यूरिया से जमीन को गंभीर नुकसान पहुंचता है, संकल्प लेना चाहिए कि 2022 में देश जब आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाए, तब यूरिया का उपयोग आधा हो। 'मन की बात" के जरिए प्रधानमंत्री की चिंता व सुझाव ने खेत और जमीन के नुकसान को फिर चर्चा में ला दिया है! लगातार कृषि कर्मण अवॉर्ड जीत रहे मध्यप्रदेश में भी कई अवसरों पर वैज्ञानिक तरीकों से यह सिद्ध हो चुका है कि यूरिया का आवश्यकता से अधिक उपयोग, जमीन को नुकसान पहुंचा रहा है! आंकड़ों के आधार पर समझें तो वर्ष 1950 में देश में 5 करोड़ मीट्रिक टन अनाज की पैदावार के लिए 540 मीट्रिक टन रासायनिक खाद (फर्टिलाइजर) का इस्तेमाल होता था, अब 26.30 करोड़ मीट्रिक टन अनाज के लिए 90 हजार मीट्रिक टन फर्टिलाइजर का उपयोग किया जा रहा है! उत्पादन की अंधी दौड़ में शामिल ये खेती-किसानी कहां जाकर रुकेगी, अनुमान लगाना अभी तो मुश्किल है! इसीलिए, अब देसी खाद की तरफ मुड़ने पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है।

एक उदाहरण देवास जिले में नेमावर से 5 किमी दूर बजवाड़ा गांव में 66 वर्षीय दीपक सचदेव जैविक कृषि के जरिए सब्जियां, फल, मसाले, अन्न् और औषधियों की खेती करते हैं! डेढ़ एकड़ में फैला उनका खेत 135 प्रकार की जैविक खेती का आदर्श उदाहरण बन गया है! अपने इसी खेत में वे लोगों को केमिकल और पेस्टीसाइड्स के बिना खेती करना भी सिखाते हैं! गुजरात मूल के सचदेव महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में रहे और फिर 2006 में मध्य प्रदेश आकर जैविक खेती से जुड़ गए। अपने खेत में वे पत्तियों और फसलों के बचे हुए अवशेषों को मिट्टी में दबाकर रखते हैं फिर खाद के रूप में उनका इस्तेमाल करते हैं। खेती के इस बदले रूप को देखने के लिए इसराइल, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स और इंग्लैंड जैसे देशों से लोग आते हैं। सचदेव की एक ही मान्यता है - जैविक खेती का मूल है बिना रसायनों की खेती। इससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता भी कायम रहती है और उपजने वाले अनाज से जन-धन भी स्वस्थ रहता है!

एक उम्मीद देशभर के वैज्ञानिक जिस यूरिया का विकल्प तलाश रहे हैं, उस पर अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में भी उल्लेखनीय काम चल रहा है। कृषि विभाग के साथ मिलकर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस मैटेरियल साइंसेस (नैनो मैटेरियल्स) के प्रिसिंपल को-आर्डिनेटर प्रोफेसर नकवी (अब रिटायर्ड) और वैज्ञानिक डॉ. ब्रिजराज सिंह ऐसा शोध कर रहे हैं, जिसमें यूरिया सहित किसी अन्य खाद की जरूरत ही नहीं पड़े और 'स्मार्ट खाद" की कम मात्रा से पैदावार भी बढ़ जाए! डॉ. सिंह कहते हैं - सरकार यूरिया का उपयोग आधा करना चाहती है और कृषि विज्ञान कहता है फसल के लिए जितना नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश (प्राथमिक खाद) चाहिए वो यूरिया का उपयोग घटाकर संभव नहीं! शोध में यह सामने आया कि खेत में डाले जा रहे यूरिया का 30-32 फीसदी नाइट्रोजन ही पेड़-पौधे इस्तेमाल करते हैं! इससे यूरिया आयात करने के लिए सरकार के खाते से जा रही विदेशी मुद्रा और किसानों की जमा पूंजी बेकार हो रही है!

इसी चिंता को चुनौती बनाकर शोध शुरू किया कि नैनो न्यूट्रिएंट्स से स्मार्ट खाद बनाया जाए जिससे नाइट्रोजन सहित 17 पोषक तत्व भी एक साथ मिल जाएं और उपयोग क्षमता भी 80-85 फीसदी हो। इसे यूं भी समझें, यदि एक एकड़ फसल में 10 किलो खाद चाहिए तो नैनो फॉर्मूलेशन से बने खाद से 200 मिली से ही पर्याप्त पूर्ति हो जाएगी। समझा जा सकता है इससे खेती की लागत काफी घट जाएगी और अधिक खाद से बिगड़ रही पर्यावरण की सेहत भी सुधर जाएगी। प्रयोग में लगी टीम का दावा है उनके स्तर पर शोध सफल है और परिणाम भी काफी उत्साह बढ़ाने वाले आ रहे हैं!

खाद के नैनो फॉर्मूलेशन का पेटेंट करवाने के बाद यूनिवर्सिटी की ओर से शोध पत्र केंद्र सरकार और कृषि अनुसंधान केंद्र को भेजा जाएगा। ठीक इसी तरह भोपाल का इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ सॉइल साइंस भी यूरिया का विकल्प तलाशने के साथ इस काम में जुटा है कि मौजूदा खाद्यान के उत्पादन को बनाए रखते हुए नया रास्ता खोजा जाए! दो दिन बाद (5 दिसंबर) हम विश्व मृदा दिवस मनाने जा रहे हैं, इस दिन केवल इतना संकल्प तो ले ही सकते हैं कि शोध के 'सार्थक परिणाम" खेतों तक पहुंचाने के बीच आने वाली सरकारी व्यवस्था लंबी और जटिल नहीं होगी!