प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ वर्ष पहले देश की जनता से वादा किया था- 'मैं देश नहीं झुकने दूंगा, मैं देश नहीं मिटने दूंगा। उन्होंने अपने इस वादे को राजस्थान के चुरू में फिर दोहराते हुए जनता को आश्वस्त किया कि देश सुरक्षित हाथों में है। कुछ समय से देश में यह धारणा विकसित होती गई कि चुनाव में नेता जो वादा करते हैं, बाद में उससे मुकरने लगते हैं। यह धारणा क्यों बनी, उस पर चर्चा जरूरी नहीं, किंतु यह जरूर है कि नरेंद्र मोदी ने इस धारणा को तोड़ा है। पांच साल पहले उन्होंने जनता से जो वादे किए थे, आज उन पर अमल के साथ जनता से संवाद कर रहे हैं। उन्होंने वादा किया था कि देश नहीं झुकने देंगे तो यह साबित करने पर ही वह इसे जनता के बीच दोहरा पा रहे हैं।

सभी जानते हैं कि आतंकवाद आज दुनिया के लिए एक चुनौती है। भारत के सामने भी आतंकवाद को समाप्त करने की चुनौती बनी हुई है। यह लड़ाई दो स्तरों पर लड़नी है। एक, वैश्विक आतंकवाद को समाप्त करना और दूसरे, सीमापार से भारत को नुकसान पहुंचाने वाले आतंक से निपटना। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दोनों स्तरों पर भारत ने मजबूती के साथ अपनी 'जीरो टोलरेंस की नीति स्पष्ट की है। मोदी सरकार ने सत्ता संभालते ही इसे स्पष्ट कर दिया था। सीमापार से संचालित आतंकी गतिविधियों के खिलाफ यही हमारी नीति भी है और नीयत भी।

देश में आतंकवाद मुख्य रूप से कश्मीर घाटी तक सीमित रहा है। कश्मीर संकट के लिए भी पिछली सरकारों की तीन भूलें मूल वजह के रूप में सामने आती हैं। पहली भूल 1947 की है, जब सेना आगे बढ़ रही थी तो तत्कालीन सरकार ने उसे रोक दिया था। दूसरी भूल, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा इसे संयुक्त राष्ट्र में ले जाना थी। तीसरी भूल कांग्र्रेस सरकारों के दौरान तुष्टीकरण की राजनीति रही। इन ऐतिहासिक कारणों से कश्मीर की समस्या कायम है और कुछ नकारात्मक ताकतें इनका फायदा उठाकर मुगालते में हैं कि वे आतंक के सहारे कश्मीर को हथिया लेंगी। वे इस गलतफहमी को जितना जल्दी दूर कर लें, बेहतर है। मोदी सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ जो लगातार मजबूत कदम उठाए हैं, उससे स्पष्ट है कि कोई आतंक के बूते कश्मीर का एक इंच हिस्सा इधर से उधर करने की सोच भी नहीं सकता है।

खैर, गत 14 फरवरी को पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों पर आतंकियों ने जो छलपूर्वक हमले का कुकृत्य किया, वह हम सभी के लिए असहनीय था। हमारे 44 जवानों की शहादत से मन उद्वेलित हो गया। शहादत की पीड़ा और गुस्से का भाव देश के आम जनमानस में था। यह जनता का अपनी सेना और चुनी हुई मोदी सरकार पर भरोसा था कि उन्होंने इस कठिन परिस्थिति में भी संयम रखा। यह भी एक बदलाव है कि देश अब कठिन से कठिन परिस्थिति में भी निराश और हताश नहीं होता, बल्कि बेहतरी की आस रखता है। पुलवामा मामले के बाद भी यह दिखा।

पुलवामा हमले के एक दिन बाद ही प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता को आश्वस्त किया कि इसे अंजाम देने वाले भले ही किसी कोने में छिपे हों, उनका बचना नामुमकिन है। ऐसा कहते हुए उन्हें केवल देश की जनता ही नहीं, बल्कि दुनिया भी देख रही थी। यह बदलते भारत का स्वर था। उनकी कथनी में भारत के मजबूत आत्मविश्वास और निर्णायक रक्षानीति की स्पष्ट ध्वनि थी। इसके दम पर ही हमारी वायुसेना ने पाकिस्तान में घुसकर जैश-ए-मोहम्मद के तीन बड़े आतंकी ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। आजादी के बाद भारतीय वायुसेना ने पहली बार दुश्मन देश के घर में घुसकर उसे नेस्तनाबूत किया। पाकिस्तान में भारत के हवाई हमले के बाद हमारे शहीद जवानों के परिवारों को जरूर सुकून मिला होगा। हम अपने वीर जवानों के प्रति संवेदनशील भी हैं और उनकी पीड़ा में सहभागी भी हैं।

26 फरवरी की सुबह दुनिया ने नए भारत की एक नई तस्वीर देखी। एक ऐसा भारत जो शांति का अग्रदूत है, लेकिन अपनी रक्षा के लिए सजग भी है। एक ऐसा भारत जो आतंकवाद के खिलाफ जंग में दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता से संपन्न् है तो अपनी सीमा के भीतर होने वाली किसी भी आतंकी गतिविधि का मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम भी। वहीं एक दौर था, जब देश में आतंकी हमले हुआ करते थे। मुंबई, दिल्ली सहित देश के अन्य शहरों में आतंकियों द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर बम धमाके करने की खबरें आती थीं। आतंकवाद रोकने के लिए नीति व निर्णय में स्पष्टता नहीं थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण था, किंतु मैं यहां उल्लेख करना चाहूंगा कि जब मुंबई में 26/11 का हमला हुआ तब उसका करारा जवाब देने की तैयारी हमारी सेना कर चुकी थी, लेकिन तत्कालीन सरकार की कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति और आतंकवाद के खिलाफ ढुलमुल रवैये से वह संभव नहीं हो सका। सेना की पूर्ण तैयारी के बावजूद एक महीने तक अनिर्णय से आतंकियों को जवाब नहीं दिया जा सका। अगर तभी ऐसा कर दिया होता तो शायद आतंकियों के हौसले इतने बुलंद नहीं होते।

केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद स्थितियां बदली हैं। आतंकियों के लिए संचालन दूभर हो गया। सीमावर्ती क्षेत्रों को छोड़ दें तो सरकार के पांच वर्षों में कोई आतंकी घटना नहीं हुई। सीमा पर भी हमें छेड़ा गया तो हमने भी छोड़ा नहीं। उरी हमले के बाद हुई सर्जिकल स्ट्राइक को देश भूला नहीं है। तब लंदन में एक कार्यक्रम में पीएम मोदी ने कहा था कि पाक पोषित आतंकवाद का समाधान एक सर्जिकल स्ट्राइक से संभव नहीं। यह लंबी लड़ाई है। आज भारत उस लंबी लड़ाई को लड़ने के लिए तैयार है।

आत्मरक्षा और सीमापार से हो रहे आतंकवाद से निपटने के लिए हम अब किसी महाशक्ति के भी मोहताज नहीं रहे। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नया भारत स्वयं अपनी रक्षा व आतंकवाद से मुक्ति की जंग का नेतृत्वकर्ता बनने की स्थिति में है। यही कारण है कि पुलवामा हमले के बाद दुनिया के तमाम देशों से भारत को समर्थन मिला।

प्रधानमंत्री मोदी आज अगर दुनिया में भारत की ताकत का एहसास करा पा रहे हैं तो इसके पीछे सवा सौ करोड़ देशवासियों की ताकत काम कर रही है। इसीलिए दुनिया के तमाम देश भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को मान रहे हैं। यह भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता है। इसी कूटनीतिक दबाव का असर है कि आज पाकिस्तान की कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। भारत ने प्रत्येक मोर्चे पर पाकिस्तान को परास्त किया है। आज वह अलग-थलग पड़ा है।

यह सच है कि आज देश उम्मीदों की उमंग में जी रहा है। पांच साल पहले का निराशा-हताशा वाला दौर अब गया-गुजरा हो गया है। देश को लगा है कि बहुत कुछ बदल गया है और आगे हालात बेहतर होंगे, क्योंकि उसे भरोसा है कि 'मोदी हैं तो मुमकिन है। बीते पांच वर्षों में बहुआयामी विकास के दम पर देश नई ऊंचाई की ओर अग्र्रसर है। बदलते नए भारत में आतंकवाद जैसी रुकावटें बाधा नहीं बन सकतीं, क्योंकि हमारी नीयत साफ, नीति स्पष्ट और निर्णय में कोई भ्रम नहीं है।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)