अब जबकि आम चुनाव की घोषणा में कुछ ही महीने शेष रह गए हैं, मोदी सरकार का आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों में दस फीसदी आरक्षण देने का फैसला एक महत्वपूर्ण 'राजनीतिक कदम माना जा रहा है। सरकार ने इसके लिए संविधान में 124वां संशोधन विधयेक लोकसभा में पेश कर दिया, जहां से यह राज्यसभा में जाएगा।

यह कठोर हकीकत है कि आरक्षण दशकों से भारतीय समाज और भारतीय राजनीति को झकझोर रहा है। देश की आजादी से पूर्व वर्ष 1932 में पुणे समझौते के तहत 148 सीटें दबे-कुचले समाज के लिए प्रांतीय सभा में और 18 फीसदी सीटें केंद्रीय कानून बनाने वाली सभा में आरक्षित की गई थीं। 1937 में सरकार के कानून में दबे समाज के सदस्यों के लिए सीट आरक्षण को शामिल किया गया। इस कानून में 'अनुसूचित जाति शब्द पहली बार इस्तेमाल हुआ। 1942 में बाबासाहब आंबेडकर ने ब्रिटिश सरकार को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण देने पर राजी किया। आजादी के बाद 1950 में भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकारों की रक्षा की गई और 1953 में पिछड़ी जातियों को पहचानने के लिए एक आयोग की स्थापना हुई। 1978 में मंडल आयोग ने पिछड़ी जातियों के लिए 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की, जिसे 11 वषर््ा बाद वीपी सिंह सरकार ने मंजूर कर भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया। पिछड़ों की राजनीति ने भारतीय जनमानस को चौंका दिया। मंडल राजनीति के चलते 1995 में संविधान में 77वां संशोधन हुआ, जिससे पदोन्न्ति में भी अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान हो गया। वर्ष 1997 में खाली रह गई आरक्षित नियुक्तियों को पचास प्रतिशत आरक्षण से अलग कर अलग श्रेणी मानने का प्रावधान भी स्वीकार हुआ।

मंडल आयोग की सिफारिशों में भारत के कृषि समुदाय विशेषकर कृषक जातियों जैसे जाट, गुर्जर आदि को, वहीं गुजरात में पटेल और महाराष्ट्र में मराठाओं को आरक्षण से मोहताज कर दिया गया। इस कारण पिछले कई वर्षों से इन जातियों/समुदायों ने गोलबंद होकर आंदोलन की मांग बुलंद की। कई प्रदेशों में यह आंदोलन हिंसक भी हुआ तो कई जगह राजनीतिक रूप से ताकतवर होने के कारण प्रांतीय सरकारों ने इनके दबाव के आगे झुकते हुए इन्हें आरक्षण दे दिया।

बहरहाल, आरक्षण की सीमा उच्चतम न्यायालय द्वारा 50 फीसदी तक तय कर दिए जाने के बाद जिस नई आरक्षण श्रेणी को बनाने की बात मौजूदा केंद्र सरकार ने की है, उसके चलते अब आरक्षण साठ फीसदी तक हो जाएगा। एक तरफ आरक्षण बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकारी नौकरियां घट रही हैं और निजी क्षेत्र में भी अस्थिरता का माहौल है, जहां पर कि आरक्षण नहीं है। वर्ष 2016-2017 के आर्थिक सर्वे के अनुसार 2006 में सरकारी क्षेत्र में कार्यरत लोगों की संख्या 1.82 करोड़ थी, जो 2012 में घटकर 1.72 करोड़ रह गई। यानी इस दौरान इसमें 3.3 फीसदी की कमी आ गई। दूसरी ओर निजी क्षेत्र में 2006 में 87.7 लाख नौकरियां थीं और 2012 तक यह आंकड़ा बढ़ते-बढ़ते 1 करोड़ 19 लाख तक पहुंच गया। यानी निजी क्षेत्र में उस दौरान नौकरियों में 30 फीसदी से अधिक इजाफा हुआ।

सरकार ने प्रस्तावित आर्थिक आरक्षण के लिए जो पैमाने तय किए हैं, उनको लेकर भी जानकारों के अलग-अलग मत हैं। आर्थिक रूप से पिछड़ा उन्हें ही माना जाएगा, जिनकी आमदनी 8 लाख रुपए सालाना से कम हो या जिनके पास 5 एकड़ से कम जमीन हो। इस लिहाज से तो अधिकांश लोग इस श्रेणी में शामिल हो जाएंगे। इसके साथ-साथ इस आरक्षण को कई लोग 'सवर्ण आरक्षण की भी संज्ञा दे रहे हैं, जो कई अर्थों में गलत है। उल्लेखनीय है कि इस आरक्षण के द्वारा सरकार जाति की जगह आर्थिक श्रेणी का निर्माण कर रही है, जिसमें हिंदू, मुस्लिम, पारसी, सिख समेत तमाम समुदाय शामिल होंगे। इसके अलावा कृषक समाज की जातियां जो राजनीतिक रूप से काफी सशक्त हैं, वे अपने लिए आरक्षण मांग रही हैं और लगता नहीं कि वे सरकार के इस नए प्रस्ताव से संतुष्ट होंगी। समाज के कई और वंचित समुदाय वर्षों से आरक्षण की मांग उठा रहे हैं।

बहरहाल, आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को यह आरक्षण न सिर्फ सरकारी नौकरियों में बल्कि उच्च शिक्षा में भी दिया जाएगा। वर्तमान में प्रतिवर्ष तकरीबन एक करोड़ छात्र/छात्राएं उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेते हैं। यदि केंद्र सरकार के इस आरक्षण के प्रस्ताव को अमलीजामा पहनाया जाता है तो यह होड़ और बढ़ेगी, जिसे साधने के लिए दस लाख अतिरिक्त सीटों का निर्माण करना पड़ सकता है। देश में इस समय 41 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के अलावा आईआईएम और आईआईटी जैसी अनेक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाएं हैं, जिनमें दाखिले के लिए तगड़ी होड़ मचती है। नई व्यवस्था की पूर्ति के लिए यदि इनमें अतिरिक्त सीटों का निर्माण होता है तो शिक्षकों की ज्यादा भर्ती के साथ-साथ शिक्षा के नए रास्ते भी खुलेंगे।

केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित इस नई आरक्षण व्यवस्था से ऐसे कई समूह भी लाभान्वित हो पाएंगे, जो राज्यों की आरक्षित सूची में तो होते हैं, किंतु केंद्र की आरक्षित सूची उन्हें स्वीकार नहीं करती।

पिछले दिनों हिंदी पट्टी के तीन प्रमुख राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा की पराजय का एक प्रमुख कारण एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के कारण उच्च जातियों का नाराज होना भी माना गया। मध्य प्रदेश में तो बाकायदा इसके खिलाफ सपाक्स पार्टी का गठन हुआ और वह चुनाव मैदान में भी उतरी। कई सीटों पर भाजपा समर्थकों की नाराजगी 'नोटा का बटन दबाने के रूप में भी झलकी। ऐसे में मोदी सरकार के इस कदम को 'मास्टरस्ट्रोक भी कहा जा रहा है। कई प्रेक्षक यह भी कह रहे हैं कि इस समय रोजगार पैदा करना जरूरी है, आरक्षण नहीं। इस कदम को 'संकेतात्मक मानने वाले भी कम नहीं हैं। कुछ इसे झुनझुना भी बता रहे हैं। पर इसमें कोई दोराय नहीं कि यह भारतीय समाज और राजनीति को बदल देने वाला कदम है। इस बहाने गरीब और सवर्ण भी राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गए हैं और साथ ही निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की मांग पुन: जोर पकड़ने लगी है।

आगे चलकर आरक्षण की यह डगर क्या मोड़ लेती है, कोई नहीं बता सकता। लेकिन यहां पर हम यह न भूलें कि आरक्षण व्यवस्था का प्रावधान कुछ वर्षों के लिए किया गया गया था और माना गया था कि इससे समतामूलक समाज बन जाएगा। लेकिन लगता है कि अब 'स्थायी रूप से भारतीय समाज में आरक्षण स्थापित हो गया है। गरीब सवर्णों को आरक्षण दबाव की राजनीति का परिणाम है, जिसका फैसला चुनावी दिनों में लिया गया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं)