वीट करते हैं- 'रूस सीरिया की ओर दागी गई हर मिसाइल को गिराना चाहता है। तैयार हो जाओ रूस, क्योंकि वे मिसाइलें आ रही हैं। ये अच्छी, नई और 'स्मार्ट हैं। सेनाओं की हलचल बढ़े या न बढ़े। मिसाइलें दागी जाएं या न दागी जाएं। लेकिन आक्रोशित आरोप-प्रत्यारोपों या धमकियों का दौर तो चल ही रहा है और यह दुनिया को परमाणु जंग की आशंका से ग्रस्त करने के लिए काफी है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले हफ्ते सीरिया की राजधानी दमिश्क के नजदीक विद्रोहियों के कब्जे वाले शहर में हुए कथित रासायनिक हमले के बाद सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी। बचावकर्मियों व एक्टिविस्टों के मुताबिक इस रासायनिक हमले में 40 से ज्यादा लोग मारे गए, जबकि सीरियाई सरकार व उसके मित्र रूस ने ऐसे किसी हमले से इनकार किया है।


बहरहाल, ट्रंप के इस धमकी भरे ट्वीट का जवाब भी आया। रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने कहा कि अमेरिका की ओर से कोई भी मिसाइल हमला सीरिया के डोउमा में कथित रासायनिक हमले के सबूत मिटाने का प्रयास हो सकता है।


गौरतलब है कि सीरियाई संकट के इस दौर में राजधानी दमिश्क के नजदीक स्थित पूर्वी घोउटा क्षेत्र में पिछले कुछ दिनों में काफी हिंसक हमले हुए हैं और बीते शनिवार को हुए कथित रासायनिक हमले में दर्जनों लोगों के मरने की खबर है। यह हमला आए दिन होने वाली हिंसा की एक कड़ी है, जिसे सीरियाई लोग लगातार भुगत रहे हैं। बढ़ती हिंसा के चलते पिछले एक महीने में वहां 1600 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और 2000 से ज्यादा घायल हुए। पूर्वी घोउटा क्षेत्र वर्ष 2013 से विद्रोहियों के कब्जे में है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स बताती हैं कि पिछले चार हफ्तों में ही एक लाख तीस हजार से ज्यादा सीरियाई अपना घर-बार छोड़कर जा चुके हैं।


सीरिया पर इस वक्त सबकी निगाहें टिकी हैं। ट्रंप ने अचानक अपना लातिन अमेरिका दौरा रद्द कर दिया, वहीं वे पहले ही अपने सैनिकों को मेक्सिकंस से लड़ने के लिए सरहद पर भेज चुके हैं। समझा जा रहा है कि उन्होंने यह दौरा इस वक्त सीरिया पर फोकस करने की वजह से ही रद्द किया है।


यह कहना गलत होगा कि शीतयुद्ध का दौर खत्म हो गया। बल्कि अब तो यह पिछली सदी के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से तनावपूर्ण होता जा रहा है। भले ही इस दौरान खिलाड़ी कुछ बदल गए हों, लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी पश्चिमी देश तो यथावत हैं। हां, रूस अब पहले जैसी महाशक्ति नहीं रहा, लेकिन व्लादिमीर पुतिन जैसे साहसी नेतृत्व के साथ यह अब भी अपना दमखम दिखा रहा है। उसे चीन का भी साथ मिल सकता है, जो तेजी से विश्व की दूसरी महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। इस तरह का संयोजन वैश्विक मंच पर भू-राजनीतिक टकराव के लिहाज से घातक कहा जा सकता है।

अमेरिका अब भी दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति है, लेकिन अस्थिर ट्रंप के धुंधले वैश्विक नजरिए के साथ इसके लक्ष्य रोज बदलते रहते हैं। कभी यह रूस को धमकाता है, कभी ईरान पर निगाहें टेढ़ी करता है, कभी उत्तर कोरिया को निशाने पर लेता है, कभी पाकिस्तान-अफगानिस्तान पर फोकस करता है, कभी मेक्सिको को आंखें दिखाता है तो कभी सीरिया को निशाने पर लेने लगता है।


ट्रंप के अस्थिर रवैये का आलम यह है कि राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण करने के सवा साल बाद भी वे अब तक अपनी पुख्ता टीम नहीं तैयार कर सके हैं। वे अब तक इतने लोगों को बर्खास्त कर चुके हैं, जितने उनके किसी भी पूर्ववर्ती ने नहीं किए होंगे। वे तो अपनी ही सरकार के भीतर अपने ही लोगों से लड़ रहे हैं। इतना ही नहीं, व्यक्तिगत तौर पर उनका पिछला व मौजूदा रिकॉर्ड भी विवादित है।


ट्रंप रूस पर नरम-गरम होते रहते हैं। कहा जाता है कि रूस ने उनकी पिछले राष्ट्रपति चुनाव में हिलेरी क्लिंटन के खिलाफ जीतने में मदद की थी। हालांकि वे सीरियाई संकट के लिए मॉस्को को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनकी यह रणनीति है या छलावा, कोई नहीं कह सकता। अमेरिकी गुस्सा इस वजह से है कि रूस की मदद से सीरिया के शासक बशर अल असद ने न सिर्फ आईएसआईएल को उखाड़ फेंका, बल्कि निहत्थे नागरिकों के खिलाफ इसके हमले भी रोक दिए।


कुल मिलाकर यही लगता है कि सीरियाई विवाद कई धड़ों द्वारा लड़ा जा रहा है। एक ओर असद सरकार और रूस की अगुआई वाले इसके अंतरराष्ट्रीय साथी हैं। उनका विरोध सुन्न्ी अरब विद्रोही समूहों के गठजोड़ (जिसमें मुक्त सीरियाई सेना भी शामिल है), कुर्दिश सीरियाई डेमोक्रेटिक ताकतों (एसडीएफ), सलाफी जेहादी समूह (अल-नुशरा मोर्चा समेत) और इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड द लेवांट (आईएसआईएल) द्वारा किया जा रहा है। इसके अलावा इस क्षेत्र में स्थित इराक, तुर्की जैसे देश व बाहरी ताकतें भी या तो सीधे इसमें लिप्त हैं, या फिर किसी न किसी धड़े को समर्थन दे रही हैं।


ईरान, रूस और हिज्बुल्ला असद को सैन्य मदद देते हैं। रूस सितंबर 2015 से असद सरकार की मदद में हवाई ऑपरेशन चला रहा है। दूसरी ओर, वर्ष 2014 में स्थापित अमेरिकी की अगुआई वाला अंतरराष्ट्रीय गठजोड़, जो कथित तौर पर आईएसआईएल को रोकने के लिए बना था, असद और उनके समर्थकों के खिलाफ हवाई हमलों को अंजाम दे चुका है।


गौरतलब है कि अमेरिका इराक में आईएसआईएल के खिलाफ लड़ रहा है, लेकिन सीरिया में इसका मददगार है। ओबामा ने इस विरोधाभास पर गौर किया था, लेकिन वे कुछ नहीं कर पाए।


हां, सीरिया की विरासत ट्रंप को ओबामा से मिली है, जिन्हें अफगानिस्तान और ईरान की विरासतें जॉर्ज बुश जूनियर से मिली थीं। लेकिन ओबामा बेहतर समझ के साथ क्यूबा और ईरान के साथ तनाव को दूर करने में सफल रहे।


भले ही कुछ पश्चिमी ताकतें सीरिया में अमेरिकी अगुआई वाली मुहिम का हिस्सा हों, लेकिन अबवे थकने लगी हैं। फ्रांस अनमना है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे भी अस्थिर बहुमत के साथ ब्रिटिश संसद को हल्के में नहीं ले सकतीं।


इस तरह ट्रंप अपने रवैये से दुनिया को और उलझनकारी बना रहे हैं। उनके अधिकारी कहते हैं कि रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल एक तरह की बर्बरता है और अमेरिका इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। लेकिन अमेरिकी विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप अब भी ऐसी कोई राह नहीं तलाश सके हैं, जिससे घटनाक्रम में नाटकीय बदलाव लाया जा सके।

'स्मार्ट मिसाइलें दागी जाती हैं या नहीं (हम तो यही चाहेंगे कि न दागी जाएं), लेकिन सीरिया में रह रहे या वहां से पलायन कर यूरोप में अवांछित शरणार्थी की दयनीय जिंदगी जीने को विवश लोगों की दिक्कतों का अंत होता नजर नहीं आता।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं)